और नहीं तो क्या?…

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“हद हो गयी यार ये तो बेईमानी की…मुझ…मुझ पर विश्वास नहीं है पट्ठों को….सब स्साले बेईमान….मुझको…मुझको भी अपने जैसा समझ रखा है…एक एक..एक एक पाई का हिसाब लिखा हुआ है मेरे पास…जब चाहो…जहाँ चाहो...लैजर…खाते सब चैक करवा लो….

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“क्या हुआ तनेजा जी?…किस पर राशन पानी ले के गरिया रहे हैं?”…

“एक बात बताइए शर्मा जी”….

“जी..

“म्म्म…मैं क्या आपको चोर दिखता हूँ?”…

“क्या बात कर रहे हैं तनेजा जी आप भी?…आपकी ईमानदारी के किस्से तो पूरे डिपार्टमैंट में..ऊपर से नीचे तक..पूरे शोरोगुल के साथ जबरन मशहूर हैं”….

“वोही तो…. इसलिए तो डिपार्टमैंट में सब मेरा मान करते हैं…इज्ज़त करते हैं..सबसे ज्यादा मेरा ख्याल रखते हैं"…

“मुआफ कीजिए तनेजा जी..ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती…आप मेहनत भी तो सबसे ज्यादा करते हैं…हमेशा खुद आगे बढ़कर..एक से एक मुश्किल चैलेंज अपने हाथ में लेते हैं”..

“जी!..ये बात तो है"..

“मई-जून के सूखे नींबुओं में से भी प्याली भर रस..वो भी दिसंबर के महीने में..निचोड़ निकालना कोई आपसे सीखे..तनेजा जी"…

“हें…हें…हें…चने के झाड पे चढ़ाना तो कोई आपसे सीखे शर्मा जी"…

“अब क्या करूँ तनेजा जी?…मेरा तो स्वाभाव ही ऐसा है कि…मेरी सिंपल सी कही बात को भी हर कोई सीरियसली ले..हवा में उड़ना चालू कर देता है"…

“वोही तो”..

“जी!...  bribe 

“लेकिन इन स्सालों को इस बात से भला क्या मतलब कि सामने वाला बंदा कितना सिंसियर है?..कितना ईमानदार है?….ये क्या कि सबको एक ही फीते से हर बार नाप दो"..

“जी!…

“पहले सामने वाले की पोजीशन…..उसकी हैसियत तो देखो….फिर सोच समझ के कोई इलजाम लगाना है तो लगाओ..

“जी!..

“सब के सब स्साले…टटपूंजिए..कबाड़ी टाईप के..सो काल्ड रईस लोग….5-6 इंची स्क्रीन का एंड्राइड फोन ले के सोचते हैं कि वो तो खुदा हो गए”..

“हम्म!…

“स्सालो..पहले अपने बाप के पास ‘आई फोन’ 6 प्लस तो देख लो”मैं हांफता हुआ अपना फोन हवा में लहरा कर चिल्लाया…

“हम्म!….

“दस…दस बीस हज़ार के लिए भी स्सालों को मुझ पर विश्वास नहीं है…कहते हैं कि..”आप तो ले गए थे”…स्साले..बेशर्म कहीं के"मैं दांत पीसते हुए बडबडा रहा था…

“ओह!…

“अरे!…भाई अगर ले गया था तो कहीं ना कहीं तो कुछ ना कुछ हिसाब में आना चाहिए था ना?”मेरा तेज़ स्वर मद्ध्यम होने को हुआ …..

“जी!…बिलकुल"…

“वोही तो….कई बार मैंने खुद ही डेल्ले फाड़ फाड़ के सारे खाते खुद कर लिए लेकिन एंट्री का कहीं नामों निशाँ तक नहीं"मेरे स्वर में आत्मविश्वास झलक रहा था…

“ओह!…

“अब अगर होती तो…कहीं ना कहीं दिखती तो?”…

“जी!…बिलकुल"..

“और नहीं तो क्या"…

“कहीं ऐसा तो नहीं तनेजा जी कि..आपने कच्चे पे चढ़ा लिया हो लेकिन पक्के पे चढाने से….(शर्मा जी के स्वर में शंका सी थी)

“क्या बात करते हैं शर्मा जी आप भी?…घर जाने के बाद मेरा सबसे पहला काम होता है चिकन टिक्के के साथ दो पटियाला पैग मारते हुए पूरे दिन की रिपोर्ट अपनी श्रीमती जी को देना”मैं तैश भरे स्वर में उत्तेजित होता हुआ बोला..

“ओह!..

“उसके बिना तो खाना तक हजम नहीं होता मुझे"…

“अरे!…वाह..फिर तो दाद देनी पड़ेगी तनेजा जी आपकी भी कि..इस तरह के कलयुग में भी आप जैसे पत्नी भक्त सक्रिय तौर पर जिंदा हैं..मौजूद हैं"शर्मा जी के स्वर में प्रशंसा का भाव था..

“अजी!..काहे के पत्नी भक्त?..खाना देगी तभी तो हजम होगा"मैं खिसियानी सी आवाज़ में खुद अपनी ही खिल्ली उड़ाता हुआ बोला..

“ओह!…फिर तो आपसे गलती होने का कोई मतलब ही नहीं"शर्मा जी संतुष्ट से दिख रहे थे….

“वोही तो….

“छोड़ो तनेजा जी…हो जाता है कई बार ऐसा भी"…

“क्या छोड़ो?…मेरी इज्ज़त दाव पे लगी है और आप कह रहे हैं कि छोड़ो..ऐसे कैसे छोड़ो?”मेरा उत्तेजित हुआ स्वर उफान पकड़ने को हुआ..

“इन्हीं स्सालों से किसी दिन अठारह के छत्तीस ना वसूल किए तो मेरा भी नाम….

“लेकिन तनेजा जी…क्या ऐसा करना जायज़ होगा?….आपकी ईमानदारी के किस्से तो….

“वोही तो…मन तो नहीं करता है किसी के साथ गलत करने के लिए लेकिन क्या करूँ?…कई बार लोग खुद ही इतना मजबूर कर देते हैं कि…

“छोडी तनेजा जी….क्षमा करने वाला ही महान होता है"…

“टट्टू…ऐसी महानता भला किस काम की कि आपकी…अपनी साख ही दाव पर लग जाए?”…

“जी!..ये बात तो है लेकिन...

“एक तरफ दिल कहता है कि..”छोड़ तनेजा…दस बीस हज़ार से भला तुझे क्या फर्क पड़ जाएगा?..ऊपरवाले का दिया सब कुछ तो है तेरे पास..भर दे अपनी जेब से”..

“जी!…ये बात तो है..ऊपरवाले की बड़ी मेहर है आप पर..आँख मूँद कर भी दिल खोलते हुए खर्च करें तो भी आपकी सात पुश्तें बड़े आराम से…

“लेकिन उसके बाद का क्या?”..

“क्या?”…

“बाकी की पुश्तें क्या गुरूद्वारे में जा के अपनी ऐसी तैसी करवाएंगी?”..

“ओह!….इस बारे में तो मैंने सोचा ही नहीं"…

“वोही तो…अपनी सोच हमेशा ऊँची और दूर तक मार करने वाली होनी चाहिए"…

“जी!..लेकिन ये भी तो सच है ना कि..पूत कपूत तो क्यों धन संचय..पूत सपूत तो क्यों धन संचय?”…

“जी!…माना कि मेरी सभी औलादें…

“जायज़ भी और नाजायज़ भी?”…

“जी!..बिलकुल..नाजायज़ हुई तो क्या हुआ..हैं तो सब मेरी अपनी ही”..

“जी…

“मैं मानता हूँ कि मेरी सभी औलादें..पैदायशी रूप से नालायक पैदा हुई हैं लेकिन उनका इकलौता बाप होने के नाते…

“इकलौता?”…

“जी!..

“ओह!..वैरी स्ट्रेंज”…

“वैसे..सच कहूँ तो मुझे भी कई बार ऐसा शक सा हो जाता है कि मैं पहले से ही चूसे हुए आम को आँखें मूँद कर जाने किस धुन में चूसे चला जा रहा हूँ लेकिन…

“लेकिन?”…

“लेकिन खुद को हीन भावना से ग्रस्त होने से बचाने के लिए ना चाहते हुए कई बार ऐसा मान या सोच लेता हूँ कि मैं सिंगल हैंडिड…सैल्फ ओंड गाडी..

“अपने मन मुताबिक ढंग और स्पीड से…पोजीशन बदल बदल कर..गियर को आगे पीछे करते हुए चला रहा हूँ?"…

“जी!..बिलकुल"मेरे स्वर में आत्मविश्वास हिलोरें ले उछल कूद कर रहा था..

“ओह!..फिर तो सब ठीक है"…

“क्या ठीक है?”…

“वही जो आपने कहा"…

“क्या कहा?”..

“यही कि..

“पोज़ीशन बदल बदल कर?”..

“नहीं"…

“गियर को आगे पीछे करते हुए?”…

“नहीं…

“तो फिर?”..

“यही कि…दस बीस हज़ार से भला तुझे क्या फर्क पड़ जाएगा?..ऊपरवाले का दिया सब कुछ है तेरे पास..भर दे अपनी जेब से”..

“हाँ!…ये बात तो है…दस बीस हज़ार से तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला"..

“वोही तो"..

“लेकिन शर्मा जी..एहसान उन पर करना चाहिए जो उसके लायक हों..

“जी!..ये बात तो है"..

“चलो!..एक बार के लिए मैं सब कुछ भूल भाल भी जाऊँ लेकिन उन लोगों को कुछ अक्ल तो हो कम से कम…सब स्साले..एक से बढ़कर एक बेवाकूफ”…

“कोई कहता है यहाँ ले लो..कोई कहता है वहाँ ले लो”…

“ओह!…

“तुम्हारे बाप का मैं नौकर नहीं जो तुम्हारे कहने से कहीं भी ले लूँगा”..

“जी!..बिलकुल..सैल्फ रिस्पेक्ट नाम की भी कोई चीज़ होती है"..

“जी!..बिलकुल…उन्हें बेशक अपनी इज्ज़त प्यारी हो ना हो लेकिन मेरे लिए तो भय्यी..इज्ज़त से बढ़कर कुछ भी नहीं..एक बार गयी तो समझो हमेशा के लिए गयी”…

“जी!..बिलकुल"…

“मैंने तो एकदम साफ़ साफ़ डंके की चोट पे उन्हें कह दिया कि मैं जब भी लूँगा..अपनी मर्जी से..अपनी मनपसंद जगह पर लूँगा”..

“जी!..बिलकुल सही किया"..

“जी!..मैंने तो सही किया लेकिन उन लोगों को भी तो कुछ अक्ल हो"…

“क्या हुआ?”…

“सब के सब स्साले..अनपढ़..गंवार..अक्ल घास चरने चली गयी थी पट्ठों की"…

“क्या हुआ?”…

“ये पूछो कि क्या नहीं हुआ?”..

“क्या नहीं हुआ?”..

“अरे!..ये नहीं..पूछो कि क्या हुआ?”…

“क्या हुआ?”…

“पहले तो सब स्साले…बीच सड़क ही देने लगे”…

“एक साथ?”…

“जी!…एक साथ”…

“ओह!..

“मैंने कहा भी कि एक साथ इतने ज्यादा ठीक नहीं लेकिन वो सब माने..तो ना"…

“ओह!..

“मैंने कई बार समझाया भी कि..ये क्या तरीका है ऐसे..बीच सड़क..तमाशा खडा करने का..अपना ढंग से दो..खुश हो कर दो"..

“वैसे..बुरा ना मानें तनेजा जी अगर तो एक बात कहूँ?”..

“जी!..ज़रूर"…

“कोई खुश हो कर तो किसी को देता नहीं हैं..सबकी अपनी अपनी मजबूरी होती है"…

“अब मैं कुछ कहूँ?”..

“जी!..ज़रूर"…

“आपको उन बेचारों की तो मजबूरी दिख गयी…हमारे बारे में बिलकुल नहीं सोचा..कोई बेशक माने या ना माने…हमारी भी अपनी..अलग किस्म की मजबूरियां होती हैं..बिना लिए हमें…

“खाना हजम नहीं होता है?”…

“जी!..खट्टे..खट्टे से..अजीब किस्म के डकार से आने लगते हैं..हर वक्त पेट आफ़रा आफ़रा सा लगता है..

“ओह!..

“यही सब सोच के फिर भी मैंने सोचा कि चलो..नादान उम्र के हैं..गलतियाँ इस उम्र में अक्सर हो जाया करती हैं..

“जी!..वक्त के साथ खुद समझ जाएंगे"..

“ख़ाक समझ जाएंगे…

“मैं कुछ समझा नहीं"…

“अगर समझ होती तो ऐसे तो ना करते..

“कैसे ना करते?”…

“तमीज नहीं है स्सालों को एक पैसे की..पैसा दे रहे हैं लेकिन पैसे को संभालने की तमीज तक नहीं कि..पैसे को ऐसे..खुल कर..खुले में नहीं दिया जाता है"…

“तो फिर कैसे दिया जाता है?..

“अपना लिफ़ाफ़े में डाल कर..टेबल के नीचे से"..

“लिफ़ाफ़े में डाल कर तो चलो..ठीक है लेकिन ये टेबल के नीचे से क्यों?”…

“तुम पागल हो?”…

“क्यों?..क्या हुआ?”..

“रिश्वत का पैसा भला क्या टेबल के ऊपर से लिया जाता है?”…

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“क्क्क्या?”…

“और नहीं तो क्या?”..

(कथा समाप्त)

या तो नूँ ऐ चालेगी

“हद हो गयी ये तो एकदम पागलपन की…नासमझ है स्साले सब के सब….अक्ल नहीं है किसी एक में भी…लाठी..फन फैलाए..नाग पर भांजनी है मगर पट्ठे..ऐसे कमअक्ल कि निरीह बेचारी जनता के ही एक तबके को पीटने की फिराक में हाय तौबा मचा…अधमरे हुए जा रहे हैं"…

“किसकी बात कर रहे हैं तनेजा जी?”…

“हर एक को बस..अपनी ही पड़ी हुई है..बाकी सब जाएँ बेशक…भाड़ में…(मेरा बडबडाना जारी था)

“हुआ क्या तनेजा जी?…कुछ बताइए तो सही"…

“पेट पे लात लगी तो लगे अम्मा..अम्मा चिल्लाने…यही अगर पहले ही अक्ल से काम लिया होता तो काहे को इतनी दिक्कत…इतनी परेशानी आती?”मैं मेज़ पर पड़े गिलास को उठा..पानी पीता हुआ बडबडाया…

“किसे पानी पी..पी कर कोस रहे हैं तनेजा जी?…कुछ बताइए तो सही"शर्मा जी के स्वर में असमंजस भरी उत्सुकता थी….

“अरे!..उन्हीं बावलों को कोस रहा हूँ जो इन नए…जगह जगह कुकुरमुत्तों के माफिक उग आए ई-रिक्शों पर बैन लगाने की सिफारिश कर रहे हैं"मैं आवेश में हाँफते हुए अपने माथे पे चुह आई पसीने की बूंदों को रुमाल से पोंछता हुआ बोला..

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“सही ही तो कर रहे हैं बेचारे…ना कोई लाईसेंस…ना कोई नंबर…

“फिर भी कमाई बंपर…भय्यी..वाह…बहुत बढ़िया”…

“वोही तो"…

“सीधी बात ये कि किसी से किसी की कमाई देखी नहीं जाती"…

“वोही तो…अच्छे भले ये पैडल वाले..आम यात्रियों को लूट..कमा धमा रहे थे लेकिन वो स्साले चुपचाप..दबे पाँव..जाने कहाँ से आसमानी फ़रिश्ते बन टपक पड़े और 10 रूपए में हवादार सवारी का होका लगा बेडागर्क कर के रख दिया पूरी लोकल ट्रांसपोर्ट जमात का"…

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“और वो जो पहले दो..दो किलोमीटर के चालीस..चालीस रूपए माँग रहे थे?…वो जायज़ था?”…

“माना कि जायज़ नहीं था…नाजायज़ था लेकिन डॉक्टर ने नहीं कहा है कि नवाबों की तरह ठाठ से..हिचकोले खा..अपने पिछवाड़े की ऐसी तैसी करवाते हुए रिक्शे की ही सवारी करो…अपना..ग्रामीण सेवा में भी तो…

“धक्के खा…पसीने से लतपथ हो..खुद को खुडढल लाइन लगाया जा सकता है?”…

“जी!..बिलकुल"…

“हुंह!…बड़ी सेवा…सेवा की बात करते हैं….अरे!…काहे की सेवा?…किस बात की सेवा?..किस चीज़ की सेवा?..सब स्साले..एक नंबर के हरामी….पहले ब्लू लाईनों से आतंक मचा रखा था और अब इस तथाकथित सेवा(?) के जरिए अंधेरगर्दी मचा रखी है सरासर”….

“हम्म!…

“छह की जगह बारह-पंद्रह तक सवारियाँ ऐसे ठूसते हैं दडबे में जैसे हम लोग इनसान ना हुए…मरियल..बीमारी खाए चूजे या मुर्गियाँ हो गयी कि..होने दो ऐसी तैसी…हमरे बाप का क्या जाता है?”..

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“हम्म!…ये बात तो है"…

“और बेशर्मी तो देखो ऐसी पट्ठों की कि..चेहरे पे शिकन तक नहीं"…

“हम्म!…

“कुछ कहो तो ठठा कर हँसते हुए उलटा हमें ही धमका के कहते हैं… ‘आगे से चढ़ मति जाईओ’"…

“हम्म!…

“यही अगर पहले से ही अक्ल से काम लिया होता बावलों ने तो ऐसे दुर्दिन दिन देखने की नौबत तो ना आती कि कोर्ट कचहरी के चक्कर दिहाड़ी गुल होती फिरे?”…

“हम्म!..

“मगर पहले?…पहले तो नवाबों जैसी अकड़ कि…या तो भाई…नूँ ऐ चालेगी…पाड़ सकै तो पाड़ ले म्हारा पुंज्जा”…

“वैसे…देखा जाए तो इसमें..उनका भी कसूर नहीं है..सबसे पहले तो ग्रामीण सेवा का मालिक ही मुँह फाड़ के खड़ा हो जाता है कि..मुझे तो भय्यी… शाम को हज़ार रूपए का कड़कड़ाता हुआ नोट चाहिए…बाकियों से खुद निबटो"…

“बाकी कौन?”…

“अपने ट्रैफिक पुलिस और पाँच नंबर  वाले…और कौन?..सबको मंथली चाहिए बेशक कमाई हो या ना हो"…

“पहली बात तो ये सिरे से ही गलत है कि ग्रामीण सेवा को किराए पे चलाया जाए…अपना…जिसके नाम परमिट है..वही चलाए"…

“क्क..क्या?…क्या कहा?…परमिट वाले खुद चलाएँ?…कुछ होश में तो हो या फिर बिलकुल ही बौरा गए?”…

“क्यों?…क्या हुआ?”…

“कुछ पता भी है…इन जर्जर…कंडम…अधमरी सी हालत वाली..लगभग मृतप्राय हो चुकी गाड़ियों के मालिक…असल में हैं कौन?”…

“कौन हैं?”…

“कई कई आलीशान कोठियों और बंगलों के मालिक”..

“ओह!…

“और तुम चाहते हो कि..वो खुद होका लगा 5-5…10-10 रूपए इकट्ठे करते फिरें?”…

“लेकिन ग्रामीण सेवा तो गाँव के गरीब लोगों के लिए….

“हुंह!..गरीब लोगों के लिए…गरीब आदमी बस..इन्हें चला सकता है..इनका मालिक नहीं बन सकता”…

“ओह!…

“ये ब्लू लाइन वाले रसूखदार तबके के ही बिगड़े हुए लोग हैं…राजनैतिक दबाव के चलते जब ब्लू लाईनों पर बन आई तो दिल्ली की ऐसी तैसी करने के लिए इन्होने ये ग्रामीण सेवा रुपी जुगाड़ निकाल लिया"…

“ओह!…इसका मतलब इन्हीं की शह पर कोर्ट में ई रिक्शों के खिलाफ उलटा सीधा केस दर्ज कर उन्हें रस्ते से हटाने की तैयारी है"…

“हम्म!…लगता तो यही है लेकिन ये जो तुम्हारे इस ई रिक्शे वाले की टक्कर से बच्चा खौलती चासनी की कढाई में जा गिरा और बेमौत मर गया….उसका क्या?”…

“तो इसके लिए उस हलवाई को पकड़ो जो सरेआम सड़क पर मौत का सामान लिए अपना ठिय्या जमा के बैठा था"…

“ये क्या बात हुई?…ऐसे तो पूरी दिल्ली में दुकानदारों ने…रेहडी पटरी और खोमचे वालों ने सड़क किनारे अवैध कब्ज़े कर रखे हैं…उन सबको पकड़ के अन्दर कर दें?”…

“बिलकुल कर देना चाहिए"…

“फिर तो हो लिया गुज़ारा….हर तरफ अराजकता नहीं फ़ैल जाएगी?”…

“ऐसे कौन सी कम अराजकता फ़ैली हुई है?…पैदल चलने वालों की जगह पर दुकानदारों ने कब्ज़ा कर रखा है…सड़कों पर मोटर गाड़ियों ने ऐसी तैसी कर रखी है…पैदल चलने वाला बेचारा चले तो फिर चले कहाँ पर?…

“लेकिन क़ानून नाम की भी कोई चीज़ होती है…अपना क़ानून के हिसाब से तो….

“क़ानून के हिसाब से यहाँ चलता ही कौन है जनाब?…ना कोई यहाँ सही से ट्रैफिक के नियमों का पालन करता है?…ना कोई यहाँ सही से टैक्स भरता है?…ना ही कोई यहाँ सही से किसी भी नियम का अक्षरश पालन करता है?”…

“हम्म!..ये बात तो है"..

“सीधी बात ये कि ये पूरा देश ही भगवान भरोसे चल रहा है…इसका भगवान ही मालिक है"…

“जी!..बिलकुल..ये पूरा देश ही भगवान् भरोसे चल रहा है"…

“हम्म!…

“लेकिन एक बात समझ नहीं आई"…

“क्या?”…

“यही कि आपको इन ई रिक्शा वालों से इतनी क्यों हमदर्दी है?”…

“भला क्यों नहीं होगी?…कुछ पता भी है कैसे बेचारों ने पाई पाई जोड़ के पैसे जमा किए होंगे रिक्शे खरीदने के लिए?….कैसे उन्होंने बेरोजगारी से तंग आ कर..उज्जवल भविष्य की चाह में 10-10% ब्याज पर रुपया उधार लेकर अपनी ऐसी तैसी करवाई होगी?…कैसे वो बेचारे अपना पेट काट काट कर रोजाना का चार चार सौ रूपए किराया भरते होंगे?….

“लेकिन इसमें हम आप भला क्या कर सकते हैं?…अगलों की किस्मत…अगले जाने"…

“अरे!…वाह…ऐसे कैसे अगले जाने?….पैसा तो मेरा…मेरे बाप का लगा है ना ब्याज पे…मूल डूबेगा तो मेरा ही डूबेगा…किसी और का थोड़े ही डूबेगा"…

“ओह!…

“वैसे आपको क्या लगता है..ऊँट किस करवट बैठेगा?”…

“मतलब?”…

“कोर्ट का फैसला किसके पक्ष में होगा?”…

“मेरे हिसाब से तो पूरी तरह से बैन लगाना तो मुमकिन नहीं…लगाना भी नहीं चाहिए…पब्लिक को इनसे बड़ा आराम है"…

“जी!…ये बात तो है"…

“हाँ!…इनके लिए कोई ट्रेनिंग प्रोग्राम वगैरा ज़रूर होना चाहिए कि…कैसे चलाएँ…कितनी सवारियाँ बिठाएँ वगैरा वगैरा”…

“जी!…

“चिंता ना करें…आपका मूल नहीं डूबेगा"…

“ओह!…थैंक यू…आपके मुँह में घी शक्कर"…

“बस!…ये ई-रिक्शे..किसी को मारे ना टक्कर"……    

हा….हा…..हा…हा…

{कथा समाप्त}

शोर्टकट- गाँव से शहर तक

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ट्रिंग ट्रिंग..

“हैलो….कौन बोल रहा है?”..

“डॉक्टर साहब घर पर हैं?”…

“हाँ!…जी बोल रहा हूँ…आप कौन?”..

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“जी!..मैं शर्मा…

“शरमाइए  मत…सीधे सीधे फरमाइए कि…आप हैं कौन?”…

“ज्ज…जी!…म्म..मैं…

“अब यूँ ही मिमियाते रहेंगे या अपना नाम..पता ठिकाना कुछ बताएँगे भी?”डॉक्टर साहब के स्वर में थोड़ी सी झुंझलाहट थी..

“जी!…मैं शर्मा…आपका दोस्त”…

“ओहो!..शर्मा जी…आप हैं…पहले नहीं बता सकते थे क्या?….कहिए…कैसे हैं आप?”..

“बहुत बढ़िया…आप कैसे हैं"….

“एकदम बढ़िया…फर्स्ट क्लास"…

“जी!..

“क्या बात?….बड़े दिनों बाद याद किया"…

“जी!…बस ऐसे ही…आलतू फालतू का काम ही इतना हो जाता है आपकी कृपा से कि बस…बेफिजूल की बातों के लिए टाईम ही नहीं निकल पाता"…

“फालतू बातों के लिए या फालतू लोगों के लिए?”…

“एक ही बात है”…

“जी!…ये बात तो है..अब मुझे ही लो…अगर पहले से पता होता कि आपका फोन है तो मैं…

“उठाता ही नहीं?"…

“एग्जैकटली"…

“वैरी गुड…आप तो मेरे मुँह पर ही मुझे नीचा दिखाने का प्रयास कर रहे हैं"…

“मुँह पर नहीं…फोन पर"…

“ओह!…

“वैसे इसमें बुरा मानने की कोई बात है नहीं…...जिस गाँव जाना ही नहीं..उस गाँव का पता भी अगर हम पूछें तो पूछें मगर किसलिए?”…

“जी!…ये बात तो है लेकिन ध्यान रहे…मेरे गाँव से गुज़रे बगैर आपका शहर पहुँच पाना नामुमकिन है"..

“कुछ ज्यादा ही गुरूर में नहीं उड़ रहे तुम आजकल?’…

“जी…बस…ऐसे ही…आजकल कामधंधा ही इतना ज्यादा बढ़ गया है आप जैसे सुधि..निर्लज्ज जनों की वजह से कि….

“तुमने आसमान में उड़ना शुरू कर दिया?”…

“अब मैं कुछ कहूँगा तो अपने मुँह..मियां मिट्ठू बनने जैसे होगा…वैसे!…आप खुद समझदार हैं"…

“वैरी गुड…लेकिन यहाँ…मेरे मामले में तुम किसी गुमान में मत रहना…तुम्हारे जैसे कई गाँवों से शोर्टकट निकल गए हैं आजकल शहर तक पहुँचने के”…

“अच्छा?’…

“और नहीं तो क्या…तुम कहों तो कल से ही..कल क्या?..आज से ही मैं अपना रस्ता बदल….

“हें…हें…हें…म्म..मैं तो बस….ऐसे ही…बेफाल्तू में मज़ाक कर रहा था और आप हैं कि….

“तुम्हें  अच्छी तरह पता है ना कि मुझे मज़ाक बिलकुल भी पसंद नहीं"…

“जी!…तभी तो…

“तभी तो जानबूझ कर मुझसे पंगा ले रहे थे?”..

“ज्ज…जी!…बस..ऐसे ही…टाईम पास”…

“महज़ टाईम पास के लिए तुम मुझसे पंगे ले रहे थे?”..

“ज्ज…जी!…कोई और मिला नहीं तो सोचा कि…

“मुझसे ही पंगा ले लिया जाए?”…

“एग्जैकटली"…

“ओह!…फिर ठीक है”…

“जी!…और बताएँ..सब कुशल मंगल?”..

“जी!…बिलकुल..मेरी गैर हाज़िरी में दुकान  कुशल संभाल लेता है और मंगल….

“दुकान?…लेकिन आपका तो अपना..खुद का…

“क्लीनिक तो यार वो दूसरों के लिए है..हमारे अपने लिए तो वो ठिय्या ही…मतलब..दुकान ही है"…

“ज्ज…जी!…ये बात तो है…घोड़ा घास से यारी कर लेगा तो फिर खाएगा क्या?”…

“जी!…बिलकुल"…

“जी!..

“अच्छा!…कुछ खबर पता चली?”...

“उड़ती उड़ती सी?”…

“हाँ!…उड़ती उड़ती सी"…

“नहीं तो…किस बारे में?”…

“अपने उसी गोर्टीस के बारे में”…

“क्या?”…

“यही कि…लूट मचा रखी है स्सालों ने…सालों से सरासर..अंधेरगर्दी का ऐसा आलम बरपाया है पट्ठों ने कि बस..पूछो मत"…

“हुआ क्या?”…

“क्या हुआ?…ये पूछो कि क्या नहीं हुआ?”….

“मैं कुछ समझा नहीं?”…

“वो अपने ‘नपुंसक राम’ जी का मंझला वाला छोरा है ना?”…

“कौन?….वीर्यप्रधान?”..

“हाँ..हाँ..वही"…

“क्यों?…क्या हुआ उसे?”…

“पूरे 20 हज़ार की लाटरी लग गयी पट्ठे की?”…

“अरे!…वाह…फिर तो अपनी पार्टी पक्की….आज शाम को ही मैं उससे…

“शश्श…नाम भी मत लेना पार्टी का उसके आगे"…

“क्यों?…बिदक जाएगा?”…

“हम्म!…

“लेकिन क्यों?”…

“मना किया है उसने”…

“पार्टी के लिए?”…

“नहीं…जिक्र करने के लिए?”…

“पार्टी का?”…

“नहीं!…उस बात का"…

“किस बात का?”…

“वही जो मैं तुमसे करने वाला हूँ"…

“तो फिर कीजिए ना..सोच क्या रहे हैं?…

“लाटरी लग गयी पट्ठे की"…

“ये तो आप मुझे बता चुके…आगे?”…

“तुम्हें तो पता है..वो उस नामी गिरामी अस्पताल में वार्ड ब्वाय का काम करता है"…

“हम्म!…पता है…मेरे पिताजी की ही सिफारिश से तो…

“उसे वार्ड ब्वाय की नौकरी मिली थी?”…

“नहीं!..उसके खिलाफ बदसलूकी के लिए एक्शन ले…दो हफ़्तों के लिए सस्पैंड कर दिया गया था”…

“ओह!…उसी ने बताया कि यही कोई तीन चार दिन पहले उसके यहाँ इमरजेंसी में एक केस आया…काफी क्रिटिकल कंडीशन थी"…

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“ये तो आम बात है…बड़ा अस्पताल है…क्रिटिकल केस तो आने ही हैं…जान से बढ़ कर कुछ नहीं है…जान बचनी चाहिए बस..पैसा तो आनी जानी चीज़ है…जितना मर्जी लग जाए..क्या फर्क पड़ता है?”…

“हम्म!…डॉक्टरों ने सीधे आई.सी.यू में भर्ती किया और जी जान लगा दी….

“बेडागर्क करने में?”…

“आप सुनो तो सही"…

“जी!…

“डॉक्टरों ने आई.सी.यू में भर्ती कर..जी जान लगा दी….

“लेकिन मरीज़ बच नहीं पाया?”…

“क्या शर्मा जी?…आपको तो हर वक्त…पहले आप मेरी बात सुनो तो सही…

“जी!…

“एक से एक महँगी..इम्पोर्टेड दवाईयाँ….बढ़िया से बढ़िया…कॉस्टली… इंजेक्शन….

“मरीज़ ने रातों रात रंग बदल लिया?”…

“जी!…गोरे से एकदम….

“मटमैला पड़ गया?”…

“नहीं!…काला…

“ओह!…उम्र क्या थी मरीज़ की?”…

“यही कोई 22-23 साल का बांका…खूबसूरत..एकदम हट्टा कट्टा नौजवान था”…

“अपने..हृतिक रौशन जैसा?”…

“नहीं!…सलमान खान जैसा"….

“ओह!…शादी वगैरा?”…

“अभी कहाँ?….शादी तो अभी नहीं हुई थी बेचारे की लेकिन ऊपरवाले के फज़ल और उसके अपने…खुद के करम से बच्चे एकदम गोरे चिट्टे…दुद्ध मलाई वरगे”…

“वैरी गुड…लिव इन का यही तो फायदा है कि शादी करो ना करो…बच्चे तुरंत…एक से एक नायाब डिलीवर हो जाते हैं"…

“जी!…ये बात तो है”….

“लेकिन यार…इम्पोर्टेड दवाईयों और महँगे इंजेक्शनों वगैरा से तो मरीज़ की तबियत रातों रात संवर जाती है”…

“जी!…लेकिन कई बार फँस..बीच भंवर भी जाती है"…

“हम्म!…

“यही हुआ…यहाँ..इस केस में भी..जाने कैसे…दिन पर दिन बिगड़ती चली गयी"…

“नर्स?”…

“नहीं!…तबियत"…

“डॉक्टरों की?”..

“नहीं!…रिश्तेदारों की"…

“डॉक्टर के?”..

“नहीं!…मरीज़ के"…

“लेकिन क्यों?”…

“बिल ही जो इतना तगड़ा बना दिया था अस्पताल वालों ने?”..

“ओह!..

“सीधे वेंटीलेटर पर लाना पड़ा"…

“रिश्तेदारों को?”…

“नहीं!…मरीज़ को”..

“ओह!…

“धीरे धीरे सेहत में कुछ सुधार आना शुरू हुआ?”…

“मरीज़ की?"…

“नहीं!…उसके रिश्तेदारों की"…

“ओह!…वैरी गुड"…

“क्या ख़ाक वैरी गुड?”…

“क्यों?…क्या हुआ?”…

“रिश्तेदार ठीक हुए थे…मरीज़ थोड़े ही ना"…

“हम्म!..

“इतने दिनों की आपाधापी में उनका बजट टैं बोल गया"…

“हम्म!…इन बड़े बड़े अस्पतालों के चक्कर में तो अच्छे अच्छों के पायजामे ढीले हो जाते हैं…इसमें कौन सी बड़ी बात है?"…

“जी!…अगले..इधर उधर से पैसे पकड़ कर फिर भी इस आस में इलाज करवाते रहे कि…एक ना एक दिन अच्छे दिन ज़रूर आएँगे”…

“ख़ाक अच्छे दिन आएँगे?…इस प्याज़ के दाम तो अभी से…

“जी!…ये बात तो है….

“फिर क्या हुआ?”..

advising doctor

“होना तो वही था..जो ऊपरवाले को मंज़ूर था…उसी की कृपा ने बड़े डॉक्टर के जरिए  राह दिखाई दी कि..एक बड़े आपरेशन के बाद(अगर कामयाब रहा?) उनका लड़का एकदम ठीक हो जाएगा”…

“वाउ!…दैट्स नाईस"…

“लेकिन खर्चा कम से कम 3 लाख रूपए आएगा"…

“ओह!…

“मरते क्या ना करते….कहीं से जुगाड़ कर करा के बेचारे पैसे जमा करवाने जा ही रहे थे कि अचानक…

“मरीज़ टैं बोल गया?”…

“नहीं!..अपने नपुंसक राम जी का छोरा..वीर्यवान भगवान बन के बीच रस्ते में ही टपक पड़ा"…

“हनुमान के जैसे?”…

“नहीं!…हापुज़ आम के जैसे"…

“ओह!…इसे कहते हैं किस्मत का धनी होना…बेशक जेब में मनी ना होना”…

“हम्म!…किस्मत के तो वो बहुत धनी थे..पूरे 3 लाख बचवा दिए अगले ने”..

“वाह!…तभी उन्होंने उसे बतौर ईनाम 20 हज़ार दिए होंगे?"…

“हुंह!..बतौर ईनाम?…घंटों तो उससे झिकझिक करते रहे कि..कुछ कम कर ले..कुछ कम कर ले लेकिन पट्ठा इतना अड़ियल कि जो मुँह से निकल गया..सो..निकल गया…वही ले के माना”…

“हम्म!..अब तबियत कैसी है?”…

“मरीज़ की?”…

“नहीं!..वीर्यवान की?”…

“मज़े ले रहा है ज़िन्दगी के"…

“और उसकी?”..

“क्या?”…

“तबियत कैसी है अब मरीज़ की?”…

“वो तो उसी वक्त टैं बोल गया था”…

“किस वक्त?”…

“जब उसे वेंटीलेटर में रखा गया था"…

patient

“ओह!..इसका मतलब बिना बात छला जा रहा था बेचारों को?”…

“जी!..बिलकुल…यही तो धंधा बना रखा है आजकल इन बड़े अस्पतालों ने…ऊपरी टीमटाम से इतना इम्प्रैस कर देते हैं आम पब्लिक को कि वो बस…बेचारी सोचती है कि यहीं..इसी फाईव स्टार अस्पताल में उसके नर्क समान जीवन का स्वर्ग समान उद्धार लिखा है"..

hospital

“बेशक..इसके लिए इधर उधर से क्यों अपना ज़मीर बेच के पैसा उधार लेना पड़े लेकिन इलाज करवाएंगे तो इन्हीं चंद..गिने चुने बड़े अस्पतालों में ही अपना इलाज करवाएंगे"…

“हम्म!…

“शर्म भी नहीं आती हरामखोरों को कि अगर अपनी छिलवानी ही है तो हम जैसों से…अपने आस पड़ोस के नातजुर्बेकार डॉक्टरों से छिलवाएं…ये क्या बात हुई कि ज़रा सी तकलीफ हुई नहीं और सीधा ऊह…आह….ऊह…आह कर..बिलबिलाते हुए जा पहुँचे इन बड़े अस्पतालों की शरण में?"…

“और नहीं तो क्या…ये गली कूचों में कुकुरमुत्तों के माफिक उग आए नर्सिंग होम…क्लीनिक और लैब क्या हमने अपनी ऐसी तैसी करने के लिए खोल रखे हैं?…आप जैसों के लिए ही तो खोल रखे हैं ना?”…

patient-centered-care

“जी!…ये तो वही…देवर…भाभी और खूंटे वाली कहानी हो गयी”…

“हम्म!..अपनी…अपनी अब रही नहीं..पराई वो जनानी हो गई”…

हा….हा…हा…हा… (हम दोनों का समवेत स्वर)

“आज तो यार सच में..बड़ा मज़ा आया तुमसे बात कर के"…

“जी!…मुझे भी…सच में पता ही नहीं चला कि हम आमने सामने बैठ के बात कर रहे हैं या फिर मोबाईल से"…

“क्क्या?…तुम इतनी देर से मोबाईल से बात कर रहे थे?”…

“जी!…क्यों?..क्या हुआ?”…

“फिर तो तुम्हारे बैलैंस का भट्ठा बैठ गया होगा आज तो?”…

“बिलकुल भी नहीं?”…

“वो कैसे?”…

“मैंने आज ही ‘टाटा’ टू ‘टाटा’ का अनलिमिटिड वाला रिचार्ज करवाया है"…

“ओह!..फिर तो कोई दिक्कत नहीं"..

“जी!…

“वैसे…किसी ख़ास काम से फोन किया था या फिर वैसे ही….टाईम पास…

“हें…हें….हें…आप भी कैसी बातें करते हैं डॉक्टर साहब…आजकल के बिज़ी शैड्यूल में भला किसके पास इतना वक्त है कि वो ऐसे ही खामख्वाह… बेफाल्तू में…अपने खर्चे पे किसी गैर का टाईम पास याने के मनोरंजन करता फिरे?”…

“जी!…ये बात तो है"…

“जी!…

“कहो फिर..कैसे याद किया था?”…

“कैसे क्या?…दिल से याद किया था"…

“रट्टा मार के?”…

“जी!…बिलकुल…रट्टा मार के"…

“खैर!..ये सब फोर्मैलिटी छोड़ो और सीधे सीधे बको कि..क्यों याद किया था?”…

“अब क्या बताऊँ?….दरअसल..मेरा बेटा अड़ा हुआ है..अर्टिगा के पीछे हाथ धो के पड़ा हुआ है…मान नहीं रहा है..जिद पे अड़ के समझो..ना बैठा हुआ है…ना खड़ा हुआ है..अब कैसे बताऊँ?…बूत्था उसका एकदम….बिलकुल सड़ा हुआ है”…

ertiga

“ओह!…तो मान क्यों नहीं लेते उसकी बात?…कमाते किसके लिए हो?…बाल बच्चों के लिए ही ना?…तो फिर सोचते क्या हो?…जो माँगता है…जैसी माँगता है..ले दो"…

“ऐसे कैसे ले दो?…पूरे 9 लाख का है उसका डीज़ल वाला…डीलक्स वर्ज़न"…

“तो?”…

“तो क्या?…दुनिया भर के वैसे ही फालतू के खर्चे पाल रखे हैं मैंने..कभी इसका रिचार्ज करवाओ तो कभी उसका रिचार्ज करवाओ…कसम से..कभी कभी इतनी खुंदक आती मुझे अपनी इन माशूकाओं पर कि बस…पूछो मत”…

“ओह!…

“ऊपर से ये नवाबजादे..अड़ के खड़े हो गए कि…

“बस!..यही दिक्कत है या कोई और भी परेशानी है?”..…

“जी!…फिलहाल तो बस..यही…इसी ने जीना हराम कर…बेहाल कर रखा है..आगे रब्ब राक्खा”..

“इसकी तो तुम चिंता ना करो…कल से मेरा हर पेशेंट हमेशा की तरह टैस्ट वगैरा के लिए तुम्हारी ही लैब में आएगा लेकिन अब रूटीन टेस्टों के अलावा…अलग से लिस्ट में 2-4 आलतू फालतू के टैस्ट(महँगे वाले) भी होंगे…जिन्हें नहीं करना है”…

“जी!…मैं समझ गया”…

“बस..अपने हिसाब से उनकी रिपोर्ट भर दे देनी है..और कुछ नहीं करना है"..      

“जी!…थैंक्स"…

“खाली जी..जी या थैंक्स से काम नहीं चलेगा…मेरा लिफाफा अब पहले से बड़ा और भारी हो जाना चाहिए"…

“ज्ज…जी!..बिलकुल…ये भी कोई कहने की बात है?”…

“अच्छा!..अब बताओ…सड़क गाँव से शहर जा रही है या शहर से गाँव आ रही है?”…

“हें…हें…हें…मैं तो बस…

“ऐसे ही मज़ाक कर रहा था?”…

“जी!…

{और फोन डिस्कनैक्ट हो गया या कर दिया गया…भगवान् जाने}

हत्या

murder 

"हत्या"

पढना चाहता हूँ मैं...

बड़े प्रेम और लगन से...

मंत्रमुग्ध हो..

पन्ना दर पन्ना...

तुम्हारे उजले...निष्कलंक..अतीत और...

स्वाभीमानी वर्तमान का

ताकि भविष्य में तुम्हारे...

कभी मैं कर सकूँ...

आसानी से...निसंकोच

तुम्हारे ही...उजले चरित्र की...

'हत्या'

फैलसूफियाँ नहीं तो ना सही

angry-1 

“पागल हो गए हैं स्साले सब के सब….दिमाग घास चरने चला गया है पट्ठों का…इन्हें तो वोट दे के ही गलती कर ली मैंने…अच्छा भला झाडू वाला भाडू तरले कर रहा था दुनिया भर के लेकिन नहीं..मुझे तो अच्छे दिनों के कीड़े ने काट खाया था ना?..लो!..आ गए अच्छे दिन..अब ले लो वडेवें…इन स्साले अच्छे दिनों की तो मैं”मैं दांत किटकिटाता हुआ गुस्से से बडबडा रहा था

“क्या हो गया तनेजा जी…ऐसे..इतने गुस्से में किसकी ऐसी तैसी करने पे तुले हैं?”…

“ऐसी तैसी तो हम लोगों की हुई है जनाब..हमने भला किसी ऎसी तैसी करनी है?”मैं अपनी आवाज़ को शाँत करने का प्रयास करता हुआ बोला....

“हुआ क्या?”….        

“जो स्साले वो पहले वाले गा रहे थे..वही सब तो ये भी गुनगुना रहे हैं…फर्क क्या है आखिर..इनमें और उनमें?…एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं स्साले सब के सब”मेरा भुनभुनाना जारी था….

angry

“किसकी बात कर रहे हैं?”स्वर में उत्सुकता थी.…

“शर्म भी नहीं आती पट्ठों को…इनके बाप की कैंटीन में मिलता है 12 रूपए में खाना….स्साले कह रहे हैं कि रोजाना 47 रूपए कमाने वाला गरीब नहीं है”मेरा गुस्सा कम होने को नहीं आ रहा था…

“ओह!…(स्वर में चिंता थी)

“खुद गुज़ारा कर के दिखा दें ना इतने में..स्सालों के चरण धो धो के पिऊँगा पूरी ज़िन्दगी”चैलेन्ज सा करते हुए मेरा बडबडाना जारी था..

angry- 2

“अरे!..काहे को और किस पर इतना कुलबुला रहे हैं?…कुछ बताइये तो सही"शर्मा जी के चेहरे पर प्रश्नवाचक मुद्रा थी..

“अरे!…अपनी इसी निकम्मी सरकार पर…और भला किस पर?”…

“यू मीन…आपका मतलब अपनी मोदी सरकार पर?”आश्चर्यचकित होने के भाव शर्मा जी के चेहरे पर आ जा रहे थे..

“अरे!…काहे की अपनी?…अगर अपनी होती तो भला ऐसा बयान देती कभी?….

“कैसा बयान?”…

“यही कि 47 रूपए एक दिन में कमाने वाला…

“गरीब नहीं है?”…

“हम्म!…

“तो?…आखिर!..गलत क्या है इसमें?…सही ही तो कह रहे हैं बेचारे…

“हुंह!…बेचारे…..अरे!..काहे के बेचारे…अगर सच में सही है तो खुद कर के दिखा दें ना इत्ते में गुज़ारा…किसी ढंग की जगह पे जा के चूतड़ टिकाएंगे तो पता चलेगा कि इतने में तो एक प्लेट मटर कुलचा भी…(मेरा शांत होता गुस्सा फिर बढ़ने को आया)

“अरे!…तनेजा जी…मानिए मेरी बात…अगर ढंग से चला जाए तो….

“47 रूपए में पूरे दिन का गुज़ारा किया जा सकता है?”…

“बिलकुल किया जा सकता है बल्कि मैं तो कहूँगा इससे भी कहीं कम में किया जा सकता है?(शर्मा जी के मुस्कुराते चेहरे पर समझाने वाली मुद्रा हँस खेल रही थी)…

“यू मीन..बन्दा एक टाईम खाए और बाकी के दो टाईम फाका रखे?” उपहास उड़ाते मेरे स्वर में शंका थी…

“हा…हा…हा…..वैसे…मेरा ये मतलब नहीं था लेकिन हाँ!…आईडिया बुरा नहीं है…इससे डायटिंग की डायटिंग हो जाएगी और बचत की बचत भी"…

“फॉर यूअर काईंड इन्फार्मेशन डायटिंग की ज़रूरत अघाए पेटों को पड़ती है ना कि भूख के मारे कमर से पिचके पेटों को”मैं उनका माखौल सा उड़ाता हुआ बोला..

“ओह!…

onion

“अब इसी प्याज का रोना ही ले लो…काटो तो भी स्साला रुलाता है और ना काटो तो भी रुलाता है”मेरा स्वर रुआंसा हो चला था….

onion-1

“हम्म!…

“बड़े कहते थे..अच्छे दिन आएँगे…अच्छे दिन आएँगे…लो!..आ गए अच्छे दिन..अब ले लो वडेवें”…

“लेकिन क्या डॉक्टर ने कहा है कि प्याज के साथ ही खाना खाओ?…अपना..बिना प्याज के भी तो..

“अब जब बन्दर को ही नहीं पता अदरक का स्वाद कैसा होता है तो भला तुम्हें कैसे पता होगा कि प्याज के साथ पके और बिना प्याज के साथ पके खाने में क्या फर्क होता है?”मैं शर्मा जी की तरफ हिकारत भरी नज़र से देखता हुआ बोला….

“महज़ एक प्याज के महँगे हो जाने से कोस रहे हैं आप अपने मोदी जी को?”शर्मा जी मेरे कंधे पे हाथ रख…मुझे समझाने का प्रयास करने लगे..

“अरे!…काहे के अपने?…सपने दिखा के लूट लिया इन्होने तो हमें"मैं भला कहाँ हार मानने वाला था…

“अच्छा अगर मोदी जी के बजाए फिर से मनमोहन जी या फिर राहुल जी प्रधानमंत्री बन जाते तो….

“लाहौल विला अल कुव्वत…शुभ शुभ बोलो शर्मा जी…शुभ शुभ बोलो”शर्मा जी की बात काटते हुए मेरे स्वर में बौखलाहट थी...

“अच्छा!..चलो..अगर साईकिल वाले मुलायम या फिर हाथी वाली बहन जी?”शर्मा जी का हँसना जारी था…

“क्या बात कर रहे हैं शर्मा जी आप भी..इन जैसे चपड़गंजुओं के बस का भला कहाँ लडखडाते हुए देश को सही ढंग से चलाना?…अपनी ऊ.पी का हाल तो देख ही रहे हैं ना आप..कभी जीते जी अपनी मूर्तियाँ लगवा कर तो कभी सरेआम नवयुवतियों को पेड़ पे लटका कर”मेरे चेहरे पे घिन्न..नफ़रत..हिकारत के भाव एक एक कर के आ जा रहे थे…

“वोही तो…मगर महज़ एक प्याज के चक्कर में आप तो..

“बात सिर्फ प्याज की नहीं है शर्मा जी…बात है वादों की…बात है उसूलों की”मैं शर्मा जी बात बीच में ही काटता हुआ बोला….

“उसूल या वादे इसमें क्या करेंगे?….जानबूझ कर तो बारिश नहीं रुकवाई है मोदी जी ने और अगर बारिश ही नहीं होगी तो फसलें क्या ख़ाक होंगी?..महंगाई ने तो अपने आप ही बढ़ना है..

“और जनता ने ऐसे ही बैठे बैठे सड़ना है"…

“वोही तो..जनता सोचती है कि वो खुद आराम से बैठी बैठी..आराम करती फिरे और उनके लिए सारे काम मोदी जी करें"(शर्मा जी भी भला कहाँ हार मानने वाले थे?)…

“कौन सा काम किया है मोदी जी ने हमारे लिए?..जरा बताओ तो कि उसको करने से हमारा फ़ायदा हुआ हो"

“आप शेयरों में डील करते हैं?”…

“कुछ ख़ास नहीं…ऐसे ही एक दो बार ट्राई किया लेकिन कभी काफिया नहीं मिला तो कभी…

“अरे!..मैं उस शेरो शायरी की बात नहीं कर रहा हूँ बल्कि मैं तो शेयर बाज़ार वाले शेयरों की बात कर रहा हूँ"…

“ओह!…अच्छा लेकिन किसलिए पूछ रहे हैं आप?”…

“पहले आप बताइए तो सही..आप शेयरों में डील करते हैं या नहीं?”…

“करता तो था लेकिन अब नहीं?”…

“अब क्यों नहीं?”…

“मंदा ही इतना है कि जिस शेयर में हाथ डालो..उसी में नुकसान होता दिख रहा था..सो..पैसे लगाने बंद कर दिए”…

“ओह!..

“अभी दो महीने पहले..कुल जमा निवेश पर कम से कम पचास हज़ार का घाटा था लेकिन अब..

“अब क्या पोजेशन है?”शर्मा जी के चेहरे पर मुस्कराहट थी..

“ये तो भला हो सैंसैक्स का कि अचानक..एक ही झटके में उछाल आया और सारे घाटे एक ही हफ्ते में पूरे हो गए और अब..अब तो घाटे से उलट पूरे सत्तर हज़ार का फ़ायदा नज़र आ रहा है उसी पुरानी इन्वेस्टमेंट में”मेरी आवाज़ से ख़ुशी छलछला रही थी..

“इसका मतलब फ़ायदा हो रहा है?”…

“हाँ!..फ़ायदा तो हो रहा है"…

“ये किसका चमत्कार है?”शर्मा जी के चेहरे की मुस्कराहट और गहरी हो चली थी.…

“किसका चमत्कार है?”मैं अनजान बनता हुआ बोला…

“अपने मोदी जी का और किसका?"…

“वो कैसे"मैं हार मानने को तैयार नहीं था.. 

“वो ऐसे कि उनके आने से पहले ही देश में अच्छे दिनों के आने का माहौल सा तैयार होने लगा…

“अच्छा?”मेरे स्वर में व्यंग्य था…

“बीच में मत टोको”…

“ओ.के"..

“हाँ!…तो मैं कह रहा था…मोदी जी के आने से पहले ही जैसा माहौल तैयार हो रहा था…उसकी वजह से बाज़ार में दिन पर दिन उछाल आने लगा”…

“तुम्हें तो हर फायदे की चीज़ में मोदी की दिखाई ना देने वाली बोदी ही नज़र आती है और हर घाटे की चीज़ में कांग्रेस या फिर समूचे विपक्ष की कारगुजारियां"मुझसे चुप ना रहा गया…

“तो?…इसमें गलत क्या है?..कलयुगी इतिहास के पिछले सारे पन्ने पलट के देख लो…

“पिछले क्यों?…अगले क्यों नहीं?”मैंने हँसते हुए बीच में टोक दिया…

“अगले पन्ने तो अभी स्वर्णिम अक्षरों में मोदी जी ने लिखने हैंशर्मा जी कौन से कम थे….

“बाद की तो बाद मे.. देख सुन कर ढंग से देखी भाली जाएगी…आप बताओ…आप क्या कह रहे थे?”…

“यही कि कलयुगी इतिहास के पिछले सारे पन्ने पलट के देख लो…हर जायज़-नाजायज़ पंगा कांग्रेस का या फिर उसके तथाकथित सेक्युलर मित्रों(मातहतों) का खड़ा किया हुआ है…चाहे वो कश्मीर समस्या हो…पंजाब या आसाम का उछलता..उफनता आतंकवाद हो या फिर बंगाल..केरल या किसी भी अन्य अशांत प्रदेश का दिन प्रतिदिन..अपना फन फैलाता हुआ नक्सलवाद हो”…

“हम्म…लेकिन ये प्याज तो…

“प्याज को मारिए गोली तनेजा जी और आप मेरी बात..

“क्यों ना तुम्हें ही गोली मार दूँ?…सारा टंटा अपने आप ख़त्म हो जाएगा”(शर्मा जी की जोश से परिपूर्ण बात को बीच में ही काट..मैं तैश में आता हुआ बोला)……

“आप तो खामख्वाह नाराज़ हो रहे हैं तनेजा जी…

“खामख्वाह नाराज़ हो रहा हूँ?…ऐसा तुमने बोल कैसे दिया कि…बिना प्याज के…तुम्हारी इतनी हिम्मत कैसे हो गयी कि हम प्याज के शौकीनों को…

“म्म…मेरा मतलब तो…

“अच्छा..प्याज को छोड़ो..ये बताओ पैट्रोल क्यों महँगा कर दिया?…अब ये मत कहने लग जाना कि इसमें हमारे मोदी जी क्या कर सकते हैं?….पैट्रोल डीज़ल वगैरा की कीमतें तो ईराक में उत्पन्न अंतर्राष्ट्रीय संकट और बाज़ार में कच्चे तेल की चढ़ती उतरती कीमतों की वजह से…

“जब सारा कुछ आप खुदै जानते हैं तो हमसे काहे पूछत हैं?”…

“इसलिए कि देखूँ तो सही अपने मोदी जी के बचाव में इस बार तुम कौन सा नया बहाना गढ़ते हो?”…

“इसमें बहाना गढ़ने जैसी क्या बात है?…जो बात सही है..वो सही है"…

“बस!…बाकी सबका खट्टा और आपके मोदी जी का..मीठा दही है"… 

“एग्जैकटली”.. 

“टट्टू"…

“अच्छा!..चलो छोड़ो…ये बताओ…ये 47 रूपए वाली सच में सही है या फिर…..

“बिलकुल सही है…..100% सही है"…

“मैं तुम्हें शिकारपुर से आया हुआ लगता हूँ?”…

“मैंने ऐसा कब कहा?…मैंने तो बस यही कहा कि…”…

“कहा तो नहीं लेकिन मतलब तो तुम्हारा यही था”…

“वो कैसे"…

“वो ऐसे कि तुम्हारे हिसाब से अगर सोचा जाए तो कोई भी बन्दा बड़े आराम से 47 रूपए में पूरा दिन गुज़ारा कर सकता है?"…

“जी!..हाँ…बिलकुल कर सकता है"…

“वाह!..बहुत बढ़िया"….

“में कुछ समझा नहीं"…

“अच्छा!..ये लो…पूरे 50 रूपए का नोट और वो सड़क पार ‘ज्ञानी नान वाला’ है ना..उससे ज़रा एक प्लेट नान तो पैक करवा के लाओ”..

“मक्खन वाले या बिना मक्खन वाले?”…

“तुम बिना मक्खन वाले ही ले आओ"…

“पेपर प्लेट..नैपकिन वगैरा भी साथ में ले के आऊँ?”..

“हाँ!..लेते आना..अब कौन खामख्वाह बर्तन वगैरा मांजने के चक्कर में पड़ेगा?…तुम्हारी भाभी तो वैसे भी साल में छह महीने अपने मायके में टिकी रहती है"..

“जी!…

“और हाँ..उसको बोलना..चटनी और सलाद अलग से थोड़ा ज्यादा पैक कर देगा”…

“ओ.के"…

“अब खड़े खड़े मेरा मुँह क्या देख रहे हैं?…जाते क्यों नहीं?”…

“जा रहा हूँ लेकिन 50 रूपए से क्या होगा?…और पैसे तो दो"…

“वो किसलिए?”…

“उसके यहाँ नान की प्लेट 90 रूपए की है"…

“लेकिन अभी तो तुम कह रहे थे कि 47 रूपए में आराम से…

“लेकिन मैंने ये कब कहा था कि ‘ज्ञानी’ के नान…

“अच्छा!..चलो…एक काम करो…वो नुक्कड़ वाले ढाबे से ही एक दाल मक्खनी और तीन तंदूरी रोटी ले आओ…बहुत भूख लगी है"मैं तोंद पे हाथ फेरता हुआ व्यग्रता से बोला…

“सादी रोटी या फिर मक्खन मार के?"….

“पेट वैसे ही बाहर निकले जा रहा है…तुम सादी ही ले आओ"…

“लेकिन उसके लिए भी तो कम से कम 120 रूपए लगेंगे?”शर्मा जी के स्वर में असमंजस था…

“तो क्या मटर कुलचे खिला के मेरे पेट में मरोड़ उठवाओगे?”मैं हँसते हुए बोला..

“अब मुझे क्या पता?…मुझे तो जो कहोगे..वही ले आऊँगा”…

“एक काम करो…तुम अपनी मर्जी से..जो भी तुम्हें अच्छा और रुचिकर लगे…ले आओ लेकिन ध्यान रहे…47 रूपए से ज्यादा..बिलकुल नहीं खर्चने हैं और इसी में तीनों टाईम का गुज़ारा भी करना है”…

लो!..धरो अपना पचास का नोट अपने पास..मेरे पास इतना फालतू वक्त नहीं है कि मैं तुम्हारी बकवास सुनता फिरूँ"शर्मा जी उखड़ कर चलने को हुए…

“अरे!…नाराज़ क्यों होते हैं…अभी आप ही तो कह रहे थे कि 47 रूपए कमाने वाला(मैं उन्हें शांत करता हुआ बोला)…

“लेकिन ऐसा मैंने तुम जैसे चटोरों के लिए तो बिलकुल नहीं कहा था"…

“तो फिर किनके लिए कहा था?”…

“मैंने कहा था उस मेहनतकश तबके के लिए जो मेहनत कर के खाना कमाना जानता है"…

“तो आपका मतलब..मैं नाकारा हूँ?….मेहनत नहीं करता हूँ?…मेरी ये दिल को छू लेने वाली..हँसा हँसा कर लोटपोट कर देने वाली…गहरी व्यंग्यात्मक समझ लिए कहानियां क्या ऐसे ही…पलक झपकते ही…अपने आप पैदा हो जाती हैं या फिर आसमान से टपक पड़ती हैं?”…मेरा रोष जायज़ था…

“आप मेरी बात को गलत दिशा में मोड़ रहे हैं जनाब…मैंने आपके लिए ऐसा बिलकुल नहीं कहा था"…

“तो फिर किसके लिए कहा था?”….

“मैंने तो ऐसा उन लोगों के लिए कहा था जो समाज के अत्यंत गरीब तबके से सम्बन्ध रखते हैं”….

“सम्बन्ध तो मेरे भी बहुत बार गरीब तबके से रहे हैं….मेरी कुल जमा 25 माशूकाओं में से तीन माशूकाएँ तो घरों में काम करने वाली कामवालियां थी और चार…चार तो इतनी गरीब थी…इतनी गरीब थी कि उनके पास तन ढकने के लिए भी कभी पर्याप्त एवं प्रचुर मात्रा में पूरे कपडे नहीं हुए..हमेशा पेट दिखाऊ टीशर्ट और जांघे उधेड़ती मिनी स्कर्ट ही नज़र आई मुझे उनके नंगधडंग सुडौल तन बदन पे”…

mini.....

“कमाल करते हैं तनेजा जी आप भी…इतनी सीरियस बातचीत में भी आपको हास्य सूझ रहा है?”…

“इसे हास्य नहीं..व्यंग्य कहते हैं मेरी जान"मैं शरारतपूर्ण ढंग से शर्मा जी के गोरे गाल पे चिकोटी काटता हुआ बोला..

“लेकिन क्यों?”शर्मा जी असमंजस में अपने लाल हो चुके गाल को आहिस्ता से सहलाते हुए बोले…

“क्यों?..क्या?…यही तो मेरा काम है"…

“चिकोटी काटना?”…

“नहीं…व्यंग्य लिखना"…

“लेकिन मेरे हिस्से के डायलाग तो कम से कम मुझे लिखने..ऊप्स..सॉरी..कहने दें"…

“बको"…

“हाँ!…तो मैं बक रहा था..ऊप्स!…सॉरी..कह रहा था…

“क्या?”…

“यही कि…

“47 रूपए में बड़े आराम से तीनों टाईम का खाना खा…गुज़ारा किया जा सकता है?”…

“एग्जैकटली”…

“टट्टू”…

“टट्टू…नहीं..सही में"…

“कैसे?”…

“वो ऐसे कि अपना सिंपल दाल रोटी खाओ और प्रभु के गुण गाओ"…

“दालों के रेट पता हैं?”…

“बिलकुल पता हैं"…

“ख़ाक पता हैं?…एक दाल मक्खनी के प्लेट ही…

“उफ्फ!…तौबा….तुम्हारी ये दाल मक्खनी की प्लेट तो एक दिन मेरी जान ले के रहेगी"…

“मैं कुछ समझा नहीं"…

“नौ दिन में चले बस …अढाई कोस”..

“क्या मतलब?”..

“यही कि यहाँ लिख लिख के मैंने इतने कागज़ काले कर दिए लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात"…

“ज़रा खुल के समझाओ"…

“खुल के या फिर खोल के?”..

“खोल के…

“ओ.के"शर्मा जी खुश हो…अपनी शर्ट के बटन खोलने लगे…

“य्य्य…ये अपनी कमीज़ क्यों खोल रहे हैं"….

“खुद तुमने ही तो कहा कि खोल के..

“मैंने कमीज़ खोलने के लिए थोड़े ही कहा था"…

“तो फिर किसलिए कहा था?”…

“खोल कर समझाने के लिए कहा था"…

“तो?…मैं भी तो खोल ही रहा हूँ"…

“आप तो अपनी कमीज़ के बटन खोल रहे हैं"…

“तो?”…

“कमीज़ नहीं…आप अपनी बात खोल कर समझाएँ"…

“ओह!…लेकिन कमीज़ तो मैं गर्मी की वजह से खोल रहा था…उफ्फ!…कितनी गरमी है इस जुलाई के महीने में भी?”शर्मा जी माथे पे चुह आए पसीने को रुमाल से साफ़ करते हुए बोले....

“हाँ!..गरमी तो बहुत है"..

“और यही गरमी तुम्हारे सर पर भी चढ़ गयी है"…

“वो कैसे?”…

“तभी तो तुम इतने बढ़िया आदमी के खिलाफ..इतनी देर से अंट संट बके चले जा रहे हो"…

“शर्मा जी!..आप मुझे फिर से गुस्सा दिला रहे हैं"मेरे स्वर में तैश उत्पन्न होने को आया…

“ओह!…सॉरी…

“चलिए!..छोड़िए..आप अपनी बात समझाइए”…

“खुल के या फिर खोल के"शर्मा जी हँसते हुए बोले…

“जैसे भी आपका मन करे लेकिन बात समझ में आनी चाहिए"…

“ओ.के…तो फिर पहली बात ये कि अगर 47 रूपए में तीनों टाईम खाने की बात करनी है तो बात करने वाले को सपने नहीं देखने चाहिए"…

“कैसे सपने?…किस तरह के सपने”मेरे स्वर में उत्सुकता थी...

“यही.. ‘ज्ञानी के चूर चूर नान’ या फिर ‘डीलक्स थाली टाईप’ के"…

“ओह!..

“सिर्फ इनके ही नहीं बल्कि इन्हीं के जैसा..किसी भी किस्म का कोई भी सपना नहीं देखना है"…

“यू मीन आउट साईड भोजन..नॉट अलाउड?”…

“एग्जैकटली!..उसके बारे में तो सोचना भी हराम है"…

“ओह!…

“सिर्फ घर में अपने हाथ से बना…सादा खाना खाना है”…

“लेकिन आटे की एक 10 किलो की थैली ही…

“थैली का तो नाम भी ना लो…अपना गेहूँ लो और खुद…

“लेकिन बाज़ार में गेहूँ के भाव भी कौन सा कम हैं?”…

“बाज़ार से खरीदने की ज़रुरत ही क्या है?…सरकार खुद ही 2 से 3 रूपए किलो के बीच गेहूँ दे रही है हर गरीब परिवार को…उसी को लो और…

“खुद ही पीस लो?”…

“नहीं!..यहाँ तुम चक्की की शरण में जा सकते हो"…

“लेकिन चक्की वाले भी तो 5 रूपए किलो से कम में गेहूँ पीस के नहीं देते हैं”..

“तो?”…

“जिन्ने दी बुड्ढी नय्यी…ओने दी ओहदी सिर मुनाई"….

“मतलब?..बाज़ार भाव से तो फिर भी बहुत सस्ता पड़ेगा गेहूँ"… 

“हम्म!…ये बात तो है"…

“वोही तो"….

“उसके बाद?”…

“किसके बाद?”…

“आटा पिसवाने के बाद?”…

“अपना ईंटों का चूल्हा धरो और गरमागरम रोटियां सेंक लो”…

“बिना सब्ज़ी के खाली रोटियाँ क्या कद्दू चबाई जाएँगी?”…

“खाली क्यों?…सब्जी है तो सही"…

“कहाँ पर है?”…

“अभी तुमने खुद ही कद्दू का नाम लिया"…

“मैं?…और कद्दू के साथ रोटी खाऊँगा?…आक्क..(शर्मा जी की बात सुन मुझे उबकाई सी होने को आई)…

“क्या हुआ?”…

“मेरे बस का नहीं है ये कद्दू शद्दू खाना"…

“तो मत खाओ..कोई ज़बरदस्ती थोड़ी है"…

“लेकिन अभी तो आपने कहा कि कद्दू के साथ….

“ओह!..अच्छा…कद्दू का उदाहरण तो मैंने इसलिए दिया कि वो सस्ता होता है…तुम ऐसी कोई भी सब्जी या दाल बना कर खा सकते हो जो बाज़ार में अधिक मात्रा में उपलब्ध होने के कारण सस्ती मिल रही हो"…

“यू मीन जो चीज़ डिमांड में नहीं हो…वही खाई और खिलाई जाए?”…

“मेहमानों को?”…

“जी!..

“वाह!..बहुत बढ़िया…47 रूपए में आप मेहमानों को भी खिलाने की सोच रहे हैं?”… 

“मैं कुछ समझा नहीं"…

“बड़ी ही अजीब किस्म के अहमक हो मियाँ…एक तरफ कह रहे हो कि 47 रूपए में कोई तीनों वक्त का खाना नहीं खा सकता और अब इतनी ही कमाई में मेहमानों को भी जीमाने की सोच रहे हो?”…

“ओह!…इसका मतलब अगर इनसान चाहे तो कम पैसों में भी बड़े आराम से अपना पेट भर सकता है”…

“बिलकुल…एक ख़ास बात और..बहुत कम चाँस ऐसे नज़र आते हैं कि हर कोई अपना खाना अलग से पकाता हो"…

“मैं कुछ समझा नहीं”…

“मेरे कहने का मतलब है कि अगर घर में सभी कमाने वाले हों तो यही छोटी सी रकम भी जुड़ कर एक अच्छी रकम बन जाती है जिससे आराम से पेट भरने लायक गुज़ारा किया जा सकता है"…

“हम्म!…मगर तुम्हारे इस फार्मूले में एक दिक्कत है"…

“क्या?”…

“इसमें फ़ैल सूफियों के लिए ज़रा सी भी गुंजाईश नहीं है"…

“हाँ!…ये बात तो है"….

“वोही तो….

“अच्छा!..चलो..एक बाद बताओ”…

“क्या?”…

“एक आम बेलदार को दिहाड़ी कितनी मिलती होगी?”…

“दिल्ली में?”…

“हम्म!…

“कम से कम 300 –350 रूपए..इससे कम में तो पट्ठे हिलने तक को राजी नहीं होते"…

“हम्म!…फिर तो बड़े आराम से…

“लेकिन रोज़ भला कहाँ सबको काम मिलता है?…बहुत से तो ऐसे ही लेबर चौकों पे महज़ खैनी-गुटखा चबा…खी..खी कर खिसियानी हँसी हँसते या फिर ताश पीटते हुए पूरा दिन गुज़ार देते हैं"…

“दरअसल…ये वो लोग होते हैं जो काम करना ही नहीं चाहते वर्ना ज़्यादा लालच के चक्कर में ना पड़ें अगर तो दिल्ली जैसे शहर में काम की कोई कमी नहीं है"….

“चलो!…मानी तुम्हारी बात कि दिल्ली जैसे शहर में काम की कोई कमी नहीं लेकिन गाँव…कस्बे या देहात का क्या?..वहाँ इनके नखरे कौन और क्योंकर सहेगा?”…

“जिसकी काम करने की नीयत हो ना…उसके लिए काम की कहीं भी कोई कमी नहीं…ये ‘नरेगा’ काम की गारैंटी नहीं तो और क्या है?"…

“क्या है?”…

“साल में कम से कम 100 दिन काम देने की गारैंटी"…

“लेकिन ये योजना तो कांग्रेस ने बनाई थी…

“तो?”…

“आप उसी की याने के एक तरह से कांग्रेस की ही तारीफ़ कर रहे हैं"…

“तो?”…

“लेकिन आप तो पक्के भाजपायी हैं"…

“ये तुमसे किसने कहा?”…

“आप खुद ही तो मोदी…मोदी कर रहे हैं इतनी देर से…

“तो?”…

“और अब कांग्रेस के गुण गा रहे हैं"…

“अरे!…भाई…मैं तो हर उस आदमी के साथ हूँ जो आम आदमी के साथ है"…

“ओह!..अच्छा…

“अच्छा…शर्मा जी…अचानक एक अर्जेंट काम याद आ गया है…मुझे निकलना होगा"…

“लेकिन कहाँ?”…

“एक सीरियल लिखने का ऑफर मिला है"…

“अरे!..वाह..बहुत बढ़िया…अब तो मैं मिठाई खा के ही जाऊँगा"…

“जी!..ज़रूर लेकिन….

“लेकिन?”…

“लेकिन मैंने तो उन्हें इनकार कर दिया था"…

“लिखने से?”…

“जी!…

“लेकिन क्यों?”…

“पैसे बहुत कम दे रहे थे"…

“ओह!..तो अब वहाँ जा के क्या करेंगे?”….

“उन्हीं के कहे दामों पर लिखने की सोच रहा हूँ"…

“अचानक इरादा कैसे बदल लिया?”…

“बच्चे भी तो पालने हैं शर्मा जी….फैलसूफियाँ नहीं तो ना सही"…

(कथा समाप्त)

फैलसूफियाँ- ऐश करना

***राजीव तनेजा***

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इश्क कैसे कैसे

“ओह!…शिट..पहुँच जाना चाहिए था अब तक तो उसे….पता भी है कि मुझे फिल्म की स्टार्टिंग मिस करना बिलकुल भी पसंद नहीं”…

“कहीं ट्रैफिक की वजह से तो नहीं…इस वक्त ट्रैफिक भी तो सड़कों पे बहुत होता है लेकिन अगर ऐसी ही बात थी तो घर से जल्दी निकलना चाहिए था उसे"सड़क पे भारी जाम देख बडबडाते हुए मेरे चेहरे पे चिन्तायुक्त झल्लाहट के भाव थे…

waiti8ng

“चलो!…माना कि किसी वजह से घर से ही देर से निकला होगा और फिर ट्रैफिक में भी फँस गया होगा मगर फोन तो उठाए कम से कम मेरा”माथे पे चुह आए पसीने को पोंछते हुए मैं इधर उधर टहलता हुआ बडबडा रहा था…

“कहीं किसी एक्सीडैंट में मर खप्प ना गया हो पट्ठा?”..सोचते सोचते अचानक मैं हडबडा कर रुक गया

“न्न…नहीं…ऐसा नहीं हो सकता है…शुभ शुभ बोल…बेटे…शुभ शुभ बोल”छाती पे क्रास बना..मैं हिन्दू होने के बावजूद क्रिश्चियन तरीके से प्रार्थना करता हुआ बोला….

“ट्रैफिक में ही कहीं फँस गया होगा..बेचारा”..

“हुंह!…बेचारा…इस बार तो इसको बोल के गलती कर दी मगर अगली बार नहीं"मैं खुद ही अपनी सोची हुई बात को काट रहा था

“एक्सक्यूज़ मी…क्या आप किसी की वेट कर रहे हैं?”अचानक एक महिला स्वर से मेरी तंद्रा टूटी

girl

“ज्ज…जी…(पलट के देखो तो एक लगभग मेरी ही हमउम्र की खूबसूरत लड़की मुझसे मुखातिब हो पूछ रही थी

“अपने फ्रैंड की वेट कर रहा हूँ…फिल्म शुरू होने वाली है और वो कमबख्त है कि अभी तक आया ही नहीं"..

“ओह!..सेम हियर….मैं भी अपने फ्रैंड की वेट कर रही हूँ"….

“जी…एक बार फिर से ट्राई कर के देखता हूँ…शायद…"मैं जेब से मोबाईल निकाल कीपैड पे उँगलियाँ चलाता हुआ बोला…

“मैं भी"लड़की अपनी काजलयुक्त बड़ी बड़ी आँखें फोन में गड़ा..उसी में मग्न हो गयी…

“दरअसल….ये लडकियाँ होती ही हैं इस टाईप की..एकदम लापरवाह….दूसरों की तो चिंता होती ही नहीं है इन्हें बिलकुल भी”मैं फोन छोड़…लड़की की तरफ देखता हुआ बोला…

“हम्म!…अपना मेकअप शेकअप में बिज़ी होगी”लड़की का ध्यान उसके फोन में ही था…

“हाँ!..यही हुआ होगा”…

“हम्म!…

“गलत…बहुत गलत बात है ये तो..कम से कम सोचना चाहिए कि उसकी फ्रैंड यहाँ धूप में खड़ी इंतज़ार कर रही है उसका और वो है कि अपना मेकअप शेकअप”सहज आकर्षण के चलते..बातों बातों में मेरी ये बात बढाने की कोशिश थी

“एक्सक्यूज़ मी…क्या आप मेरे बारे में बात कर रहे हैं?”…

“जी!…और नहीं तो क्या अपने फ्रैंड के बारे में बात कर रहा हूँ?”मैंने हँसते हुए उससे खुलने का प्रयास किया

“फॉर यूअर काईंड इन्फोर्मेशन मैं यहाँ किसी लड़की का नहीं बल्कि अपने बॉय फ्रैंड की वेट कर रही हूँ”..

“ओह!…सेम पिंच…मैं भी यहाँ किसी लड़की का नहीं बल्कि लड़के का वेट कर रहा हूँ"जाने मुझे क्या सूझा और ये कहते हुए मैंने झट से आगे बढ़ उसकी नंगी बाहं पे चिकौटी काट ली

“हाउ डेयर यू टू टच मी लाईक दिस?….तुम्हारी इतनी हिम्मत कैसे हो गयी मुझे…मुझे छूने की?”लड़की हांफती हुई चिल्लाई…

इसके साथ ही तड़ाक तड़ाक की आवाज़ के साथ मेरे बाएँ गाल पर पाँचों उंगलियाँ छप चुकी थी..

slap-1

“स्स…सॉरी…..सॉरी…मैडम…म्म…मेरा ऐसा कोई गलत इरादा नहीं था लेकिन…प्प..पता नहीं कैसे….

“सब समझती हूँ मैं तुम जैसे सड़कछाप मजनुओं की चालबाज़ीयाँ…ज़रा सी लिफ्ट दी नहीं किसी लडकी ने कि सीधे उसके साथ बिना घर बसाए तूँ तड़ाक करने की सोचने लगते हैं…तुमसे दो मिनट बात क्या कर ली….छूने छुआने तक पहुँच गए…बुलाऊँ क्या मैं अभी पुलिस को?…

“म्म….मैं तो बस…ऐसे ही….लेकिन आपने भी तो…

“हुंह!…ऐसे ही…अब अगर मैं भी यही कहूँ कि मैंने भी ऐसे ही थप्पड़ मार दिया था…तो?”लड़की का तिलमिलाना जारी था…

“म्म्म..मैडम जी…प्प…प्लीज़ मानिए मेरी बात को….म्म…मैं ऐसा लड़का नहीं हूँ”मैं विनीत स्वर में लगभग मिमियाता हुआ सा बोला…

“लड़की तो यार…मैं भी ऐसी नहीं हूँ….तुमने ही गुस्सा दिला दिया मुझे….मैं क्या करूँ?”लड़की का स्वर नरम पड़ चुका था…

“इट्स…ओ.के…कोई बात नहीं…गलती मेरी ही है..मुझे ही ध्यान रखना चाहिए था"मैं अपना गाल सहलाता हुआ आहिस्ता से बोला…

“ज्यादा जोर से लगी?”…

“न्न…नहीं तो…कुछ ख़ास नहीं"…

slap

“झूठे!…सच सच बताओ ना…बहुत जोर से लगा था ना?”लड़की पास आ…मेरा गाल को हौले से सहलाते हुए बोली…

“य्य्य…ये क्या कर रही हैं आप?…दद…दूर हटिए…कोई देख लेगा"…

“तो?…देख लेगा तो देख लेगा…ये सब तो आम चलता है यार आजकल"…

“लेकिन मैं इस टाईप का नहीं हूँ"….

“तो फिर किस टाईप के हो?”लड़की फिर नज़दीक आ..मुझसे सटने का प्रयास करने लगी……

“कोई फायदा नहीं….मैं तो ‘गे' हूँ"मैं उसे लगभग चिढाता हुआ बोला…

“कक्क..क्या?”…

“जी!…

“हम्म!…लेकिन लगते तो नहीं किसी भी एंगल से"लड़की मुस्कुराते हुए मेरा ऊपर से नीचे तक सघन रूप से मुयायना करते हुए बीच में रुक गयी…

“इसमें लगने जैसी क्या बात है?…गे भी तो आम लड़कों जैसे ही होते हैं”मैं सफाई देता हुआ बोला…

“हाँ!..उनके कोई अलग से सींग थोड़े ही उगे होते हैं?”…

“जी!…

“लेकिन यार…एक बात बताओ…अच्छे भले हैंडसम हो…ये गे वे के चक्कर में कैसे पड़ गए?”…

“अब क्या बताऊँ?…कोई ढंग का साथी नहीं मिला तो…

“तो जो मिला..उसी को अपना लिया?”…

“हम्म!..उसी के साथ ही तो फिल्म…

“ट्रिंग…ट्रिंग…

“ओह!…एक मिनट…उसी का फोन है…

“हाँ…हैलो…

“क्या?..

“अभी कहाँ पर है?….बस दो मिनट में ही चालू होने वाली है….तू बता तो सही…हैं कहाँ पर?”…

“क्या?…अभी तक वहीँ पर है?….तो स्साले…ठीक क्यों नहीं करवा के रखता है?”..

“अब मर खप्प वहीँ…मैं भी जा रहा हूँ”….

“ना…बिलकुल नहीं…मेरे बस का नहीं है अकेले फिल्म देखना…मैं भी वापिस जा रहा हूँ”…

“गलती हो गयी जो तेरे साथ फिल्म देखने का प्रोग्राम बनाया…भाड़ में जा तू और भाड़ में जाए तेरी कार”कहते हुए मैंने गुस्से में टिकटें फाड़ दी ..

“शिट्ट…शिट…शिट…शिट

“क्या हुआ?”…

“कुछ नहीं यार…सारा मूड ऑफ हो गया…इतने दिनों बाद पिक्चर का प्रोग्राम बनाया और वो भी कैंसिल”…

“ओह!…

“सारे मूड की ऐसी तैसी हो गयी”….

“लेकिन टिकट तो कम से कम…

ट्रिंग ट्रिंग….

“शश्श…उसी का फोन है….एक मिनट"लड़की मुझे चुप रहने का इशारा करती हुई बोली..

“हाँ….हैलो….कहाँ हो तुम?”….

“पता है कितनी देर से तुम्हारा इंतज़ार कर रहीं हूँ और तुम हो कि….पता है ना तुम्हें कि मुझे धूप में एलर्जी हो जाती है”…

“अच्छा…और कितनी देर लगेगी?…जल्दी से आ जाओ ना जान”…

“लव यू”…

on phone

“व्हाट?….तुम्हारा मतलब टिकट भी अभी लेनी है?….इतने दिन पहले से क्या तुम झक्क मार रहे थे?…अगर पहले ही मुझे कह देते तो अब तक मैं ले चुकी होती….तुम्हारे साथ तो ना…कोई प्रोग्राम बनाना ही फ़िज़ूल है”…

“अच्छा…अच्छा..अब ड्रामा ना करो…मैं ले रही हूँ टिकट…तुम बस..फ़टाफ़ट आ जाओ”  

“क्या हुआ?”…

“कुछ नहीं…पागल का बच्चा..मुझे कह रहा है टिकट लेने के लिए….शर्म भी नहीं आती"…

“वैसे अगर आप बुरा ना मानें तो एक बात कहूँ?”…

“हाँ-हाँ…बिलकुल"…

“ये आजकल के लड़के बड़े ही चालू होते हैं"…

“चालू मतलब?’….

“मतलब..चालाक बहुत होते हैं…अपने पल्ले से एक पैसा खर्च नहीं करना चाहते…सोचते हैं कि सारे पैसे….

“अरे!…नय्यी यार…मेरा रौनी बिलकुल भी ऐसा नहीं है…वो तो बाय चाँस….

“पर्स आज घर पे भूल आया?”…

“अरे!…तुम तो जीनियस हो यार…तुम्हें कैसे पता कि….

“बस!…ऐसे ही तुक्का मारा और वो फिट हो गया"…

“फिट नहीं…हिट हो गया"…

हा….हा…हा…(हम दोनों की हँसी का समवेत स्वर)

“अब क्या इरादा क्या है जनाब का?”…

“इरादा क्या होना है?…घर जा के वही फेसबुक..ट्विटर…

“छोड़ ना….ट्विटर शविटर..चल!…तू भी हमारे साथ फिल्म देख”…

“लेकिन वो..तुम्हारा बॉय फ्रैंड?”…

“उसको भला क्या पता चलेगा?”…

“मैं कुछ समझा नहीं"…

“तुम मर्दों में…ऊप्स सॉरी..गेओं में यही तो कमी होती है कि काम की बात कुछ समझते नहीं"…

?…?…?…?

“एक काम करो…तुम पहले जा के सीट पे बैठ जाना…उसने वैसे भी अन्दर ही मिलना है..उसे आने में थोड़ा देर हो जाएगी"…

“देख लो…तुम्हें कोई दिक्कत ना हो जाए मेरी वजह से"…

“अरे!..कोई दिक्कत नहीं होगी…तुम चिंता ना करो"…

“जब तुम्हें कोई दिक्कत नहीं तो भला मुझे क्या दिक्कत हो सकती है?”….

“ओ.के…तुम यहीं रुको…मैं टिकट लेकर…

“पागल हो क्या?…मेरे होते हुए तुम भला क्यों टिकट खरीदोगी?”…

“लेकिन यार…ये कुछ ठीक नहीं लग रहा है मुझे”…

“क्या?”…

“यही कि मैंने ही तुम्हें साथ में फिल्म देखने के लिए इनवाईट किया और मैं तुमसे ही पैसे खर्च करवा रही हूँ"…

“अरे!..छोड़ो ना..इस बार मैं खर्च कर देता हूँ..अगली बार तुम खर्च कर देना"…

“वैरी गुड…तो आज के बाद भी जनाब का मेरे साथ फिल्म देखने का इरादा है?”…

“हाँ-हाँ..क्यों नहीं…लेकिन वो कबाब में….

“यू मीन…रौनी?”…

“एगजैकटली”..

“यू नॉटी बॉय"वो मेरा गाल खींचते हुए बोली…

“शश्श…यहाँ नहीं…हॉल में…कहीं रौनी ने देख लिया तो"मैं उसे इशारा कर समझाता हुआ बोला..

“हम्म!…कलेवर बॉय”वो सावधानी से इधर उधर देख मुस्कुराते हुए बोली…

“अच्छा अब देर ना करो…और फटाफट टिकट ले आओ…और हाँ…कार्नर सीट की टिकटें बिलकुल भी मत लाना”…

“क्यों?…क्या हुआ?…

“अरे!…तुम्हें नहीं पता..ये रोंनी का बच्चा कितना नॉटी है"…

“मुझसे भी ज्यादा?”मैं एक आँख दबा मुस्कुराता हुआ बोला…

“अब मुझे क्या पता…ये तो आज़माने पर ही पता चलेगा”उसके चेहरे पे शरारत तैर रही थी..

“अच्छा?…अभी बताऊँ?”मैं आगे बढ़ता हुआ बोला…

”न्न…यहाँ नहीं…अन्दर हाल में"…

“उसके होते हुए भला कहाँ मौका मिलेगा यार?”मैं उदास होने का उपक्रम करता हुआ बोला…

“अरे!..चिंता क्यों करते हो?…मैं हूँ ना…मौका लगते ही….

“प्रामिस?”…

“पक्का प्रामिस"…

“वाऊ"मेरे चेहरे पे ख़ुशी छलके जा रही थी..

“अब ये वाऊ शाऊ छोड़ो और जा के फ़टाफ़ट टिकट ले आओ…”..

“हाँ..बस…मैं यूँ गया और यूँ आया”..

“यूँ जाओ तो सही लेकिन आना नहीं”…

“मैं कुछ समझा नहीं"…

“अरे बाबा..वहीँ से एक टिकट लेकर अन्दर चले जाना और बाकी के दो टिकट गेटकीपर के पास ही छोड़ देना कि मधु नाम की एक लड़की आएगी..उसी को दोनों टिकट दे देना

“अरे!…वाह..ये तो कमाल हो गया"…

“क्या?”…

“मैं तो तुम्हारा नाम ही पूछना भूल गया"…

“तो अब कौन सा गाडी निकल गयी है…अब पूछ लो"…

“तुम्हारा नाम क्या है मधु?”…

“मधु"….

“वाऊ..बड़ा प्यारा नाम है…मधु"…

“थैंक्स"…   

“अब जा के फ़टाफ़ट टिकट ले आओ"…

“आओ?…अभी तो तुम कह रही थी कि वापिस आना नहीं"…

“हाँ-हाँ वही….अब जाओ भी"मधु मुझे प्यार से धक्का देती हुई बोली…

“कमाल है…कभी कहती हो…आओ भी…अब कह रही हो जाओ भी"…मैं हँसता हुआ टिकट खिड़की की तरफ बढ़ गया

छुट्टी का दिन होने की वजह से सिनेमा हॉल में काफी भीड़ थी…होनी ही थी…टॉप का बैनर…बढ़िया म्युज़िक…दमदार पटकथा…सबसे खूबसूरत हिरोइन और ऊपर से सुपर स्टार ‘xxx खान’…और भला क्या चाहिए जनता को?……

खैर…मर मरा के जैसे तैसे बीच की रो(Row) में कार्नर से पांचवी..छटी और सातवीं सीट मिली…दो टिकट गेटकीपर को थमा..मैं हाल के अन्दर जा अपनी सीट संभाल के बैठ गया….

crowded cinema hall

फिल्म शुरू हो चुकी थी…यही कोई दो चार मिनट बाद मधु भी हाथ में पॉपकार्न का बड़ा वाला डिब्बा ले मेरे साथ वाली सीट पे आ कर बैठ गयी…और फुसफुसाते हुए बोली “मैंने सीट नंबर रौनी को व्हाट्सएप कर दिया है”…

“ओ.के"…

“तुम बस…थोड़ा ध्यान रखना..उसके सामने मुझसे कोई बात नहीं करना"…

“ओ.के जान…”कहते हुए मैंने हौले से उसके हाथ पे किस कर दिया…

उसकी तरफ से कोई विरोध ना पा कर मेरा हौंसला बढ़ने ही वाला था कि वो फुसफुसाई"…रौनी आ गया"…

“ओह!..शिट”मैं मन ही मन बुदबुदाया और स्क्रीन पर चल रही फिल्म की तरफ अपना ध्यान केन्द्रित करने का प्रयास करने लगा…लेकिन भला अब फिल्म में मन लगता भी तो लगता कैसे?…सीन दिमाग के ऊपर से निकलते जा रहे थे…कुछ समझ नहीं आ रहा था…सब दृश्य आपस में  गडमड हो रहे थे…बीच में मौका निकाल कई बार मधु पॉपकार्न का डिब्बा मेरी तरफ बढ़ा देती…पॉपकार्न लेने के बहाने मैं जानबूझ कर उसकी नरम कोमल उँगलियों को छूने के सौभाग्य को अपने से दूर नहीं कर पा रहा था…लेकिन बीच बीच में जब मुझे मधु की रौनी के साथ बात करते हुए अचानक खिलखिलाने की आवाज़ सुनाई देती…मेरी छाती पे ढेरों साँप से लोटने लगते

इस बीच इंटरवेल होने पर जब हॉल की बत्तियां जल उठी…मैंने अनजान बनते हुए रौनी का चेहरा देखने के लिए उसकी तरफ मुंह किया तो हाल में एक साथ तीन चीखें सुनाई दी…एक चीख मेरी…दूसरी रौनी की और तीसरी हम दोनों की चीखें सुनंने के बाद मधु की चीख थी…

surprised

मैं जोर जोर से चिल्ला रहा था…”स्साले!…तू ‘रौनक’ से ‘रौनी’ कब हो गया?”…

और वो मेरा गला पकड़ा मुझ पर चिल्ला रहा था… “तूने तो स्साले…मेरे सामने ही टिकट फाड़ दी थी…फिर हाल में कैसे आ गया?”…

कुछ देर बाद…फटी कमीजों और चेहरे पे खरोंचों के निशानों के साथ हम दोनों चिल्ला रहे थे…

”अरे!..भाई…कोई डॉक्टर को बुलाओ…मैडम बेहोश हो गयी है"…

***राजीव तनेजा***

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