"कविता के किटाणु कुलबुलाने लगे हैँ"

"कविता के किटाणु कुलबुलाने लगे हैँ"

***राजीव तनेजा***



सुप्त भावनाओं के अशांत अथाह गहरे समुद्र में
विचारों के भंवर हरदम गोते लगाने लगे हैँ
पंछी पौधे पेड नदी नाले सब मुझे भाने लगे हैँ
मैँ शब्दों को और शब्द मुझे अपनाने लगे हैँ

शायद कविता के किटाणु कुलबुलाने लगे हैँ

काम धन्धा व्यापार पैसा जैसे निष्ठुर कठोर शब्द
मेरी डायरी से एक एक कर मिटने लगे हैँ
प्रेम प्यार बेवफाई जैसे शब्द रोज़ जुडने लगे हैँ
आशिक माशूका जैसे पात्र अब मुझे लुभाने लगे हैँ

शायद कविता के किटाणु कुलबुलाने लगे हैँ

उल्टे सीधे आडॆ तिरछे सवालों की लप लपालप
बेतुके बेडौल विचारों के किलोल करते जमघट
वक्त बेवक़्त मुझे तिगनी का नाच नचाने लगे हैँ
शक नहीं अब तो पक्का यकीन है मुझे कि

कविता के किटाणु कुलबुलाने लगे हैँ

शेर शायरी ओ नज़्म जैसे लेख रास आने लगे हैँ
गीत मेरे ब्लॉगजगत में यदाकदा मंडराने लगे हैँ
आस पडोस के बच्चे तक उन्हें गुनगुनाने लगे हैँ
मैँ उनको और वो मुझे कुछ प्यारे से लगने लगे हैँ

शायद कविता के किटाणु कुलबुलाने लगे हैँ

नए विष्यों को ढूँढने तलाशने की चाह में
बोझिल कदमों को सफर अब रास आने लगे हैँ
लेखक कवि ब्लॉगिया कह लोग मुझे बुलाने लगे हैँ
इसी नाते लोग मुझे पहचानने लगे हैँ

सच...कविता के किटाणु कुलबुलाने लगे हैँ

हाँ...कविता के किटाणु कुलबुलाने लगे हैँ

"अविनाश वाचस्पति जी को समर्पित"

***राजीव तनेजा***

2 comments:

sunita (shanoo) said...

कुछ जतन कर मेरे भाई की पंक्तिया आज भी बच्चा-बच्चा गुनगुनाता है,बहुत अच्छे राजीव जी...
तस्वीर भी खूबसूरत लग रही है...

अविनाश वाचस्पति said...

राजीव जी विजयी भव
कविता कानन में अब
छा गए होकर मदमस्त
हो रहे हो तेजी से सिद्धहस्त
इसी तरह छाते रहो
कविता की ऐसी बारिश करो
छाते सब फेल हो जाएं
जन गण मन सब आपकी
पंक्तियां गुनगुनाते भीगें

 
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