"ना हींग लगी ना फिटकरी...रंग चढा चोखा ही चोखा"



"ना हींग लगी ना फिटकरी...रंग चढा चोखा ही चोखा"

***राजीव तनेजा***




"शर्मा जी मुबारक हो"....

"लालू ने इस बार बजट बड़ा ही धांसू पेश किया है".....

"बिना लड़े ही ज़्यादातर विरोधी पहले फटके में ही चारों खाने चित्त"मैँ ट्रेन में चढते वक्त शर्मा जी से बोला


"अजी काहे का धांसू बजट?"मेरे पीछे पीछे आ रहे गुप्ता जी बोले

"सब आँकड़ों का खेल है...

"दरअसल!...खोखले मुनाफे का ऐसा मकड़जाल बुना है हमारे चारों तरफ लालू ने कि उनके बजट की असलियलत जानने में ही कई महीने लग जाएंगे"...

"और जान पाएं...इसकी भी कोई निश्चित गारंटी नहीं"


"बेटा!..दरअसल सच्चाई तो ये है कि तब तक इलैक्शन हो चुके होंगे और...

जो मलाई इस सब से मिलनी होगी उसे तब तक आराम से लालू चाट चुका होगा"शर्मा जी अपना बैग ऊपर वाली बर्थ पे रखते हुए बोले

"बड़ी भोली है हमारे देश की जनता...ऊपर से इसकी भूलने की बिमारी...बस!...तौबा ही तौबा"...


"हम्म!...इसका मतलब कि कुनैन की कड़वी गोली के माफिक सच्चाई ये है कि. ...

हज़ारों करोड़ के मुनाफे वाली भारतीय रेलेवे अपनी मूल संपत्ति से भी हाथ धो बैठेगी?"मैँ बात को समझने की कोशिश कर रहा था


"बिलकुल..."...

"मायवी इन्द्रजाल दिखा सबको उल्लू बना दिया गया है"शर्मा जी दार्शनिक अंदाज़ में बोले...


"बाप रे!....ऐसा तगड़ा 'इल्यूज़न' कि...पूरा देश एक ही वार में बावला हो उठा...बाप रे..."मेरे चेहरे पे हैरत का भाव था


"पुराने खेल है ये उनका...तजुर्बेकार खिलाड़ी जो ठहरे"...

"जानते जो हैँ कि पब्लिक रूपी गेंद को कैसे अपने पाले में किया जाता है" गुप्ता जी ज़रा सी जगह मिलती देख झटके से सीट कब्ज़ाते हुए बोले

"जो भी वायदे किए हैँ उन्होंने...आने वाले दस साल तक तो पूरे होने से रहे"


"वो कैसे?"मेरे चौखटे पे प्रश्न मंडरा रहा था ...


"वो ऐसे...कि खुद रेलेवे वालों को ही नहीं पता है कि कौन सी ट्रेन पापुलर है और कौन सी अन-पापुलर"


"उस से क्या फर्क पड़ता है?"मैँ अज्ञानी गुप्ता जी का चेहरा पढने की कोशिश कर रहा था


"फर्क ये पड़ता है मेरे लाल!...कि. ...

जो सात परसैंट(7%) की छूट मिलनी 'ए.सी.' ट्रेन में सफर करने वालों को ...वो सिर्फ और सिर्फ पापुलर ट्रेनों को ही मिलनी है"


"और वो भी पूरे साल नहीं...सिर्फ तीन महीने"गुप्ता जी के बजाय शर्मा जी मेरा ज्ञान बढाते हुए बोले...



"यानि के कुल छूट कितनी?"..

"सिर्फ तीन परसैंट(3%)"मैँ मन ही मन गणितीय हिसाब किताब लगा खुद ही अपने सवाल का जवाब देता हुआ बोला


"हाँ!...बाकि साल पूरे पैसे भरने हों तभी 'ऐ.सी' ट्रेन में सफर करने के सपने देखो" गुप्ता जी बोले


"लेकिन!.. मैँने तो सुना है कि महिलाओं का खास ख्याल रखा है इस बार लालू ने"मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था


"माँ दा सिर्र!...ख्याल रखा है"...

"अब इसे ही लो!..ये भी कोई तुक हुई कि साठ साल से ऊपर की महिलाओं को ट्रेन में मुफ्त सफर"...

"अब कोई लालू से पूछे कि...बुढापे की उनकी ये उम्र...भजन-कीर्तन की है या रेलगाड़ियों में मौज करने की?"

"सब वोटों की राजनीति है...राजनीति"शर्मा जी भड़क उठे...


"इसका मतलब!...करना कराना कुछ है नहीं...बस यूँ ही फोकट में सीधा घर की चौधराईन की भावनाओं पे चोट कर डाली?"मैँ असमंजस में था ...


"अब तो सभी औरतों के वोट पक्के ही पक्के समझों"....

"ज़रूर राबड़ी से राय ली होगी इसकी"काफी देर से चुप अनुराग भी हमारी बातचीत में शामिल हो चुका था


"बढिया है...इसी बहाने कम से कम अपने को 'थर्टी प्ल्स' से ऊपर ना जाने देने वाली औरतें...अपनी सही उम्र तो उगलेंगी"शर्मा जी हँस पड़े


"सवाल ही नहीं पैदा होता...मरती मर जाएंगी लेकिन....अपनी असली उम्र?"...

"कभी नहीं!....कभी नहीं"मैँ औरतों के माफिक कमर हिला मुँह बनाता हुआ बोला


"हा...हा...हा "मेरी बात सुन बोगी में बैठे सभी यात्रियों के चेहरे पे हँसी खिल उठी...सिवाय साथ बैठी मैडम के"

"उन्हें अपनी तरफ घूरता देख मुझे पता नहीं क्या सूझी और मैँने उनके साथ खाली पड़ी सीट पे झट से अपना बैग रख दिया"


"रिज़र्वड सीटे है ये"....


"तो हम भी कौन सा इसे अपने साथ लिए जा रहे हैँ?"गुप्ता जी भी मौका ताड़ ऊपर वाली बर्थ पर चढते हुए बोले


"अरे भईय्या!...ऊपर मत बैठो...काँच का सामान है... टूट जाएगा"साथ वाली सीट पर बैठे सज्जन बोल पड़े


"आप चिंता ना करें ...कुछ नहीं बिगड़ेगा"गुपा जी उसका झोला साईड में करते हुए बोले...

"बस आधे घंटे का ही सफर है"....

"थोड़ा एडजस्ट तो करना ही पड़्ता है"...


"लुधियाना के चले...अभी तक एडजस्ट ही तो करते आ रहे हैँ"...

"कभी इसके साथ तो कभी उसके साथ"....

"हर कोई घंटे..आधे घंटे की कह कब्ज़ा जमा लेता है"....

"कोई फायदा नहीं हुआ स्लीपर में टिकट बुक करवाने का....

इससे तो अच्छा था कि बस में ही सफर कर लेते"वो मैडम बुरा सा मुँह सा बनाते हुए बोली


"टिकट है आपके पास?'...

"एम.एस.टी है"....

"एम.एस.टी'...माने?"

"डेली पैसैंजर हैँ मैडम जी...हम लोग"...

"आप तो एक दिन का टिकट ले चौड़ी हो रही हैँ यहाँ हम तो तीन महीने का एडवांस दे 'पास' लिए बैठे हैँ"...

"ये देखो...."मैँ जेब से पर्स निकाल पास दिखाता हुआ बोला"


"आपका 'पास' क्या अलाउड होता है स्लीपर में भी?"मैडम हमारी तरफ देखते हुए बोली


"जी!....जी नहीं...होता तो नहीं है लेकिन मैंनैज हो ही जाता है किसी तरीके से ...


"जब आपका 'पास' अलाउड नहीं होता है तो क्यों घुसे चले आते हो स्लीपर में बेवजह बाकियों को तंग करने के लिए?"...

"अपना जनरल डिब्बे में सफर करो आराम से"मैडम बड़बड़ाई


"सही कह रही हैँ मैडम जी आप!....सफर ही तो कर रहे हैँ हम"

"बस आप उर्दू वाला सफर कर रही हैँ और. ..

हम अँग्रेज़ी वाला सफर(Suffer) कर रहे हैँ....यानि के कष्ट झेल रहे हैँ"मैँ अपना अँग्रेज़ी ज्ञान बघारता हुआ बोला


"आपका तो गाहे-बगाहे आना-जाना होता है ट्रेन में.....थोड़ा कष्ट सह लेंगी तो कोई आफत नहीं टूट पड़ेगी"शर्मा जी ने मेरी बात में साथ दिया


"हमसे पूछो....कि कैसे हमारे दो घंटे सुबह...और दो घंटे...शाम को ट्रेन में बेतरतीब हिचकोले खाते गुज़रते हैँ"ऊपर वाली बर्थ से गुप्ता जी बोले....

"कई बार तो खड़े-खड़े ही कब पानीपत से दिल्ली आ जाती है....पता भी नहीं चलता"

"खड़े-खड़े कमर का कूंड्डा होना तो रोज़ की बात है"...

"थोड़ी देर के लिए बस कमर भर टिकाने को जगह मिल जाए...यही बहुत है हमारे लिए"...गुप्ता जी ऊपरी बर्थ पे पसरते हुए बोले

"बस कुछ यूं समझ लो कि घर तो हम बस सोने के लिए ही जाते हैँ" वो उबासी लेते हुए बोले


"क्या करें?...दिल्ली के बाशिन्दे होने के बावजूद हमारा दाना-पानी जो यहाँ हरियाणे में लिखा है"अनुराग उदासी भरे चेहरे से मैडम को देखता हुआ बोला


"ठीक है...बैठ जाओ"...मैडम को शायद अनुराग पे तरस आ गया था


"स्साला!...नौटंकी कहीं का...कोई मौका हाथ से जाने नहीं देता"मैँ मन ही मन बड़बड़ाया


"सभी धक्के खा रहे हैँ...कोई नौकरी बजाने के चक्कर में...तो कोई छूटती नौकरी बचाने के चक्कर में"...

मैडम का सुन्दर चौखटा देख दहिया भी कहाँ पीछे रहने वाला था ...


"तो कोई हम जैसा दिल्ली से सीलिंग की मार झेल कर आया है"मैँ बातचीत में खुद को पीछे छूटता देख झट से बोल पड़ा....


"आपको हमारे चेहरे खिलखिलाते दिख रहे हैँ लेकिन अन्दर ही अन्दर हम जानते हैँ कि हमारे साथ क्या बीत रही है"

"कोई भी तनाव से मुक्त नहीं है....किसी को कोई टैंशन...तो किसी को कोई"अनुराग लगातार मैडम को पटाने की कोशिश में था


"बस!...हमारे इस राजीव को छोड़ कर...इसे कोई टैंशन नहीं..."शर्मा जी मेरी तरफ इशारा कर हँस दिए....


"हुँह!...टैंशन नहीं...अब ये बैठा बैठा अनुराग क्या दे रहा है?" ....

"टैंशन ही ना...?"मैँ अन्दर ही अन्दर खुद से बोल रहा था


"खैर...जो भी हो...बातों बातों में माहौल तो हँसी खुशी वाला हो ही चुका था"

"सो!...हम सभी खुल के मैडम से इधर-उधर की बतियाने में जुट गए"


"आपको हर किस्म..हर तबके के लोग मिलेंगे हमारे बीच में"....

"एक से एक हाई-फाई जैंटलमैन और...एक से एक लफूंडर छाप भी"दहिया बोला...


"अब इसी को देख लो....'शास्त्री' नाम है इसका....कहने को तो संस्कृत का अध्यापक है लेकिन...

आपको किसी भी एंगल से ये अध्यापक दिख रहा है?"दहिया हँस पड़ा


"नहीं ना?"...


"ये लेटेस्ट फैशन से कटे बाल"...

"ये तंग मोरी की टाईट जींस"...

"ये गले में रंगबिरंगा स्कार्फ"...

"ये परफ्यूम और आफ्टर शेव की खुश्बू"मैँ शास्त्री की तरफ इशारा कर स्टाईल मारता हुआ बोला


"क्यों खिंचाई करने पे तुले हो यार?"शास्त्री सकपकाता हुआ बोला..


"देखो!...देखो..कैसे ये शास्त्री बेचारा... झेंपता हुआ चुपचाप अगली बोगी की तरफ जा रहा है"

"आज ना जाने क्या हुआ है इसे?"...

"उस दिन तो बड़ा खम ठोक के कह रहा था कि उसे ज्योतिषी ने बताया है कि...

उसके हाथ में अय्याशी की रेखा है"...


"खैर!..छोड़ो इस बात को...कोई और बात करो"...

"चलो शुक्र है कि... मैडम जी का मूड तो ठीक हुआ"मैडम जी के चेहरे पे मुस्कान देख मैँ मस्का लगाता बोल पड़ा


"कहने को तो लालू जी कह रहे हैँ कि अगले पाँच सालों में...

वो रेलेवे में पूरे एक लाख करोड़ रुपए का निजी निवेश लाएंगे"गुप्ता जी पुरानी बात पे वापिस आते हुए बोले

"साफ है!..रेलवे की बेशकीमती ज़मीन कौड़ियों के भाव अपनों के वारे न्यारे किए जाएंगे"


"तो क्या?...लालू के अपनों के पास अतना पईस्सा है?"मेरी आवाज़ में बिहार की टोन आ चुकी थी


"अरे बुद्धू!...जो पईस्सा खिलाए...वही अपना"गुप्ता जी भी कौन सा कम थे? ..उन्होंने भी उसी तर्ज में जवाब दिया


"ये समझ लो कुल मिला के कि...डुगडुग्गी बजा दी है लालू जी ने" ....

"अब जनता को घर बईठे...घर(रेलवे)फूंक... तमाशा दिखाया जाएगा"

"तैईआर रहिएगा"...


"कहने को उन्होंने मन को लुभाने वाले इस बजट में कई वायदे कर दिए हैँ जैसे 'डिस्चार्ज फ्री ग्रीन टायलेट' वगैरा...वगैरा..."

"लेकिन!...शर्त लगा लो...अगले दस साल में भी पूरे नहीं होने वाले ये सपने"...

"वो कैसे?"...

"ये देखो साफ साफ लिखा है अखबार में"गुप्ता जी 'नवभारत टाईम्स' में छपी खबर दिखाते हुए बोले

"कुली बेचारे यूँ ही बेफाल्तू में भंगड़ा डाल-डाल पस्त हुए जा रहे हैँ कि...

उन्हे गैंग मैन और गेट कीपर की खाली पड़ी नौकरियों पे बहाल किया जाएगा"


"ये तो अच्छी बात है!...रोज़गार मिलेगा बेचारे गरीब आदमियों को"मैँ बोला


"खा गए ना गच्चा बच्चू यहाँ भी....

अब जब! ...खुद रेलवे वालों को भी पक्का मालुम नहीं है कि कितने गैंगमैन और गेटकीपर के पद खाली पड़े हैँ और कितने नहीं"...

"तो क्या खाक नौकरियों पे बहाल करेंगे?"शर्मा जी मेरी बात सुन बोले....


"और ऊपर से तुर्रा ये कि लाभ मिलेगा तो सिर्फ लाईसैंसधारी कुलियों को ही"अनुराग बोल पड़ा...

"बाकि कुली तो जैसे बेफाल्तू में ही अपनी ऐसी तैसी करवाने को पिले रहते हैँ"

"कुछ पता नहीं कि वक्त आने पर उन से भी लेन-देन का खेल चले और वो भी लाईसैंसधारी बन जाएं"...

"अभी तो ये समझ लो कि सब वोटों की राजनीति है"गुप्ता जी भी पूरे बजट का बंटाधार करने में जुटे थे...


"वो कैसे?"मैँ मूर्ख अज्ञानी एक बार फिर उनका चेहरा ताक रहा था ...


"अपने आप देख ना...

भले ही लालू जी लाख रैलियां कर लेते लेकिन लाख पसीने और धूल से तरबतर होने के बाद भी...

ऐसा सन्देशा वो आम जनता तक कभी भी...किसी भी हालत में नहीं दे पाते जैसा...

उन्होंने संसद के 'ऐ.सी' गलियारों से 'टीवी'...'रेडियो' और 'अखबार' के जरिए जन जन तक पहुँचा दिया है"गुप्ता जी विश्लेषन सा करते हुए बोले ...


"वो भी बिना पसीने की बदबू से एकसार होते हुए"शर्मा जी बोले ...


"इसे कहते हैँ ...'ना हींग लगी ना फिटकरी...रंग चढा चोखा ही चोखा"

"लेकिन जो नई 'तरेपन्न' गाडियाँ चला रहा है लालू...उसका क्या?"...


"कौन सा आज ही चालू हुए जा रही हैँ?....


"जब होंगी...तब होंगी"...

'तरेपन्न' में से आठ-दस का तो पक्का है कि... वो अगले दस साल में तो शुरू होने से रही...बाकियों की कोई खबर नहीं"


"वो कैसे?"...

"वो ऐसे...कि पहले तो इन रूटों की लाईनों को ' नैरो गेज' से 'ब्राड गेज' में बदला जाना है...

और इस काम में आठ से दस साल तो गए ही समझो"




"कहने को तो बहुत वायदे कर दिए गए हैँ ...मसलन...उन्होंने कहा कि बिजली की कमी के चलते बचत की जाएगी"....

"पुराने बल्बों के बदले नए 'सी.एफ.एल' इस्तेमाल किए जाएंगे"...

"नैचुरल बात है कि...जब इस्तेमाल किए जाएंगे...तो खरीदे भी जाएंगे"

"रेलवे का भला हो ना हो लेकिन इतना तो ज़रूर है कि...

जिन कंपनियों से इन छबीस लाख 'सी.एफ.एल' बल्बों कीखरीद की जाएगी...उन कंपनियों के वारे-न्यारे तो पक्के ही समझो"...

"और एहसान उतारने को ये कंपनियाँ कोई कदम ना उठाएं ऐसा हो ही नहीं सकता"

"सीधी सरल बात है कि...इस हाथ दे और उस हाथ ले"...


"आप लोगों के पास बात करने के लिए ये बजट के अलावा कोई और टापिक नहीं है क्या?"मैडम बोर हो जम्हाई सी लेती हुई बोली....


"है क्यों नहीं?...

"आप बस हुकुम करें...कहने सुनने के लिए तो हमारे पास रोज़ ही कोई ना कोई मसाला होता है".. .

"अभी बारह-पंद्रह दिन पहले की ही तो बात है".....

"ऐसा तगड़ा कांड कि...

आप सुनेंगी तो आप भी हैरान होते हुए परेशान हो जाएंगी"अनुराग मैडम को इंप्रैस करने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहता था ...


"अरे हाँ!..मैडम जी ...

इनसे मिलो....राजीव नाम है इनका ..कहानियाँ वगैरा लिखते हैँ ये"अनुराग नम्बर बनाने हेतू मैडम से मेरा परिचय कराते हुए बोला....


"ओह!...रियली?...तो क्या किसी मैग्ज़ीन या न्यूज़पेपर?"...


"नहीं!...

जी नहीं!..बस ऐसे ही शौकिया लिख लेता हूँ कभी कभार"....


"तो क्या...कहानी या कविता?"प्रश्न फिर मेरे सामने था...


"बेसिकली तो व्यंग्य लिखता हूँ...कभीकभार...कविता पे भी हाथ आज़मा लेता हूँ"मैँने शरमाते हुए कहा


"क्यों राजीव!....क्या हुआ?...कुछ नया लिखा कि नहीं?"शर्मा जी मेरी तरफ ताकते हुए बोले


"जी!...इसी रेलवे बजट के बारे में कहानी तो लिख ली है...बस फाईनल टच देना बाकि है..."मैँने जवाब दिया


"कहानी में हमारा नाम जोड़ना ना भूलना"गुप्ता जी बोले ...


"और मेरा भी..."मैडम हँसते हुए मुझ से बोली.......

"जी ज़रूर...."


"और हम सभी हँस पड़े"....


"आप सभी को इस बार करैक्टर बनाया है मैँने अपनी कहानी का"....

"कल प्रिंट आउट लेता आउँगा"


"ठीक है....देखें तो सही कैसे तुमने हमारे चरित्रों को गढा है"...


"देखना क्या है...ये जो आप पढ रहे हैँ... बस यही कहानी है"...

"अपने आप जज कर लें कि कहानी ठीक से बन पाई है या नहीं"...


"लेकिन अभी तो तुम अनुराग से कहलवा रहे थे कि कोई कांड हुआ है..."


" जी!...जी...आपकी बात सही है लेकिन...

पहले ही आप सभी को शिकायत रहती है कि राजीव...लम्बा...बहुत लम्बा लिखता है..."

"सो!....इस बार कहानी का अंत यहीं....वैसे बाकि कहानी भी लगभग तैयार है"...

"एक दो दिन में वो भी आपके सामने पेश कर दूंगा..."...


"उसमें मैँने एक मज़ेदार करैक्टर गढा है...

'कम्मो चूरन वाली' नाम दिया है उसे".


'तो जल्दी ही मिलते हैँ ना अगली कहानी में अपनी 'कम्मो'...ऊप्स सॉरी 'कम्मो चूरन(चूर्ण) वाली' से "...

"इंतज़ार रहेगा ना?"...


***राजीव तनेजा***

3 comments:

दीपक भारतदीप said...

बहुत बढिया व्यंग्य, आपने पूरी तरह खींचा है.
दीपक भारतदीप

ajay kumar jha said...

rajeev bhai,
main soch rahaa tha ki aap itne dino se kahaan the bhai hum to husnaa bhool gaye the. magar shukra hai ki aapke aane ke baad aur ye lambee post ko padhne ke baad padhte gaye aur hanste gaye. maza aa gaya.

तेताला said...

इस कहानी में
हींग और फिटकरी
दोनों मिलीं
अब यह डिसाइड
करना है आपको
मैडम हींग हैं
या फिटकरी
और लालू
बहुत है चालू.

कर दिया है
साबित आपने
रेल ही लंबी
नहीं होती
होती है लंबी
रेल से भी
रेल की कहानी
रेल में कहानी
राजीव की जबानी.

रंग चोखा जमाए जाओ
मैडम को इम्‍प्रेस
और खुद को सप्रेस
करते जाओ जी.

लिखते जाओ
लिखते आओ
जगो तो लिखो
सोओ तो लिखो
लिखो तो लिखो
न लिखो तो भी
खूब लिखो
यही है कामना
मिले आपको
मन भावन भावना.

 
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