"श्श्श!...कहानी अभी बाकी है"

"शश्श!...कहानी अभी बाकी है"


***राजीव तनेजा***


"अरे!...कुछ खबर भी है कि कितना बड़ा कांड हुआ है गन्नौर स्टॆशन पे?"अनुराग सस्पैंस सा क्रिएट करता हुआ बोला...


"कब?"...

"क्या हुआ?"उसकी आवाज़ सुन मेरे मुँह से बस यही निकला


"उत्सुकता वश अगले पिछले सभी डेली पैसैन्जरों के कान भी हमारी तरफ हो लिए"......


"छापा था क्या?"एक की आवाज़ आई...


"ज़रूर!..मजिस्ट्रेट चैकिंग रही होगी"दूसरा बोल पड़ा


"सब इस 'लालू' का किया धरा है"....

"खुद तो चारे तक को नहीं बक्शा और अब पड़ गया है पीछे इन भोले 'टीटियों' की पूरी जमात के कि...

"पूरे नकद गिन के चाहिए 'इक्यावन हज़ार' हर महीने" ...

"कैसे वसूलने हैँ?..तुम जानो....तुम्हारा काम है"गुप्ता जी ऊपर वाली बर्थ पे लेटे-लेटे अपना कमैंट देते हुए बोले


"हुँह!...शक्ल नहीं है संत्री की भी ...बड़ा आया रेल मंत्री"....

"उसे तो बस!...कैसे भी कर के हर हाल में सरकारी खजाना भरता दिखना चाहिए"....


"भले ही वो हम डॆली पैसैंजरों के खून पसीने की गाढी कमाई पे हाथ साफ कर के क्यों ना हो"अनुराग बात आगे बढाता हुआ बोला


"वर्ना...तैयार रहो पोस्टिंग के लिए"...

"यही धमकी दी होगी"दहिया भी पीछे कहाँ रहने वाला था ....


"सुना है!...सीधा बिहार ले जा..पटकने की धमकी देता है"


"सही ही तो है!...बड़ा 'बिहारी'...ओए 'बिहारी' कह के चौड़े होते हो ना यहाँ हरियाणा में"

"पहुँचो तो सही एक बार बिहार...फिर पता चलेगा बच्चू"चने बेचता हॉकर भी बिहारियों की तरफदारी करता हुआ डॉयलाग मार बैठा

"कट्टे...लाठी....बल्लम के दम पे सब सिखा देंगे कि बिहारी कौन और हरियाणवी कौन"वो अपनी तेल चुपड़ी मूंछो को ताव देता हुआ आगे बढ गया


"जब से लालू का सख्त आर्डर हुआ है तब से तो ये नई भर्ती वाले पहलवान स्साले!..बिलकुल नहीं बक्शते"...

"भले ही डेली पसैंजर होने का लाख रोना रो लो...कोई परवाह नहीं"दहिया अपना दुखड़ा गा गा सुनाते हुए बोला...

"आखिर भुग्तभोगी जो ठहरा"...


"हमारी तरह ग्रुप में बैठा करो...कोई कुछ नहीं कहेगा"मैँ उसे समझाते हुए बोला


"अरे!...डेली पसैंजरों के ग्रुप को भी कम से कम एक पर्ची कटवाने पे मजबूर कर डालते हैँ कई बार"शर्मा जी भी कहाँ चुप रहने वाले थे


"अरे!...उनकी छोड़ो...उनका तो काम है पर्ची काटना"....

"तनख्वाह मिलती हैँ उन्हें इस सब की"...

"मैँने तो यहाँ तक सुना है कि उनको ठेके पे वसूली के लिए रखा गया है"गुप्ता जी बोले


"तुम उस दिन वाली अपनी बात सुनाओ ना"दहिया मेरी तरफ देख एक आँख दबा मुस्कुराता हुआ बोला...


"क्यों?...क्या हुआ था तुम्हारे साथ ?"अनुराग सहित सबकी निगाहें मेरी तरफ थी


"अरे!...मत पूछ बावले कि क्या हुआ था मेरे साथ"....

"ये पूछ कि...क्या-क्या नहीं हुआ था मेरे साथ"मैँ ठंडी सांस लेता हुआ अनुराग से बोला

"मेरा तो स्साला!..दिन ही खराब था"...

"अच्छी भली बीवी मुझ से चिपकते हुए कह रही थी कि...अजी सुनते हो!..मौसम बड़ा रोमांटिक हो रहा है"....

"क्या करोगे जाकर?...यहीं घर पर ही आराम कर लो ना"मैँ बीवी की आवाज़ की मिमिक्री सी करता हुआ बोला


"फिर?..."अनुराग मेरी ही तरफ ताके चला जा रहा था


"अब मैँ राजीव!...उस भोली भंडारन को कैसे समझाता कि मेरा आज का दिन तो पहले से ही अपनी सोलहवीं माशूका के नाम आलरैडी बुक्ड है"

"इसलिए कोई चांस ही नहीं बनता छुट्टी का"


"आफ्टर ऑल...कमिटमैंट इज़ कमिटमैंट"गुप्ता जी भी हमारी बातों का पूरा आनन्द लेते हुए बोले ...


"वायदा तो आखिर वायदा होता है"दहिया भी बीच-बीच में अपनी एंटरी दर्ज करवाना नहीं भूल रहा था...


"जी"...


"जो वायदा किया वो निभाना पड़ेगा"अनुराग ने कान पे हाथ धरा और लम्बी तान ले शुरू हो गया


"सो!...कैसे तोड़ देता मैँ उस अबला नारी का विश्वास?"...

"अपने बड़े बुज़ुर्ग भी तो कह गए हैँ कि 'प्राण जाए पर वचन ना जाए' "मैँ हँसता हुआ बोला


"वैसे भी रोज़-रोज़ एक ही पत्तल में दही-चिड़वा खाना कहाँ भाता है?"गुप्ता जी हँसते हुए बोले


"फिर तो!..खूब मज़े किए होंगे?"अनुराग ने उत्सुकता से पूछा


"मज़े?....


"अरे!...उस दिन तो एक टिकट में दो दो मज़े करवा डाले थे ऊपरवाले ने?"मैँ कानफीडैंस से बोला


"एक टिकट में दो दो मज़े?"लेटे हुए गुप्ता जी एकदम से उठ कर बैठ गए


"बिलकुल..."मेरा आत्मविश्वास देखते ही बनता था ...


"समझा नहीं...ज़रा खुल के समझाओ"गुप्ता जी के चेहरे पे नासमझी का सा भाव था....


"वो कहते हैँ ना....मीठा भी नमकीन भी... एक ही थाली में"मैँ हँस पड़ा


"क्यों पहेलियाँ बुझा रहे हो यार?....सीधे सीधे बताओ ना"अनुराग बोर हो उबासी लेता हुआ बोला


"तो सुन मेरे लल्ला!...जहाँ ये टीटी लोग हमसे पैसे वसूला करते हैँ ना...वहीं मैँ उल्टा उन्ही से वसूल लाया था"



"क्या बात कर रहे हो?"बैंकर होने के नाते पैसे की बात सुनते ही गुप्ता जी की आँखों से नींद गायब हो चुकी थी


"मैँ तो नहीं मानता"....

"ऐसा तो किसी भी कीमत पे हो ही नहीं सकता"अनुराग यकीन ना करने के मूड में था


"तो जा के पूछ लो ना फिर उस ठिगने टीटी के बच्चे से खुद ही कि....

पूरे ग्यारह सौ गिन के धरे थे इस 'राजीव' की हथेली पे या नहीं"मैँ एक साथ अपनी आँखे और हाथ नचाता हुआ गर्व से बोला

"अपने आप पता चल जाएगा कि सही कह रहा हूँ या फिर गलत"


"सही कह रहे हो....साँप की बाँबी में हमें ही हाथ धरने की कह रहे हो"....

"ऐत्थे सान्नू ओहदे नाम नाल्ल ही गश आन नूँ फिरदा ए....

अते तू कहणा ऐ कि सिद्दा ओहदे सामणे जा के खड़े हो जाईए कि...

"आ गए जी अस्सी...हुण जी भरर के वड्ढ देओ सान्नू"शर्मा जी कब हिन्दी से पंजाबी में शुरू हो गए...उन्हें खुद नहीं पता


'मति नहीं मारी गई है हमारी जो हम बेफाल्तू में खुद ही पंगा मोल ले के बैठ जाएं"सभी एक साथ इनकार करते हुए बोले


"तुम खुद ही बताओ ना...क्या हुआ था?"आश्चर्य और अविश्वास दोनों भाव गुप्ता जी के चेहरे पे एक साथ उभर उठे


"वत्स!..वैसे तो मैँने सोचा हुआ था कि उस दिन का जिक्र कभी किसी से नहीं करूगा लेकिन...

आपकी भोली सूरत पे ये प्रश्नवाचक चिन्ह मंडराता देख कैसे इनकार करे ये राजीव?" मैँ बाबाओं के माफिक गरदन हिलाता हुआ बोला


"तो सुनो भग्त!...दरअसल हुआ क्या कि उस दिन कुछ मूड तो पहले से ही ऑफ था मेरा और...

ऊपर से रही सही कसर इस स्साले मजिस्ट्रेटी छापे ने पूरी कर दी"मैँ सारी मंडली को प्रवचन सा देता हुआ बोला


"वो कैसे?"....


"पहले तो कार के बजाय ट्रेन में आने की कहने से ही फोन पे माशूका से बहसा-बहसी हो गई" ...


"उफ!...इन लड़कियों को भी ना...पैसे बचाता बन्दा एकदम बकवास लगता है"शर्मा जी को शायद कोई पुरानी बात याद आ गई थी...


"बिना सोचे समझे सीधा कंजूस मक्खीचूस की उपाधी तक दे डालती हैँ"वो अपना तजुर्बा बताते हुए बोले


"खास कर के तब!..जब वो पति नहीं...आशिक हो"अनुराग ने बात पूरी की


"वैसे भी अगली को खुद अपने दिमाग पे ज़ोर दे के सोचना चाहिए कि...

वो पहली-दूसरी नहीं बल्कि...सोलहवीं या फिर सत्रहवीं माशूका है"मैँ उँगलियों पे गणितीय हिसाब सा लगाता हुआ बोला...


"ऐसे नखरे दिखाना शोभा नहीं देता उसे"

"क्यों?...उसे क्या सपने में आना था कि वो तुम्हारी सोलहवीं या फिर सत्रहवीं माशूका है"शर्मा जी मेरी तरफ देखते हुए बोले


"क्यों आँखें नहीं थी क्या उसकी जो मेरे ये धौले( सफेद) बाल ना देख सकी?"मैँ अपने सर पे हाथ फिराता हुआ बोला


"देख नहीं सकती थी क्या कि...

उम्र के इस चालीसवें पड़ाव के हिसाब से ये राजीव तो एक दम से खेला-खाया व्यक्ति होना चाहिए?"अनुराग मैडम की तरफ ताकता हुआ बोला


"बिलकुल!...बिलकुल सही बात"शर्मा जी भी अनुराग से हाथ मिलाते हुए बोले


"पूरे चार घंटे!...पूरे चार घंटो तक स्सालों ने घुटनों के बल उकडूँ बिठाए रखा कि...

"बेटा!...इंतज़ार कर"...

"मैजिस्ट्रेट साहब आने ही वाले हैँ"...

"वही करेंगे तेरा निबटारा"अपनी तरफ से ध्यान हटता देख मैँ बीच में ही बोल पड़ा


"फिर...?"अनुराग मेरी तरफ ताकते हुए बोला...


"फिर क्या?...उस स्साले! ... मैजिस्ट्रेट के बच्चे को फुरसत हो तब ना"...

"सुबह से दोपहर होने को आई थी...लेकिन जनाब का कोई पता ठिकाना नहीं"...

"पता नहीं कहाँ सिर सड़ा रहा था?"


"पट्ठे को झाड़ू-पोंचे से लेकर बर्तन सफाई तक सारे काम उसी दिन ही निबटाने होंगे"गुप्ता जी हँस पड़े....


"क्यों...मजिस्ट्रेट क्या जोरू का गुलाम था?"कॉफी देर से मौन बैठी मैडम भी हमारी गुफ्तगू का आनंद लेने लगी थी


"अब ये तो पता नहीं"मैँने छोटा सा जवाब दिया....


"वैसे भी इसे अपनी माशूका के बारे में सोचने के अलावा फुरसत ही कहाँ रही होगी कि...

ये ऐसे फाल्तू सवालों के जवाब ढूँढता फिरता"अनुराग मेरी तरफ इशारा कर कटाक्ष करता हुआ बोला


"यहाँ स्साली!..देर पे देर हुए चली जा रही थी और....

वो था कि आने का नाम ही नहीं ले रहा था"मैँ अनुराग की बात अनसुनी कर बोलता रहा...


"उफ!...ये वैलैंटाईन भी पता नहीं क्या-क्या गुल खिलवाएगा"मैँ आने वाले समय को याद करता हुआ बोला


"अब ये 'वैलैंटाईन' का तुम्हारे इस किस्से से क्या कनैक्शन है?"शर्मा जी पूछ बैठे


"शर्मा जी!...वैलैंटाईन का ही तो महीना चल रहा था ना वो"मैँ मोबाईल में कलैंडर दिखाता हुआ बोला


"मैँ ऑलरैडी लेट पे लेट हुए जा रहा था और वो जज का बच्चा था कि आने का नाम ही नहीं ले रहा था"


"पट्ठे ने भी कोई ना कोई माशूका पटा रखी होगी"अनुराग बोल उठा..


"वैल्ल गैस्ड...."मैँ अनुराग की तारीफ करते हुए बोला

"हाँ!..उसी की खातिर ही तो पता नहीं कहाँ कहाँ से वैलैंटाईन की शापिंग करके लौटा था"...


"वैलैंटाईन की शॉपिंग करके?....तुम्हें कैसे पता?"गुप्ता जी का सवालिया चेहरा मेरे सामने था...


"वैरी सिम्पल!...दोनों हाथों में जो उसके ताज़े गुलाब के फूलों के 'बूके' और. ..

मँहगी वाली इंपोर्टेड 'चाकलेट' के पैकेट जो नज़र आ रहे थे और..

ऐसे मँहगे गिफ्ट कोई अपनी बीवी को दे...ऐसा सनकी तो मैँने आज तक नहीं देखा"मैँ हँसता हुआ बोला


"बीवी के इश्क में कोई खुद को मिटा ले...

हो नहीं सकता...हाँ!..हो नहीं सकता"मैँ अजय देवगन का ये गीत अपनी ही तर्ज़ पे गुनगुनाते हुए बोला



"अजी!..काहे की इंपोर्टेड चॉकलेट?"...

"सब स्साली!...यहीं पैक होती है अपने आज़ाद मार्किट में"गुप्ता जी राज़ की बात सरेआम बताने वाले अन्दाज़ में बोले


"कई बार तो मैँने भी उन्हे एक्सपाईरी डॆट मिटा नकली मोहर लगाते देखा है"अनुराग बोल उठा...


"अरे!...कोई नहीं देखता है एक्सपाईरी- शैक्पाईरी"...

"कुछ हम जैसे गिने चुने सिरफिरों की छोड़ दो तो सब लकड-पत्थर हज़म हो जाता है हिन्दुस्तानी जनता को"शर्मा जी तैश खाते हुए बोले


"कमाल है!...बिना किसी लाग-लपेट के आँखों देखी मक्खी तक कैसे निगल जाते हैँ लोग?"मैडम जी भी हमारा भरपूर साथ दे रही थी...


"वाह!...कितना मज़बूत कलेजा है हमारा...वाह!...वाह..."अनुराग उपहास सा उड़ाता हुआ बोला...


"देखा!..कितने ज़िदादिल हैँ हम?"सबको बोलता देख काफी देर से अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे मैडम के साथ बैठे सज्जन भी बोल पड़े...


"बेशक!...हमारा एक गुर्दा किडनी किंग ने फोकट बराबर में निकाल लिया तो क्या?"शर्मा जी अखबार के पन्ने पलटते हुए बोले



"हुह!....इन बड़े लोगों का वैलैंटाईन...वैलैंटाईन है और...

हमारा वैलैंटाईन....निहायत ही फुददूपन्ती"मैँ बातचीत का रुख दूसरी तरफ घूमता देख बीच में ही बोल पड़ा

"वाह रे ऊपरवाले!....देखा तेरा इंसाफ"


"जुर्माना लगा होगा तगड़ा तब तो?"मैडम मेरी तरफ ताकती हुई बोली


"जुर्माना और मैँ?...अपुन तो साफ नॉट गए कि 'निक्का ऑना' भी नहीं अपुन के पास"...

"बेशक!...जी भर तलाशी ले लो"...


"अच्छा!...फिर?"मैडम उत्सुकता से बोली


"पट्ठों ने सारी जेबें खंगाल मारी लेकिन...कुछ हो...तभी तो निकले"...


"तो क्या?...बिलकुल ही ठनठन गोपाल निकले थे घर से?"अनुराग ने हैरानी से मेरी तरफ देखा


"अरे!...काहे को...?....ठनठन गोपाल निकलें मेरे दुश्मन"

"यहाँ तो जब मर्ज़ी जेब तलाश लो...

हज़ार दो हज़ार तो ऐसे ही बेतरतीब पड़े मिल जाएंगे"मैँ पर्स दिखाता हुआ रौआब से बोला


"पूरे बाईस सौ रुपए थे अपुन की जेब में...पूरे बाईस सौ"मैँ गर्व से छाती फुला बोला


"फिर!..तलाशी में कुछ निकला क्यूँ नहीँ?"अनुराग के चेहरे पे सवाल जस का तस मौजूद था


"अरे!...ये तो भला हो उस अपनी फेवरेट 'कम्मो' चूरन(चूर्ण) वाली का...जो अचानक नज़र आ गई"


"कम्मो?"....

"ये भला क्या नाम हुआ?"अनुराग ने एक साथ दो सवाल मेरे चेहरे पे दाग दिए


"अब मुझे क्या पता?"...

"क्या मैँ बैठा था उसकी छट्ठी रात पे पंडित बन के नामकरण के वास्ते?"...

"जो मुझे पता हो"...

"माँ-बाप ने जो प्यार से रख दिया तो रख दिया"मैँ अपनी बात कटते देख झट से बोला...


"वैसे भी 'कम्मो' की जगह अगर 'लच्छो' रख देते तो क्या फर्क पड़ जाता?"...

"बेचना तो उसने तब भी चूरन(चूर्ण) ही था"शर्मा जी मुझ से सहमत होते हुए बोले


"अच्छा वो?...वो तो पुरानी खिलाड़िन है"गुप्ता जी के चेहरे पे ना जाने क्यों चमक सी आ गई...


"ज़रूर मजिस्ट्रेट से भी सैटिंग रही होगी उसकी"...

"एक दिन उसी का नाम ले के साफ बच निकली थी मैजिस्ट्रेटी छापे से"अनुराग कुछ याद सा करता हुआ बोला


"इन बिना परमिशन सामान बेचने वालों को कोई कुछ नहीं कहता"


"डाईरैक्ट हफ्ता जो पहुँच जाता है सभी झोलाछाप हॉकरों का ठेकेदार के पास"शर्मा जी अखबार लपेट साईड पे रखते हुए बोले


"वैसे!...कहाँ-कहाँ तक सप्लाई होता है इनका चूरन?"गुप्ता जी मुझसे पूछ बैठे


"कहाँ-कहाँ क्या?"...

"ऊपर से नीचे तक हर जगह सप्लाई होता है इनका चूरन"मैँने भी उन्हीं की तरह कोड लैंग्वेज में जवाब दिया


"चूरन?"...

"सप्लाई?"अनुराग की समझ में कुछ नहीं आ रहा था...


"समझा कर यार!..."मैँ आँख दबा मैडम जी की तरफ इशारा करता हुआ अनुराग से बोला


"हम्म!..इसीलिए इस दिल्ली से पानीपत के रूट पे इन चूरन वालियों की ही तूती बोलती है"अनुराग हमारी कोड भाषा को डी-कोड करता हुआ बोला


"अब ये तो पता नहीं!... लेकिन उस 'कम्मो' को तो पैसे दे मैँने चलता कर दिया कि...

"शाम को 'मालवा' में ले लूंगा......'एस-आठ(S-8 Coach)' में मिलिओ"


"फिर?..."अनुराग समेत सभी की उत्सुकता बढती ही जा रही थी


"फिर क्या?....जैसे ही पता चला कि आज छापा है....भगदड़ सी मच गई पूरी ट्रेन में"

"जिसको जिधर रस्ता मिला...निकल लिया"

"मैँने भी प्लैटफार्म के बजाय दूसरी तरफ छलांग लगाई ..लेकिन अफसोस...

स्साले!...वहाँ भी सिर सड़ाने को तैयार खड़े थे"मैँ कहानी में रोमांच सा जगाता हुआ बोला...


"सब रास्ते पता चल गए हैँ अगलों को...कि डिफाल्टर सारे किधर-किधर से गोली होते हैँ"शर्मा जी बोल पड़े


"अच्छा!...फिर?"गुप्ता जी अब तक नीचे उतर कर आ चुके थे ...


"फिर क्या?... मैँने भी आव देखा ना ताव ...

एक झटका दिया कस के उस साले टीटी के बच्चे को और जिधर रस्ता दिखा ...भाग लिया"मैँ शेखी बघारते हुए बोला


"तुम तो कह रहे थे कि पूरे चार घंटे तक उकड़ूँ बैठा के रखा?"अनुराग को मेरी बात काटता हुआ बोला


"ओह!...वो?...

वो तो!.. जैसे ही मैँ हाथ छुड़ा के भागा तो देखा स्साले!...पता नहीं कहाँ से दो पहलवान और कूद कर आ गए मैदान में"


"एक अकेले के पीछे तीन-तीन...बहुत नाइंसाफी है ये तो"अनुराग गब्बर सिंह की का स्टाईल पकड़ता हुआ बोला


"हाँ!...एक एक करके आते तो बताता"


"उसके बाद क्या हुआ?"मैडम को भी इंटरैस्ट सा आने लगा था


"उसके बाद की कहानी तो बस!..पूछो मत...

स्सालों ने!...पता नहीं कितने घूँसे बरसाए और कितने नहीं... कुछ याद नहीं"मैँ शरमाता हुआ बोला


"होश ही कहाँ रहा था मुझे बे-इंतहा मार खाने के बाद?"मैँ वो भयानक मंज़र याद कर सिहरता हुआ बोला


"हरामखोर स्साले!...पहले मार-मार ठुकाई करें...बाद में पानी के छींटे मार-मार उठाएं"

"शर्म भी नहीं आती '*&ं% $#@' को..."मुझे गुस्सा आ चुका था


"उन्हें क्यों आए शर्म? ...शर्म तो आपको आनी चाहिए थी जो बिना टिकट यात्रा कर रहे थे"मैडम मेरी गल्ती निकालते हुए बोली


"ये!...ये बात नहीं है मैडम"...


"राजीव सही कह रहा है मैडम जी!....."अनुराग को अपने हक में बोलता देख 'जी' खुश हो गया मेरा


"अगलों को भी दिखाई दे रहा था कि खाते-पीते घर का बन्दा है"....

"थोड़ा नरमियत से तो काम लेना ही चाहिए था कम से कम".. ..

"कुछ ज़्यादा नहीं...सिर्फ सौ किलो ही तो वज़न है इसका"अनुराग हँसते हुए बोला


"ओए!..तू मेरी तारीफ कर रहा है या....फिर मेरी बुराई?"मैँ अनुराग की तरफ गुस्से से देख झेंपता हुआ बोला

"उड़ा ले बेटा तू भी मेरा मज़ाक!....सही दोस्ती निभा रहा है..."मुझे गुस्सा आ चुका था


"गलत बात!...अनुराग...तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए"शर्मा जी मुझे शांत करने के मकसद से उसे समझाते हुए बोले


"तुम बताओ...क्या हुआ उसके बाद"शर्मा जी को भी इस किस्से में मज़ा आने लगा था


"एक तो ठीक से चला तो जाता नहीं है इस बेचारे से..ऊपर से ऊँकडू और बिठा दिया"अनुराग सहानुभूति भरे स्वर में बोला



"देख तो लें कम से कम कि किस के कैसा बरताव करना है और कैसा नहीं".. .

"ये क्या कि गधे घोड़े सब तौल दो एक ही भाव?"गुप्ता जी भी मानों अनुराग का ही साथ देने को उतारू थे


"गुप्ता जी!...आप भी?"मैँ कुछ रुआँसा सा होता हुआ उनकी तरफ देख बोला


"शश्श!..गुप्ता...नहीं"शर्मा जी गुप्ता जी को कुछ इशारा सा करते हुए बोले


"इसको छोड़ो...तुम आगे बताओ क्या हुआ था"


"कमर दुखने को हो रही थी मेरी...मन तो कर रहा था कि बैठ जाऊँ वहीं पलाथी मार के कि...

उखाड़ लो ...जो उखाड़ना हो...नहीं है मेरे पल्ले दुअन्नी भी"मैँ भी किसी की परवाह ना करता हुआ बोला


"फिर?"सबका इंटरैस्ट बढता ही जा रहा था ...


"जैसे ही पलाथी मारने की कोशिश करूँ..


"धड़ाक से पिछवाड़े पे पड़ती होगी 'तड़ाक'..तड़ाक"अनुराग का बच्चा...बीच में ही मेरी बात काटता हुआ बोला


"शर्मा जी!...समझा लो इसे"....

"वर्ना!..."


"वर्ना क्या?"...

"क्या उखाड़ लेगा तू?"अनुराग आस्तीन ऊपर चढाता हुआ बोला


"नहीं अनुराग...बीच में मत बोलो"मैडम अनुराग को समझाते हुए बोली..

"राजीव!...तुम अपनी बात पूरी करो"....


"बस फिर क्या था...मैँ भी सौ-सौ गालियाँ देता हुआ मन मसोस कर इस इंतज़ार में उकडूँ बैठा रहा कि...

कब आए मजिस्ट्रेट और कब मेरी इन जल्लादों से जान छूटे"


"अपनी सरकार को भी पता नहीं क्या होता जा रहा है"....

"अक्ल घास चरने गई है हमारे नेताओं की"शायद किसी चीज़ की जलन थी मुझे ...


"क्यों!...हुण साड्डे नेतावां नूँ केहड़ी गोली वज्ज गई?"शर्मा जी फिर पंजाबियत पे उतर आए


"शर्मा जी !...कितना टाईम हो गया आपको दिल्ली और पानीपत के बीच सफर करते हुए?"


"यही कोई सवा सात साल"शर्मा जी हिसाब सा लगाते हुए बोले

"क्यों?...क्या हुआ?"


"हरियाणवी आप बोलते नहीं और..कब आप हिन्दी छोड़ पंजाबी का दामन थाम लेते हैँ...कुछ पता नहीं चलता"


"ओए!..की दसिए हुण तैन्नू?"...

"पंजाबी साड्डी माँ-बोली हैग्गी"

इस्स करके पंजाबी नूँ कैवें छड्ड देइय्ये?"शर्मा जी फिर पंजाबी में बोले



"सुणो हुण शर्मा जी तुस्सी वी ..कि जिन बच्चों के अभी दूध पीते दाँत भी नहीं टूटे हैँ...

उनको 'आई.पी.एस' के जरिए सीधे 'ए.सी.पी'....'मजिस्ट्रेट' के ओहदे थमा..

देश की बागडोर सौंपी जा रही है"मैँ हिन्दी पंजाबी मिक्स करता हुआ बोला


"क्या सन्देशा देना चाहती है सरकार इससे?"...

"इधर स्कूल खत्म ..उधर 'आई.पी.एस' की ट्रेनिंग चालू"अनुराग भी शर्मा जी से मुखातिब होता हुआ बोला


"ये तो अच्छी बात है...पढाई खत्म होते ही रोज़गार शुरू"मैडम मेरी बात काटती हुई बोली


"मैडम जी!..तजुर्बा भी कुछ होता है कि नहीं?"

"कम से कम थोड़े बहुत बाल तो सफेद होने दो"मैँ शर्मा जी के सफेद बालों की तरफ इशारा करता हुआ बोला....


"पता नहीं ऊँचा ओहदा मिल जाने से ये लौंडे लपाड़े किस गुमान में रह्ते हैँ?"...

"पट्ठे मैजिस्ट्रेट ने भी बिना कुछ सुने सीधे-सीधे ही जुर्माना ठोक दिया...कि...

निकाल बेटा!...पूरे ग्यारह सौ"....


"मैँने भी उकड़ूँ बैठे-बैठे टका सा जवाब दे दिया कि...अपने पल्ले तो चवन्नी भी नहीं"...


'स्साले!...बाप का माल समझ के ट्रेन में सफर कर रहा था?"मजिस्ट्रेट भी मेरा रूखा सा जवाब सुन आपा खो गाली गलोच पे उतर आया

"बिना सोचे समझे उसने पीछे से खींच के ऐसी लात जमाई कि मैँ सीधा मुँह के बल गिर ज़मीन चाटता नज़र आया"


"ओए!...राजीव......तू?"....

"तनेजा?"...

"स्साले!..तू कभी सुधरेगा नहीं".....

"अभी तक गई नहीं तेरी ये पैसे बचाने वाली आदत?"....

"आ जा ओए...जल्दी से गले लग जा"


"अब चौंकने की बारी मेरी थी"...

"देखा तो!..वो मैजिस्ट्रेट मेरा बचपन का लंगोटिया यार निकला"...

"एक ही साथ पहले स्कूल....फिर कॉलेज में रहे थे दोनों"...

"ये बात और है कि उसका ध्यान हमेशा पढाई की तरफ लगा रहा और मेरा...."...


"लड़कियों की तरफ"...अनुराग बीच में ही बोल पड़ा


"इतना तो पता था कि किसी ऊँची पोस्ट पे लग गया है...लेकिन मैजिस्ट्रेट...ये मालूम न था"...

"साला पढाकू की औलाद...पढ लिख कर कब मजिस्ट्रेट बन बैठा...पता भी ना चला"


'फिर?"...

"फिर क्या था....सभी टीटियों को लाईन में खड़ा कर मुझसे पूछ कि बता किस-किस ने तुझ पर हाथ साफ किया था?"

"अब मैँ क्या बताता?"...

"कोई एक हो तो बताऊँ भी"...


"वैसे भी इतनी मार के बाद इसे याद ही कहाँ रहा होगा कि कौन कौन था पीटने वाला?"अनुराग मेरी भद्ध पीटने पे उतारू था


"बस जब मैँने किसी का नाम ना लिया तो मजिस्ट्रेट साहब के हुक्म पर सभी टीटियों ने अपने पल्ले से पूरे ग्यारह सौ मेरी हथेली पे टिका दिए"

"हाँ!...इसी हथेली पे"


"तो क्या हुआ तुम्हारी उस 'लच्छो' का?"...


"लच्छो?"...


"ऊप्स!..सॉरी... 'कम्मो' का"

"क्या पूरे पैसे सही सलामत वापिस मिल गए थे उस 'कम्मो' की बच्ची से?"आशंका से ग्रस्त गुप्ता जी मंद-मंद मुस्काते हुए पूछ बैठे



"या फिर पूरे कर लिए थे?"अनुराग हल्की सी आँख दबा हँसता हुआ बोला


"क्या बात करते हो?"...

"ऐसा टेस्ट नहीं है मेरा"...

"अपुन तो... हाई क्लास से नीचे...सवाल ही नहीं पैदा होता"


"कोशिश तो बड़ी की थी पट्ठी ने लेकिन....हम...हम हैँ...कोई ऐंवे ही वेल्ला करैक्टर नहीं कि....

बिना किसी खास मौके के जब चाहे बिना चूने कत्थे के लपेंटे ही सादा पान खाने को तैयार हो जाएं "मैँ अकड़ता हुआ बोला


"मैँने तो अच्छी तरह झाड़ पौंछ कर के रख दी थी उसकी"....

"अब कभी मत्थे लगने का नाम भी नहीं लेगी"...


"आखिर हुआ क्या था?"अनुराग व्याकुल हो पूछ बैठा


"होना क्या है .. ..दो सौ काट के पकड़ाने लगी कि... हैँ नहीं अभी मेरे पास...खर्च हो गए"....


"अरे!...ऐसे-कैसे खर्च हो गए?"

"बाप का माल समझ रखा है क्या?"...


"वो!...वो बच्चे की स्कूल फीस भरनी थी ना इसीलिए...

नहीं तो नाम कट जाता"


"अरे!...कल का कटता..बेशक आज कट जाए...मेरी बला से"...

"मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता"

"पैसे कम लेना तो दूर...उल्टे भाषण और पिला दिया उसे नेकी और इंसानियत का"

"जब मैँ अड़ के खड़ा हो गया कि पूरे चाहिए अभी के अभी ......तो झोले से चूरन निकाल पकड़ाने लगी कि....

"ले लो....काम आएगा"...


"तो क्या दो सौ का चूरन ले लिया?"...


"हुँह...मेरी क्या मति मारी गई थी जो मैँ बेफाल्तू में दो सौ रुपए फूंक डालता?"...

"पाँच दस की बात हो तो मान भी ले बन्दा लेकिन...दो सौ का चूरन....मतलब ही नहीं पैदा होता"

"हुँह!...बड़ी आई चूरन बेचने वाली"...


"सब पता है मुझे कि...इस चूरन की आड़ में क्या धन्धा करती है तू"

"पूरी ट्रेन को रंडीखाना बना रखा है तुम सबने...."मैँ भरी भीड़ में ज़ोर से चिल्लाया

"कोई जगह तो साफ सुथरी रहने दिया करो...कम से कम"...


"बाबू!. ..पति शराबी है..कुछ करता धरता नहीं"...

"पूरा दिन...चाहे सर्दी हो या गर्मी...बारहों महीने ये पंद्रह किलो का झोला ले....

पूरा दिन इधर-उधर धक्के खाती फिरती हूँ"कम्मो झोले की तरफ इशारा कर अपनी बेबसी ब्यान करते हुए बोली . ..

"एक-एक दिन में बीस-बीस किलोमीटर पैदल चल कर माल बेचती हूँ"...

"तब कहीं जाकर बड़ी मुश्किल से शाम को घर में चूल्हा जल पाता है"

"ऊपर से...शराबी पति भी जब जी में आए...बात बेबात पीटने लगता है"वो रुआँसी सी होती हुई बोली......



"चूल्हा जलाने की तुझे फुरसत ही कहाँ है?"...

"रोज़ तो सब्ज़ी मंडी स्टेशन पे मोबाईल से कभी 'डॉमिनो' का पिज़्ज़ा...

तो कभी 'मैक डोनाल्ड' का बरगर आर्डर कर रही होती है....वो सब क्या है?"

"अब ये नकली के दिखावटी टसुए बहाना छोड़ और सीधी तरह से बता कि मेरे पैसे देती है कि नहीं?"

"वर्ना मुझे उँगली टेढी करनी भी आती है"


"तू!...हाँ तू ...उसे शराबी कहने वाली पहले तो ये बता कि उसके लिए दारू कौन लाता है?...

"तू ही ना?"

"और ये!...ये जो तेरे झोले में मैक-डावेल का अद्धा दिख रहा है...उसका क्या?"

"क्या मिंयाँ-बीवी दोनों एक साथ चढाते हो?"मैँ उसका झोला खंगालता हुआ बोला


"सही ड्रामा है!...पहले दारू पिलाओ...फिर मार खाओ...और फिर...."ना जाने क्या सोच गुप्ता जी ने बात अधूरी छोड़ दी


"बाबू जी !...छोटे-छोटे पाँच बच्चे हैँ मेरे"...

"सगी माँ हूँ!...कोई सौतेली नहीं कि अपने ही खून को भूखों मरने दूँ"...

"फैंक भी तो सकती नहीं उन्हें कहीं"...

"कुछ भी कर के किसी तरह उनका पेट पालती हूँ तो क्या बुरा करती हूँ मैँ?"



"तो क्या डाक्टर ने कहा था कि लाईन लगा दो बच्चों की?"...

"खुद तेरे को सोचना चाहिए कि पति तेरा कोई कमाता-धमाता नहीं"...

"सारा घर तेरे को ही संभालना है"...

"पेट पालने के लिए कोई ज़रूरी नहीं कि ये गन्दा काम कर"....

"कहीं नौकरी नहीं कर सकती क्या?"


"बहुत जगह धक्के खाए नौकरी की तलाश में लेकिन जहाँ भी गई...

काम से ज़्यादा मेरा बदन भाया हर किसी को"...

"अब क्या करूँ?...

"ये गोरा रंग भी ऐसा मनहूस दे दिया है मुझे ऊपरवाले ने कि सबकी नज़र मेरे बदन के कपड़े उधेड़े बिना नहीं रहती"


"जी में तो आता है कि चाकू ले अपनी ये गोरी चमड़ी ही उधेड़ डालूं"वो आवेशित होती हुई बोली


"रहने दे....रहने दे ..सब हिस्ट्री जानता हूँ तेरी....पुरानी चस्कोड़न है तू"कहते हुए मैँने उसके हाथों से पर्स छीन अपने दो सौ रुपए निकाल लिए.. ..


"अब इसे मेरी तीखी बातों का असर कहें या फिर कुछ और कि...

अचानक!..पता नहीं उस 'कम्मो' को क्या दौरा पड़ा और वो सचमुच में अपने झोले से चाकू निकाल हवा में ऐसे लहराने लगी"...

"मानों सचमुच में किसी का कत्ल कर देगी"


"स्साली!..नौटंकी कहीं की"...

"पैसे देने के नाम पे ड्रामा शुरू"कहते हुए मैँ बड़बड़ाता हुआ अगले डिब्बे की तरफ बढ गया

"फिर उस 'कम्मो' का क्या हुआ?"


"बाद में पता चला था कि ...

बड़ी मुश्किल से पाँच-छे जनों ने मिलकर उस पर काबू पाया"..

"पता नहीं कैसे उन बेचारों ने उस आफत की पुतली को समझा-बुझा कर शांत किया होगा"...


"अब आजकल 'कम्मो' कहाँ है?"...

"जाएगी कहाँ?"...

"मुल्ला की दौड़...

ऊप्स!...सॉरी..."मुल्लाईन की दौड़ मस्जिद तक"...

"इसी ट्रेन के किसी डिब्बे में अपनी सैटिंग जमा रही होगी"इतना कह मैँ कहानी का ये वाला भाग यहीं खत्म करने को हुआ...



"हुँह!...ये भी भला कोई धांसू करैक्टर हुआ?"...

"बड़े दावे कर रहा था ये राजीव कि उसकी कहानी ही इस 'कम्मो' के दम पे टिकी है"...

"बस इतना सा!...बित्ते भर का रोल?"अनुराग मेरी कहानी से बाहर निकलता हुआ बोला


"क्या हुआ?"...

"निकल गई हवा?"...

"नाम बड़े और दर्शन छोटे"

"ऊँची दुकान और फीका पकवान"उसका बड़बड़ाना जारी था

"मुझे भी सब्जबाग दिखाए थे इस राजीव के बच्चे ने कि तेरा करैक्टर भी कहानी के साथ-साथ चलता है"...

"काट-पीट के सत्यानाश कर दिया मेरे सारे किरदार का"

"बस जहाँ मैँ कोई तगड़ा डॉयलॉग बोलूँ...वहीं कुछ ना कुछ करके कहानी अपनी तरफ मोड़ लेता है"अनुराग के लहजे में शिकायत थी


"अब आप ही देखो ना!...कहानी के इस ऐपीसोड के शुरू में ही मुझसे गन्नौर के कांड के बारे में डॉयलॉग बुलवा लिया...

बाद में पूरी कहानी में कुछ अता-पता भी नहीं है क्या होता है गन्नौर?"अनुराग मेरी कहानी में काम कर खुद को ठगा सा महसूस कर रहा था


"शिट!...मेरा सारा टाईम...मेरी सारी मेहनत बेकार गई"


"अरे बेवाकूफ!...किसने कह दिया कि कहानी खत्म?"...

"परेशान क्यों होता है?"...

"मेरी कहानी किसी एकता कपूर के सीरियल जैसी ना हुई तो क्या.....उस से कम भी नहीं है"...

"कहानी अभी कम से कम एक एपीसोड और जारी रहेगी"...

"तेरे साथ-साथ 'कम्मो' का रोल भी अभी बाकि है"

"रात अभी बाकि है...बात अभी बाकि है"

"तूने अभी तक तो तेल देखा है...

चिंता ना कर...तेल की धार अभी बाकि है"...


***राजीव तनेजा***

2 comments:

सुशील said...

एसी चूरन वाली टीरेन में ही मिलती है या कलोनियो में भी मिलती है लगे रहो तनेजा जी

Udan Tashtari said...

लिखते रहिये..बिना लम्बाई नापे..हा हा!! बढ़िया लिखते हो.

 
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