"व्यथा-एक उभरते 'ब्लात्कारी' ब्लागर की"

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"व्यथा-एक उभरते 'ब्लात्कारी' ब्लागर की"

 

***राजीव तनेजा***

 

"सुनो....ये बलात्कार कैसे किया जाता है?

 

"तुम्हें करना है?"

 

"नहीं"...

 

"फिर बेफाल्तू में ऐसे बेतुके...बेमतलब के सवाल पूछ के मेरे दिमाग का दही क्यों करने पे तुले हो?"...

 

"वो दरअसल क्या है कि आजकल लिखने लिखाने के लायक कोई बढिया सा टॉपिक नहीं मिल रहा...

तो सोचा कि खाली वेल्ले बैठने से क्या फायदा?"...

 

"सही है!...लगे रहो"...

"जब तक लिखने-लिखाने के लिए कोई बढिया सा...धाँसू सा आईडिया ना मिल जाए..

तब तक बेकार में इधर-उधर बैठ के बेफाल्तू में उल्टी-सीधी हाँकने से तो अच्छा है कि 'ब्लात्कार-व्लात्कार' कर के ही टाईम पास कर लिया जाए?"

"क्यों!...है कि नहीं?

 

"और नहीं तो क्या?"

"सही ही तो है...फुल्ल एंजायमैंट के साथ टाईम का टाईम पास होगा और सीखने-सिखाने को अलग से मिलेगा"

"सीखने को मिलेगा?"...

 

"अब इस 'ब्लात्कार'जैसे सिम्पल काम में तुम्हें कौन सी नॉलेज की बात दिख गई?"

"मुझे तो इसमें सिर्फ 'कुँठित मानसिकता'...'कुत्सित विचारधारा' और घटिया सोच के अलावा और कुछ नहीं दिखता"

"हद है !...इतनी घटिया सोच?...वो भी एक लेखक की?"...

 

"क्यों?...कोई दूसरा ब्लॉगर मुझसे पहले बाज़ी मार ले जाए..उस से पहले मैँ खुद क्यों नहीं?

 

"कौन है जो तुमसे...या तुम उस से आगे निकलने की सोच रहे हो?"...

 

"अरे!...है एक सिरफिरा...जो आजकल अपने 'यश' से 'वंचित' हो खूब नाम कमा रहा है"

 

"तो क्या तुम भी अपने 'यश'...अपनी 'कीर्ति' से हाथ धोना चाहते हो?"

 

"किस 'कीर्ति'की बात कर रही हो तुम?"...

"कहीं वो'टैगोर गार्डन'वाली कवित्री 'कीर्ति वैद्य'की तो नहीं..जिसकी शायद कोई किताब छपने वाली थी?"...

 

"अरे बेवाकूफ!...मैँ उस 'कीर्ति'की नहीं बल्कि उस 'कीर्ति की बात कर रही थी जिसे अँग्रेज़ी में 'पापुलैरिटी'कहा जाता है"...

 

"खैर!..छोड़ो ये सब"...

"बदनाम होंगे तो क्या नाम ना होगा?"वाली फिलॉसफी ही कामयाब रहती है आज के ज़माने में"

 

"लेकिन ऐसी भी क्या फ्रस्ट्रेशन कि आगे निकलने की होड़ में तुम सारे नियम...सारे कायदे तोड़ दो?"

 

"तुम समझती नहीं हो...इस मकड़जाल की दुनिया याने के इंटरनैट में वही ब्लॉगर सबसे आगे...

सबसे तेज़...सबसे जुदा माना जाता है जो किसी ना किसी जायज़-नाजायज़ कारण सभी ब्लॉगों पर छाया रहता है"

 

"हम्म!...तो ये बात है"...

"लेकिन एक डाउट है मेरे दिल में"...

 

"क्या?"...

 

"यही कि एक स्त्री होते हुए मैँ तुम्हें ब्लात्कार की ट्रेनिंग देती भला अच्छी लगूँगी?"...

"लोग क्या कहेंगे?"...

 

"अरे!...लोगों की छोड़ो...लोगों का काम है कहना"...

"किसी की परवाह ना करते हुए तुम बेधड़क हो के मुझे शुरू से आखिर तक याने के 'ए' टू 'ज़ैड'तक सब समझाओ"...

 

"तुम एक काम क्यों नहीं करते?"...

 

"क्या?"

 

"पुरानी फिल्मों के 'डी.वी.डी' ले आओ बाज़ार से और उनमें जितने भी ब्लात्कार के सीन हों उनको बार-बार गौर से देख....

'रणजीत'से लेकर 'प्रेम चोपड़ा'..और..'गुलशन ग्रोवर'से लेकर 'शक्ति कपूर'तक...

सभी की  डायलाग डिलीवरी से लेकर उनके चलने तक के अन्दाज़ को हूबहू क़ापी करने की कोशिश करो...फालो करने की कोशिश करो"

 

"यार!...पुरानी फिल्मों को देखता ही कौन है?"...

"अगर तुम कहो तो नई फिल्मों के 'डी.वी.डी' ले आऊँ?"...

 

"नहीं...बिलकुल नहीं"...

 

"क्यों?...क्या खराबी है उनमें?"...

 

"अरे यार!...नई फिल्मों की हिरोईनों का सब कुछ तो पहले से ही इतना खुला-खुलाया होता है कि. ..

बेचारे विलेन का ज़रा सा भी मन ही नहीं करता है उनके साथ ब्लात्कार करने का"

 

"हम्म...अब समझा"...

 

"क्या?"...

 

"यही कि आजकल की फिल्मों में अधिकतर विलेन नायिका के भाई का रोल करना या फिर मसखरी करना ही क्यों पसन्द करते हैँ"...

 

"चलो!...खुदा का शुक्र है कि तुम्हें जल्दी ही बात समझ में आ गई"...

"ठीक है!...फिर शुरू करते हैँ"...

"पहला सबक ये कि सब कुछ पहले से ही सोच-साच के इस ढंग से प्लैन बनाना होगा कि ऐन टाईम पे कोई कंफ्यूज़न पैदा ना हो"......

 

"कैसा प्लैन? और किस तरह कि प्लानिंग?"...

 

"यही कि...किस का ब्लात्कार करना है?"...

"कैसे ब्लात्कार करना है?... वगैरा...वगैरा

 

"वो क्यों?"...

 

"ये सब इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि कई बार ऐन मौके पे क्राईम करने के लिए क्लाईंट ढूँढना मुश्किल हो जाता है"....

"कहीं ये ना हो कि बाद में तुम बावलों की तरह हर आती-जाती लड़की से ये पूछते फिरो कि...

"बहन जी!...क्या आप मुझ नाचीज़ के हाथों ब्लात्कार करा अपना उद्धार करवाना पसन्द करेंगी?"

 

"रहने दो...रहने दो!...इतना भी गोबर गणेश नहीं हूँ मैँ कि इत्ता सा...छोटा सा...बित्ते भर का काम भी ठीक ढंग से ना कर सकूँ"

 

"अरे!...तुम्हें नहीं पता...ये काम देखने सुनने को बेशक जितना भी आसान काम लगे लेकिन इसे करना उतना ही मुश्किल काम है जितना कि.... जम्बोजैट को कलाबाज़ियाँ खिला हवा में उड़ाना"

 

"फुल ट्रेनिंग...और परफैक्ट टाईमिंग की ज़रूरत होती है इस सब में"...

 

"तुम्हें फुल्ल बटा फुल्ल एक्यूरेसी याने के...सौ प्रतिशत शुद्धता चाहिए ना काम में?"...

 

"बिना किसी शक और शुबह के मिल जाएगी"...

 

"ओ.के!...फिर तो मेरी दुआएँ तुम्हारे साथ हैँ"...

"ऊपरवाले ने चाहा तो तुम अपनी बदचलनी के चलते इस नेक और पाक मकसद में ज़रूर कामयाब होगे और....

जहाँ तक रही सफलता की बात...तो वो तो यकीनन तुम्हारे ही कदम चूमेगी...आमीन"...

"हाँ!...बस इतना ज़रूर ध्यान रहे कि पूरी सावधानी और गोपनियता के साथ फुल-फुल एहतिहात बरतते हुए.....

ये काम कुछ इस तरीके से होना चाहिए कि किसी को कानोंकान खबर ना हो"

"खुदा ना खास्ता!..अगर कहीं किसी छोटी-बड़ी...माड़ी-मोटी गल्ती से फँसने-फँसाने का नम्बर आ भी जाए....

तो पूरी तैयारी रखना कि....क्या कहकर...क्या बोल कर कर अपना बचाव करना है?

 

"कहना सोचना क्या है?..सीधे-सीधे झूठ बोल दूँगा कि मैँ नहीं बल्कि ये कलमुँही ही खुद मेरा ब्लात्कार करने पे उतारू थी...सिम्पल"

 

"हाँ!...तब तो हो लिया बचाव-वचाव"....

"जानते नहीं 'पिल्ली दुल्लिस'...ऊप्स सॉरी...'दिल्ली पुलिस'को?"...

"हर अच्छे-बुरे काम में 'सदैव साथ'रहती है"

 

"तो?"...

 

"ठुल्लों ने पकड़ के वो धुलाई...वो मरम्मत करनी है कि समझो गए नौ साल के लिए सीधा जेल के अन्दर"

 

"क्यों!...लड़कों के ब्लात्कार नहीं होते हैँ क्या"...

 

"होते हैँ...और बखूबी होते हैँ...मैँने कब ना करी है?"...

 

"तो?"...

 

"लेकिन ये तो देखो कि कितने मुकदमे...कितने केस दर्ज होते हैँ हमारी कोतवालियों में इस बाबत?"

 

"यही तो कमी है हम हिन्दुस्तानी मर्दों में जो आज के इस कलयुगी ज़माने में भी औरतों को.....

पूरी इज़्ज़त...पूरा मान देते हुए इनके इस कदर गुलाम बने हुए हैँ कि इन पर मानहानि जैसे  छोटे-मोटे मुकदमे तक दर्ज करवाने से कतराते हैँ"

"मैँ तो कहता हूँ कि लानत है ऐसे तमाम नामर्दों पर जो हर तरह के लांछन सहते हुए भी...

इन हसीनाओं के जायज़-नाजायज़ हर ज़ुल्म-ओ-सितम को हँस-हँस कर सह जाते हैँ और...

तमाम तरह के कष्ट..हर तरह की तकलीफें सहने के बाद भी अपनी हँगामी बैठकों और पार्टियों में उनके बारे में एक-दूसरे को हँस-हँस कर ऐसे बतियाते हैँ....

मानों कोई मैडल जीत कर आए हों...कोई किला फतह कर के आए हों"...

 

"लेकिन मेरे ख्याल से तो दाद देनी चाहिए ऐसे हिम्मत वाले जवाँ मर्दों की जो तमाम तरह की मुश्किलों को सहते हुए भी कभी उफ तक नहीं करते...चूँ तक नहीं करते"

 

"हाँ!...एक और निहायत ही ज़रूरी और गौर करने लायक बात कि जब तक कोई खास मजबूरी ना हो....

तब तक मैँ इस ज़ोर-ज़बर्दस्ती की पॉलिसी या फिलॉसफी में यकीन नहीं रखती ह"...

"मेरे हिसाब से तो ऐसे सम्बन्ध आपसी प्यार से...दुलार से...और आपसी मनुहार से होने चाहिए"

"ये भी भला क्या बात हुई?कि मौका ताड़ कोई भी अन्धेरी सुनसान सी जगह ढूँढो और....

पागलों की तरह झपट्टा मार उड़ते हुए पँछी के पँख दबोच उन्हें कतर डालो"

 

"फॉर यूअर काईंड इंफार्मेशन!...पहले बात कि सभी ब्लात्कारी पागल नहीं होते और दूसरी बात ये कि....

अभी कुछ देर पहले हम जिस ब्लॉगर भाई का जिक्र कर रहे थे...

वो तो निहायत ही शरीफ ...एकदम ज़हीन किस्म का...सुलझा हुआ समझदार दिखने वाला इनसान है"

 

"मुझे तो अभी भी विश्वास नहीं हो रहा कि कोई ब्लॉगर बन्धु 'ब्लात्कार'जैसे टैक्नीकल और आर्टिस्टिक काम को अंजाम दे सकता है"...

 

"अब इसमें टैक्नीक और आर्ट कहाँ से घुस गया?"...

 

"मेरी कैल्कूलेशन के हिसाब से तो इस सब के लिए किसी इनसान(या जानवर कहें तो बेहतर)में....

पत्थर सा कठोर दिल...शुद्ध इस्पात से निर्मित टफ मज़बूत कलेजा और...अशोक की लाट के लोखंड जैसा तगड़ा गुर्दा होना ही बहुत है...सफिशिएंट है"...

 

"हाँ!..ये सब तो खैर कम्पलसरी आईटम्ज़ है ही लेकिन असली चीज़ ' कान होते हुए भी रोने-बिल्खने की आवाज़ों को ना सुनने' की टैक्नीक है और....

अच्छी भली खूबसूरत आँखे होते हुए किसी अबला नारी के आँसुओं को अनदेखा करना आर्ट है...कला है"...

 

"और ये सब दिलेरी नहीं बल्कि महा दिलेरी वाले काम हैँ...और तुम जैसे नौसिखिए ब्लॉगरों के बस का नहीं है इस सब को हैण्डल करना"...

 

"क्यों?...क्या कमी है हम में?"...

 

"यही कि जहाँ एक तरफ ब्लात्कार के वक्त लड़की ने ज़रा सा तनिक सा...रोने का ड्रामा  करना है ...

वहीं झट से तुम्हारी आँखों ने अश्रूधारा का सैलाब छोड़ सारे माहौल को सैंटीमैंटल बना तुम्हें भावुक कर देना है"...

"और किसी भी दुनिया का कोई भी कानून इस सब की इज़ाज़त नहीं देता है...परमिशन नहीं देता है"...

"आखिर!...हर चीज़ के कायदे होते हैँ....नियम होते हैँ"...

"और कोई पहले से बने-बनाए...तय नियमों को छेड़. ..अच्छे भले चलते हुए खेल से खिलवाड़ करे...ऐसा मुझे बिलकुल पसन्द नहीं...कतई पसन्द नहीं"...

 

"मैडम जी!...इतना कमज़ोर भी ना समझें आप हमें"...

"हम चाहें तो क्या नहीं कर सकते?"..

"क्या हम ब्लॉगर इनसान नहीं हैँ?"....

"क्या हमारी  इच्छाएँ ...हमारे अरमान...हमारे सपने नहीं हो सकते?

"लेकिन एक बात सही कही आपने...हम इतने निर्दयी भी नहीं कि बिना बात जोर आजमाईश पे उतर आएँ"

"अपुन ने तो अपना उसूल बनाया हुआ है कि जब तक भली भांति जान नहीं लेंगे कि लाड से...प्यार से...दुलार से...मनुहार से काम नहीं बनने वाला है"...

"तब तक कोई हाथापाई नहीं...कोई ज़ोर-आजमाईश नहीं"...

"लेकिन उसके बाद हमारे माथे ने भी घूमना है और ना चाहते हुए भी हमें ज़ोर-ज़बरदस्ती से अपनी बात मनवाने पे मजबूर होना पड़ना है"

 

"क्यों?...क्या डाक्टर कहता है कि ज़ोर आजमाईश करो?"....

"अपना प्यार से नहीं पटा सकते क्या?कि..पटने वाली भी खुश और पटाने वाला भी खुश"

 

"अब क्या हम पटें और क्या किसी को पटाएँ?"...

 

"क्यों?...क्या हुआ?"...

 

"ये लड़कियाँ खुद ही पहले तरह-तरह के बहाने बना लिफ्ट देती हैँ कि..'आजा मेरे गाड़ी में बैठ जा'और....

बाद में जब बन्दा खुद अपने हिसाब से ड्राईविंग करना चाहे ...थोड़ी एक्सट्रा स्पीड पकड़ना चाहे तो बेफाल्तू में हाय-तबा मचाने लगती हैँ कि...

"हाय!..मैँ लुट गई"...

"हाय!...मैँ बरबाद हो गई"मैँ मुँह टेढा कर हँसता हुआ बोला

 

"उड़ा लो!...उड़ा लो जितना मज़ाक उड़ाना है अभी उड़ा लो"...

"रात को कमरे में आना...तब बताऊँगी"....

"भिनभिनाते मच्छरों की बीच नंगी ज़मीन पे ...बिना चद्दर...बिना तकिए...बिना गिलाफ के ना सुला दिया तो मेरा नाम भी'वैजंतीमाला'नहीं"...

 

"डार्लिंग!...मैँ तो...मैँ तो ऐसे ही मज़ाक कर रहा था"...

 

"कितनी बार कह चुकी हूँ कि मुझे ऐसे बेहूदा..बेढंगे मज़ाक बिलकुल पसन्द नहीं"

 

"वो तो ऐसे ही बातों में से बात निकले जा रही थी तो मैँने कह दिया"...

"वर्ना मेरा कभी भी आपके दिल को ठेस पहुँचाने का कोई इरादा नहीं रहा"...

 

"खैर छोड़ो!...बेकार में बहस बढाने से क्या फायदा?"...

"हाँ तो हम!...कुछ पकड़ने पकड़ाने की बात कर रहे थे ना?"...

 

"जी"...

 

"तो मेरा कहना और मानना ये है कि हम औरतें तो सिर्फ उँगली ही पकड़ाती हैँ...

 

"और बाकि हाथ जैसे हम खुद लपक लेते हैँ?"...

 

"बिलकुल!...सारे के सारे मर्द एक जैसे होते हैँ...इनसान की शक्ल में छुपे हुए मादक भेड़िए"...

 

"किस बिनाह और किस शक-ओ-शुबह के आधार पर आप ऐसा कह रही हैँ?"..

 

"हर कहीं...हर किसी का ब्लात्कार तो नहीं करने बैठ जाते हम मर्द?"

 

"क्यों? रोज़ ही तो अखबारों और टीवी में इस तरह की खबरें सुर्खियाँ बन छाई होती हैँ कि फलानी फलानी जगह पे नाबालिग लड़की से सामुहिक ब्लात्कार किया गया"

 

"हाँ!...छाई रहती है...क्योंकि इनके सहारे उन्हें अपना अखबार बेचना होता है ...अपने चैनल की 'टी.आर.पी' बढा 'एड' बटॉर माल कमाना होता है"...

 

"तुम लोग भी तो बड़े चाव से नमक-मिर्च लगा ऐसी खबरों हवा दे दे फैलाते हो"...

"ठण्डी आहें भर ऐसी खबरों को देखने सुनने में तुम्हें अजीब सा...अच्छा सा सुकून मिलता है"...

"खूब मज़ा आता है ना तुम्हें इस सब में?"

 

"अरे !...मज़ा कहाँ आता है?"...

"उल्टा!...हमें तो खुन्दक आ रही होती है उस ब्लात्कारी पर"

 

"खुन्दक आ रही होती है या रश्क कर रहे होते हो उसकी किस्मत से?"

 

"क्या?...क्या मतलब है तुम्हारी बात का?

"कहना क्या चाहती हैँ आप?कि जब किसी का ब्लात्कार होता है...रेप होता है तो हमें खुशी महसूस होती है...गर्व महसूस होता है"

 

"और नहीं तो क्या?...सब के सब मर्द एक जैसे ही होते हैँ"

 

"और तुम औरतें कौन सी दूध की धुली हो?"..

 

"क्यों?...हम औरतों ने अब तुम्हारा क्या उखाड़ लिया?"...

 

"तुम औरतें भी तो खूब पोर्न साईटस देखती हो...उन्हें एंजाय करती हो और जब कभी मौका हाथ लगता है तो....

किसी निहत्थे मर्द को अकेला पाकर उसका ब्लात्कार करने से भी नहीं चूकती हो"...

"अभी कुछ महीने पहले की ही तो खबर है कि समालखा या चण्डीगढ ...पता नहीं कहाँ...

हाँ!..याद आया...शायद इन्दौर की ही बात है ....

वहाँ चार मुस्टंडी लड़कियों ने ब्लू फिल्म देखने के राह चलते एक किशोर को दिनदहाड़े दबोच लिया और...

ज़बरदस्ती उसकी मर्ज़ी के बिना उस से कुकर्म करते हुए उसका यौन...उसका शील भंग कर डाला"

 

"तो क्या हुआ?"...

"आम बात है ये तो...बाहरले देशों में तो ऐसा अक्सर होता रहता है"...

 

"आपके लिए आम बात होगी ये "...

"उस बेचारे...निरीह...लाचार प्राणी से पूछो कि क्या बीत रही होगी उस पर ?...

जिसे उन हवस की अँधी पुजारिनों ने वक्त से पहले ही सब अंतर...सब भेद बता नाबालिग से बालिग बना दिया"

"जहाँ एक तरफ दैहिक...मानसिक और नैतिक प्रताड़ना के चलते वो बेचारा दुनिया भर की तकलीफें सहन कर रहा होगा....दुख झेल रहा होगा...

वहीं दूसरी तरफ उसके दुखों...उसकी तकलीफों से मुँह फेर तुम औरतें जानबूझ कर अनजान बन..

आराम से अपनी किट्टी पार्टियों में उसकी खिल्ली उड़ा हँसी ठट्ठा कर रही होगी"

 

"तो क्या फर्क पड़ता है इस सब से तुम्हें?"

 

"फर्क?...

 

"अरे!...हमसे पूछो कि हमारे दिल पे उस वक्त क्या बीतती है जब हमें हमारे घर से...हमारे समाज से...बेदखल हो निर्वासित जीवन जीना पड़ता है"

 

"तो?"

 

"पत्थर दिल हो तुम...तुम्हें हमारी ...हमारे अरमानों की कोई परवाह नहीं होप्ती"...

 

"लेकिन मैँने तो किसी पुरानी फिल्म में ...

हाँ!...याद आया...'मर्द'फिल्म में 'बच्चन साहब'को डॉयलॉग मारते सुना था कि..."मर्द को दर्द नहीं होता"

 

"अरे!...वो सब फिल्मी बातें है...उनका क्या है?"...

"देखा नहीं?...आजकल टीवी चैनलों पर खुद 'बच्चन साहब'आड़े-तिरछे 'दर्दों'से बचने के लिए एक नामी मशहूर कम्पनी का बेनामी 'दर्द निरोधक तेल'रहे हैँ"...

"अब अगर ऐसी महान हस्ती को भी दर्द होता है तो हम नाचीज़ भला किस खेत की मूली या गाजर हैँ?"

"सच यही है कि...हमें भी तुम्हारी बातें..तुम्हारे ताने दुखते हैँ...अन्दर तक चुभते हैँ"...

लेकिन हिम्मत देखो उसकी...हौसला देखो उसका..

मजाल है जो उसने इस अन्याय की...इस बेशर्मी की कहीं भी चर्चा की हो..ढिढोड़ा पीटा हो....या तमाशा खड़ा किया हो"

 

"तो?...

 

"लेकिन तुम औरतें...अपनी मर्ज़ी से तुम किसी भी ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे से दिन भर चिपकी फिरो...उसका कुछ नहीं परंतु ...

तुम्हारी मर्ज़ी...तुम्हारी इज़ाज़त के बिना कोई ज़रा सा छू ले सही...टच कर ले सही...

ताड़का बन तुरंत हाय तौबा मचा आसमान सर पे उठा लेती हो"

"देखा!...कितना फर्क है तुम में और हम में?"...

"हम मर्दों में अभी भी शर्म बाकि है...हया बाकि है"...

"हम लोग अपनी इज़्ज़त के चलते खोखली पापुलैरिटी हासिल करने की खातिर ऐसी बातों को हवा नहीं देते...तूल नहीं देते और...

तुम औरतों के हर ज़ुल्म...हर सितम को चुपचाप अपना नसीब मान कर सह जाते हैँ"...

"लेकिन कभी तो सवेरा होगा...किसी का तो सोया ज़मीर जागेगा और वो इस अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठा अलख जगाएगा"

"याद रखना!...उस दिन इंकलाब आएगा...सैलाब आएगा जो...तुम्हें...तुम्हारे इन दकियानूसी ख्यालों को बहा ले जाएगा"

 

तो आओ दोस्तों!...हम सब मिलकर ये अहद करें...ये कसम लें कि आज से...अभी से....

इस ब्लात्कार के काम में हमने इन औरतों से बिलकुल भी पीछे नहीं रहना है और....

खुलेआम इनके वर्चस्व को चुनौती देते हुए अपना एकाधिकार जमाना है"...

 

"ब्लात्कारी यूनियन'...ज़िन्दाबाद...

 

"ज़िन्दाबाद...ज़िन्दाबाद"

 

"जय हिन्द"...

 

"भारत माता की जय"

 

"अरे!...ये किसके खिलाफ नींद में बड़बड़ाते हुए नारे लगा रहे हो?"...

"उठो!...सात बज चुके हैँ...पानीपत जाना है कि नहीं?"...

"कितनी बार कह चुकी हूँ कि ये कहानियाँ-वहानियाँ सिर्फ छुट्टी के दिन ही लिखा करो लेकिन....

तुम हो कि रात रात भर जाग के पता नहीं कम्प्यूटर के साथ क्या टक टकाटक करते रहते हो"

 

***राजीव तनेजा***

3 comments:

सुशील कुमार छौक्कर said...

अमा मान गये गुरू। इतने दिन छिपा के रखी है आज निकाली है। यार तुम तो पहुँचे हुए निकले नींद में लिखते हो। नींद में ही अपने अरमान निकाल लेते हो। बहुत खूब। मजा आ गया।

दीपक भारतदीप said...

हा...हा...बहुत बढि़या
दीपक भारतदीप

अविनाश वाचस्पति said...

सच को
सपने का बाना
ऐसा पहनाया
सपना भी
यथार्थ नजर
आया.

अब सच है
सपना है
जो कुछ भी है
अपना है.

वैसे स्‍कोप बहुत है
बलात्‍कार में नहीं
विज्ञापनों में नहीं
सीखने सिखाने में भी नहीं
सपनों में.

सच बतलाना
यह सपना तुम्‍हें
क्‍योंकर आया
क्‍या अमिताभ बच्‍चन
ने नहीं बतलाया.

 
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