मेरा खुला पत्र योगेश समदर्शी के नाम

rajiv holi cartoon

समदर्शी जी नमस्कार....

ये खुला पत्र मैँ आपको इसलिए नहीं लिख रहा हूँ कि मेरे पास लिफाफा खरीदने के लिए खुले पैसे नहीं हैँ। एक्चुअली क्या है कि मेरे पास लिफाफे को बन्द करने लायक ज़रूरी गोंद नहीं थी तो मैँने सोचा कि.......अब आप कहेंगे कि गोंद नहीं थी तो क्या हुआ?...अपना चबड़-चबड़ करती गज़ भर लम्बी ज़बान तो थी...अपना झट से लिफाफे के किनारे पे उसी को सर्र से सरसराते हुए फिराते और फट से दाब देते अँगूठे से।....मुआफ कीजिएगा समदर्शी जी....आपने मुझे सही से नहीं पहचाना.....अपने शरीर के 'अँगूठे' जैसे पवित्र और पावन हिस्से को ऐसे बेकार के..... गैरज़रूरी कामों में ज़ाया कर  तिरसकृत  करने के बजाय मैँ उसका सदुपयोग लेनदारों को अँगूठा दिखाने में या फिर यार-दोस्तों को वक्त-ज़रूरत पर ठेंगा दिखाने में इस्तेमाल करना ज़्यादा बेहतर समझता हूँ और फिर आज के माड्रन ज़माने में...थूक से.....छी!...पढा-लिखा इनसान होने के नाते मैँ ऐसी घटिया सोच...ऐसा वाहियात ख्याल भी मैँ अपने दिल में कैसे ला भी  सकता हूँ?

नोट:होली के अवसर पर योगेश समदर्शी जी ने हम साहित्य शिल्पियों के काफी अच्छे कार्टून बनाए।अपने कार्टून को देख एक नया प्रयोग करने की सोची।उम्मीद है कि आप सभी को  पसन्द आएगा

बेकार की फुटेज ना खाते हुए मैँ सीधे-सीधे असल मुद्दे  पे आता हूँ।इसमें कोई शक नहीं कि आप एक कवि...लेखक होने के साथ-साथ कम्प्यूटर तकनीक के महान ज्ञाता भी हैँ।आप गुणी है....भगवान हैँ.....ऊपरवाले ने आपको एक नहीं...अनेक गुणों से लबरेज़ करके इस धरती पर भेजा है।आप में कार्टून बनाने की कला कूट-कूट कर भरी हुई है लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं कि आपको हर किसी के माखौल को उड़ाने का खुला लाईसंस मिल गया।

आपके नाम के अनुरूप मेरा ख्याल है कि आप योग वगैरा में काफी रुचि रखते हैँ।अच्छी बात है...इससे तन मन दोनों तंदुरस्त रहते हैँ।अगर मैँ सही हूँ तो समदर्शी का मतलब होता है ...सबको समान दर्‍ष्टि से देखने वाला लेकिन यहाँ तो ये जान के घोर निराशा हुई किए आप तो समान दर्‍ष्टि से देखने के बजाए आप तो किसी को देखते ही नहीं है(कुछ लड़कियों को भी आपसे यही शिकायत है लेकिन उनकी गोपनियता और निजता के लिहाज से उनका नाम यहाँ मकड़जाल पर उजागर करना उचित नहीं होगा)हाँ!...तो मैँ कह रहा था कि आप किसी को देखते ही नहीं हैँ बल्कि जो मन में आता है...जैसा मन को भाता है...बिना कुछ सोचे समझे उसे तुरंत कर डालने पे उतारू हो जाते हैँ।

हाह!...मैँ आपको क्या समझा और आप क्या निकले?....

कुछ तो आपने अपना और मेरी इज़्ज़त का ख्याल किया होता।क्या सोचा था कि आपकी ऐसी हिमाकत देख के राजीव खुश होगा?... शाबाशी देगा?...ऑक थू.....रोना आ रहा है मुझे अपनी किस्मत पर।गली-मोहल्ले के छोटे-छोटे...नन्हें-मुन्ने बच्चे तक बड़े कांफीडैंस के साथ मेरा मज़ाक उड़ा रहे हैँ कि 'निक्कर' वाले अँकल आ गए...'निक्कर' वाले अँकल आ गए।

कसम ले लो मुझसे उस काली कमली वाले परवरदिगार की कि मैँने उस "बिन माँगे मोती मिले" वाले भयानक हादसे के बाद से ही निक्कर पहनना छोड़ा हुआ है।सच!...कसम है मुझे काली दिवार पे सूखते सफेद पॉयजामे के मटमैले नाड़े की जो मैँ एक लफ्ज़ भी झूठ कहा हो।

अब आप कहेंगे कि बच्चे तो भगवान का रूप हुआ करते हैँ

झूठ...बिलकुल झूठ.....कभी हुई करते होंगे भगवान का रूप....आजकल तो इनसे बड़ा शैतान...इनसे बड़ा उत्पाती पूरे जहाँ में भी ढूंढे ना मिलेगा।क्या कहा?....विश्वास नहीं होता?....अरे!...हाथ कँगन को आरसी क्या और पढे-लिखे को फारसी क्या?..एक बार यहाँ....मेरे यहाँ आ के मेरे ही नासपीट्टे बच्चों के साथ दो-दो हाथ कर के देख लें...अपने आप पता चल जाएगा।आप चाहें तो बेशक तस्दीक के लिए गवाही के तौर पर अपने साथ कुछ निजी गवाह और बॉर्डीगॉर्ड भी ला सकते हैँ....आपको खुली छूट है लेकिन ये सब आपके अपने जोखिम और विवेक पर निर्भर करेगा कि आपका ऐसा करना उचित भी होगा या नहीं।

मानता हूँ कि चिट्ठाजगत में आप मेरे सबसे प्रिय हैँ...अभिन्न मित्र हैँ लेकिन फिर भी मैँ यही कहूँगा कि आपने मेरे साथ अच्छा नहीं किया।अरे!...सच्चे दोस्त वो होते हैँ जो वक्त-ज़रूरत पर दोस्ती के लिए खुद को कुर्बान करने से भी पीछे नहीं हटरे और कुछ दोस्त आप जैसे नामुराद भी होते हैँ जो मौका देखते ही जले पे नमक छिड़कना नहीं भूलते।

जैसे कमान से निकल चुके तीर को रोका नहीं जा सकता और ज़बान से निकले हुए शब्दों को फिर से पलटा नहीं जा सकता और पलटना भी नहीं चाहिए क्योंकि क्षत्रिय जो एक बार ठान लेते हैँ...सो ठान लेते हैँ।

चलो!...जो किया सो किया...लेकिन ये तो सोचा होता कम से कम कि किस बेस पे आप मुझ जैसे जवाँ मर्द पट्ठे की रोएंदार टाँगों को क्लीनशेव्ड दिखा रहे हैँ?....तनिक सा....तनिक सा भी ख्याल नहीं आया आपके दिल में एक बार कि क्या बीतेगी राजीव बेचारे पर?...कैसे सामना करेगा वो इस जग-जहाँ के निष्ठुर तानों का?....कैसे पिएगा वो शर्बत इतने अपमानों का?....कैसे वो  बरसों की मेहनत से बनाया हुआ अपना छद्दम मैचोइज़्म बरकरार रख पाएगा।...कैसे "फड़ के किल्ली...चक्क दे फट्टे" का नारा बुलंद कर पाएगा?

नहीं!....कुछ नहीं सोचा आपने....अगर सोचा होता तो इस कार्टून में मैँ नहीं बल्कि वो नुक्कड़ पे बैठने वाला ब्ळॉगर 'मौदगिल' जी को भिगो रहा होता।हाँ!....नुक्कड़ से याद आया कि आखिर क्या मिल जाता है आपको किसी को ऐसे टिप्पणी माँगते हुए दिखाने से?....या फिर किसी बेचारे बुज़ुर्ग ब्लॉगर को लाईफ टाईम ऐचीवमैंट अवार्ड देने के बजाय ज़बरदस्ती किसी महिला के हाथों पकड़वा के रंग डलवाने में?....अब वो बेचारी महिला शान से अपनी चाय पत्ती बेचें या फिर कविताएँ लिखें?...

आखिर!....आप साबित क्या करना चाहते हैँ?....वैसे भी आपको पता होना चाहिए कि शेर खुद अपने दम पे अकेले ही शिकार किया करता है।ये याद दिलाने की मैँ ज़रूरत नहीं समझता कि उसे किसी चारे या फिर सहारे की ज़रूरत नहीं होती।खास कर के किसी औरत के सहारे की तो बिलकुल नहीं लेकिन ये गूढ ज्ञान की बातें आप क्या समझेंगे?....आप!....आप तो बस अपने गाँव और गाँव की कविताओं में ही डूबे रहिए...रमे रहिए।वैसे मैँने शायद आपके मुँह से ही उड़ती-उड़ती खबर सुनी थी कि आपका कोई कविता संग्रह भी जल्द ही छपने वाला है।अगर ऐसा सचमुच में है तो आपके मुँह में घी-शक्कर।मेरी तरफ से अग्रिम बधाई स्वीकार कर लें।अग्रिम इसलिए कि इतना सब कुछ होने के बाद मैँ इस निष्ठुर ज़माने में जी भी पाऊँगा या नहीं...इसका मुझे डर है।.....

इस जीवन को अपना साथी बनाने से पहले मेरी जॉन मुझे बहुत कुछ सोचना है।

ठीक है...माना कि मैँ निराश हूँ...उदास हूँ...हताश हूँ  लेकिन इसका मतलब ये हरगिज़ मत समझिएगा कि पाँच महीने से मैँने कुछ नहीं लिखा...इसलिए मैँ चुक गया हूँ ।बस इतना समझ लीजे कि 'लॉट सॉहब' आराम फरमावत रहे।

और हाँ!...किसी झूठे गुमान में ना रहिएगा कि मैँ आपसे हार मान गया हूँ या फिर आपसे डर गया हूँ। वैसे मैँ आपकी जानकारी के लिए बता दूँ तो इस पूरे जहाँ में मुझे डर लगता है सिर्फ दो चीज़ों से...एक...ऊपर बैठे परम पिता परमात्मा से और दूसरा नीचे बैठी अपनी महरारू....याने के अपनी घरवाली से ।ऊपर बैठे परमात्मा से तो खैर सभी डरते हैँ क्योंकि हमारे हर अच्छे-बुरे काम का वो गवाह होता है और फिर हमारी जीवन नैय्या का रिमोर्ट कंट्रोल भी तो उसी के हाथ में होता है ना?...इधर हमने कुछ गड़बड़ करी नहीं कि उधर उनका हाथ सीधा रिमोर्ट के बटन की तरफ झपट पड़ना है।उनसे कैसे कोई पंगा ले सकता है?...रही बात बीवी की तो...भईय्या....क्या बताएँ?....उससे तो इसलिए डर लगता है कि पापी पेट का सवाल जो छाया रहता है हरदम हमारे दिमाग पर।

"क्या कहा?...नहीं समझे"......

"अरे बाबा!...खाना जो उसी ने पका के खिलाना होता है हमको ...सिम्पल...और ये तो आप भली भांति जानते ही हैँ कि तीनो टाईम बिना डट खाए तो हमसे रहा नहीं जाता।.....अब ऐसी खाए-पिए की जगह नहीं डटेंगे तो क्या अपनी ऊ.पी वाली 'मायावती' बहन जी के आगे जा के कटेंगे?

एक शिकायत और है मुझे आपसे कि इतने बड़े तुर्रम खाँ कवि कम शायर....कम ब्लॉगर....कम आयोजनकर्ता को भिगोने के लिए आपने मेरे हाथ में 'A.K 47' या फिर 'A.K 3 पकड़ाने के बजाए ये बच्चों का सा फिस्स-फिस्स करता फिस्सफिस्सा सा झुनझुना पकड़ा दिया...ये बहुत गलत किया।....

"क्या कहा?...क्या गलत है इसमें?"......

"हद हो यार!...तुम भी?.....अब इतने बड़े कवि सम्राट को चारों खाने चित्त करना है तो क्या ऐसे 'फिस्स'.....'फिस्स'...'फचाक्क'....करके ढेर करूँगा?.....

नहीं!...अब और बे-इज़्ज़ती बर्दाश्त नहीं होती मुझसे।मैँ आपके खिलाफ मानहानि का केस दायर करने जा रहा हूँ।...जी हाँ!...मानहानि का....अगर नकद गिन के पूरे सवा इक्यावन रुपए ना धरवा लिए इस हथेली पे तो मेरा भी नाम राजीव तनेजा नहीं।....वो इसलिए कि क्या आपको डाक्टर ने कहा था कि मेरे काम-धन्धे का ढिंढोरा पूरे जहाँ में पीट डालो?...अरे!....खुशी से नहीं करता हूँ इसे....काम है मेरा ये ...बच्चे जो पालने हैँ लेकिन अफसोस....अब तो शायद बच्चे भी ठीक से ना पाल पाऊँ....पहले ही उधार वालों से परेशान हूँ...ऊपर से आपने जग-जहाँ को अपनी एक पोस्ट द्वारा बतला दिया कि राजीव का रैडीमेड दरवाज़े-खिड़कियों का काम है।अब तो जिसको नहीं भी बनाना होगा...वो भी सोचेगा कि चल यार!...दो कमरे एक्स्ट्रा डाल लेते हैँ....अपना क्या जाता है?.....आए-गए के काम आएँगे।.....राजीव है ना

उम्मीद है कि अब सीधा कोर्ट में ही मुलाकात होगी.....नोटिस बस पहुँचता ही होगा।.....और हाँ!....ध्यान रहे कि 'पूरे सवा इक्यावन रुपए' का क्लेम ठोका है आपके ऊपर...

ना एक पैसा कम...ना एक पैसा ज़्यादा।

फिलहाल इतना ही...बाकि फिर कभी

आपका शुभेच्छु,

राजीव तनेजा

6 comments:

Udan Tashtari said...

सवा इक्यावन से एक पैसा कम न लेना..मैं तुम्हारे साथ हूँ..ईंट से ईंट बजा देंगे. :)

मस्त है जी!! खुल्ला पत्र!!!

अनूप शुक्ल said...

राजीव तुम संघर्ष करो समीर तुम्हारे साथ हैं!

योगेन्द्र मौदगिल said...

राजीव जी,
इस चाय वाली महिला का कोई नाम नहीं है क्या..? अगर है तो आपको लेने मैं शरम कैसी..?

दूसरी बात
मैं इतना भी.... नहीं जितना तुमने बताया..
मुझे लगता है योगेश समदर्शी बहुत दूरदर्शी भी है क्योंकि उन्हें पता था......
कि----

'कौन कहता है बुढ़ापे में इश्क का सिलसिला नहीं होता..
अरे आम तब तक मीठा नहीं होता जब तक पिलपिला नहीं होता'

एक कहावत है
'अनाड़ी का ठोकना फट्टे का नुकसान'
v
'काम कोई भी हो तजुर्बा उसे निखार देता है..
तभी तो दुकान वाला लाला छोरियों को बिना गारंटी के उधार देता है...'

एक बार फिर होली की बधाई

सुशील कुमार छौक्कर said...

राजीव जी मैं भी तुम्हारे साथ हूँ। मैं भी जब उनसे होली खेलने गया तो उन्होने गेट बंद कर लिया। खुद हमको रंग कर चले गए और जब हमारी बारी आई तो गेट बंद कर दिया। ये सरासर नाइंसाफी है ना। हम भी हर्जाना माँगगे जी।

अविनाश वाचस्पति said...

आपने जेब में रखा हुआ

रंगीन पानी भरा गुब्‍बारा

क्‍यों नहीं दे मारा

अरे सुनीता जी को नहीं

न ... न .... मोद्गिल को भी नहीं

अरे भई अपने कौन मारता है

अब तो सिर्फ एक ही बचा है

जिसका नाम समदर्शी चचा है

जिसने नाम तो समदर्शी रखा है

पर उसने हरेक को
टिप्‍पणी मांगने नहीं बैठा रखा है
इस काम के लिए तो उसे नुक्‍कड़ ही दिखा है

उसे ही दे मारो .........

अरे नहीं अगली होली का मत करें इंतजार

एक अप्रैल आ तो रहा है

उस दिन उसे नुक्‍कड़ पर बैठायें
और उसी से सबके लिए टिप्‍प्‍णी मंगवाएं

और बाकियों से गुब्‍बारा मरवाएं

गुब्‍बारा मारने पर रोक सिर्फ होली पर थी

1 अप्रैल को नहीं होगी

यह आइडिया दे दो सबको

उसी दिन स्‍टाक में बचे
सभी गुब्‍बारों की बिक्री होगी।

योगेश समदर्शी said...

बहुत खूब राजीव भाई यह आपकी पोस्ट इतने दिनों बाद मेरी नजरों मैं आई. कई महीने बाद दिखी ... और आपका भेजा नोटिस तो साला अभी तक नहीं आया. रही बात मान हानि की तो साब मान हानि तो कार्टून बनाने वाले की हुई है जिसकी किस्मत देखिये .... बड़े बड़े कार्टूनिस्ट सोनिया गाँधी का कार्टून बनाते हैं, प्रधान मंत्री का बनाते हैं रास्त्रपत्ति का बनाते हैं पर वाह रे हमारी किस्मत हमारा दुर्भाग्य हमें आप मिले .... गनीमत है साहब आपको हाफ पैंट पहना दी ...... बस मेरा मुह मत खुलवाओ अब होली और वोह माहोल नहीं है इस लिए बाद मन मसोस कर बैठ जाता हूँ अब तो आप आने वाली होली का इन्तजार करो तब दूंगा आपको जवाब आपकी इस पोस्ट का ... वैसे बधाई स्वीकार करें इस उम्दा पोस्ट के लिए... ऐसी पोस्ट विशेष रूप से इमेल द्वारा मुझे भेज देते... आगे से ध्यान रखना जी.... बधाई है आपको उत्तम लेखन के लिए.... हा हा हा हा हा

 
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