तोहफा कबूल है हमे....

"मुँह पर सूजन...चाल में लंगड़ाहट...आवाज़ में भारीपन"...

"तनेजा जी....ये क्या हाल बना रखा है?"...

"कुछ लेते क्यों नहीं?"...

"अब क्या बताऊँ गुप्ता जी?...ना किसी को बताते बनता है और ना ही छुपाते बनता है"...

"तो क्या बीवी ने?"...

"अजी!...अपनों में इतना दम कहाँ कि हमको मिटा सकें....ये तो वो....

"तो फिर किसने आपकी ऐसी हालत कर दी?"...

"दरअसल हुआ क्या कि मैँ अपने रोज़ाना के रुटीन के तहत सुबह पार्क में सैर कर रहा था"...

"ओ.के"...

"पार्क में घुसते वक्त मैँने बाहर खड़ी एक भैंस को रंभाते देखा...तो मेरा मन खुद बा खुद गाने के लिए मचल उठा"...

"गुड!...खरबूजे को देख कर खरबूजे का रंग बदलना तो लाज़मी है ही"....

"जी"...

"फिर क्या हुआ?"...

"मैँने लम्बी तान ली और शुरू हो गया...

"तोहफा कबूल है हमें सरकार आपका...

ले आया फिर हमें यहीं...लो प्यार आपका"...

"ओ.के"....

"मैँने कुछ बुरा तो नहीं किया ना?"...

"नहीं-नहीं...बिलकुल नहीं .....जिस तरह सैर करने से हम तन्दुरस्त रहते हैँ और हँसने...खिलखिलाने से हमारी टैंशन...हमारा तनाव दूर होता है...ठीक उसी तरह गीत गुनगुनाने से भी कई रोगों से मुक्ति मिलती है"...

"जी"...

"फिर क्या हुआ?"...

"मैँने लम्बी तान ले अपना प्रलाप...

ऊप्स!....सॉरी आलाप शुरू ही किया था कि मुझ से आगे चल रहे एक सरदार जी अचानक ठिठक कर रुक गए और मुझे घूर कर देखने लगे"...

"ज़रूर बीवी से लड़ कर आया होगा...इसलिए उसे तुम्हारा ऐसे पब्लिक प्लेस में खुश हो कर खुलेआम गाना रास नहीं आ रहा होगा"....

"जी!...पहलेपहल मुझे भी ऐसा ही महसूस हुआ लेकिन....

"लेकिन तुम्हें भी क्या ज़रूरत थी खुश हो लम्बी तान ले आलाप लगाने की?....अपना आराम से...धीमे से....हौले-हौले भी तो गुनगुना सकते थे"...

"बात तो आपकी सोलह ऑने सही है गुप्ता जी लेकिन जोश में भला होश कहाँ रहता है?"...

"ये तो है"...

"भैंस की मधुर रंभाहट सुन मुझ से रहा ना गया और दिल के हाथों मजबूर हो पता ही नहीं चला कि कब मेरी आवाज़ तेज़ पर तेज़ होती चली गई"...

"ओ.के...फिर क्या हुआ?"...

"मैँ अपने किए पे शर्मिन्दा हो उनसे आँखे नहीं मिला पा रहा था"....

"गुड!...शरीफ आदमी के यही लक्षण होते हैँ"...

"तुम्हें उन्हें बिना किसी झिझक के 'सॉरी' बोल देना चाहिए था"....

"जी!...यही सोच कि जो होगा देखा जाएगा...मैँने हिम्मत जुटाई और आहिस्ता से उनकी तरफ देखा"....

"गुड"...

"वो मेरी ही तरफ देख रहे थे"...

"ओ.के"...

"फिर मैँने दिल पक्का कर के अपने अन्दर के मर्द को जगाया"....

"दैट वाज़ लाईक ए ब्रेव मैन"...

"बहादुर आदमियों के यही लक्षण होते हैँ...वो बड़ी से बड़ी...कठिन से कठिन आपदा से भी जूझने की क्षमता रखते हैँ"....

"जी"...

"मुसीबतों से टकराना उनके बाएँ हाथ का खेल होता है"....

"बस इसी विचारधारा के चलते मैँने भी अपने हौंसले को पस्त ना होने देने की ठान ली और धीमे से डरते-डरते उनकी तरफ देखा"....

"ओ.के"...

"मैँ हिम्मत जुटा उन्हें सॉरी बोलने ही वाला था कि उनके चेहरे पे मुस्कुराहट देख मैँने अपना इरादा बदल लिया"...

"फिर क्या हुआ?"...

"पहले तो वो कुछ क्षण के लिए टकटकी लगा मुझे निहारते रहे...फिर हौले से मुस्काए"...

123

"ओ.के...फिर?"....

"फिर वो धीमे कदमों से चलते हुए मेरे पास आए और मेरे मासूम चेहरे को अपने कोमल हाथों में थाम लिया"...

"ओह माई गॉड!...फिर क्या हुआ?"...

"उन्होंने मेरे माथे को हौले से चूम मुझे गले से लगा लिया"...

"हॉय ओ रब्बा!...मैँ मर जावाँ गुड़ खा के"....

"क्या सच में ऐसा हुआ था?"...

"और नहीं तो क्या मैँ झूठ बोल रहा हूँ?"...

"फिर क्या हुआ?"..

"उसके बाद उन्होंने मेरा नाम...फोन नम्बर...पता...काम क्या करता हूँ वगैरा-वगैरा पूछा"...

"और तुमने सब कुछ सच-सच बता दिया?"...

"जी"...

"गुड!...ऐसे मौकों पर तो झूठ बिलकुल भी नहीं बोलना चाहिए"....

"जी!...

"दैन व्हाट?....उसके बाद क्या हुआ?"...

"उसके बाद वो अपने रस्ते और मैँ अपने रस्ते"...

"धत्त तेरे की"...मतलब सारी की सारी कहानी यहीं टांय-टांय फिस्स हो गई"...

"अजी!...ऐसे कैसे फिस्स हो गई?"...

"अभी तो यूँ समझिए कि बस इंटरवैल याने के मध्यांतर हुआ है...असली ट्विस्ट तो कहानी के अंत याने के क्लाईमैक्स में है"...

"ओह!...रियली?"....

"जी"...

"ओ.के....उसके बाद क्या हुआ?"...

"उसके बाद मैँ घर जा के नहाया-धोया और अपने काम पर चला गया"...

"ओ.के"...

"वापिस आने पे देखता हूँ कि बाहर बरामदे में एक ऐंटीक टाईप का मैला-कुचैला पुराना सा सोफा पड़ा है"...

sofa

"ज़रूर आपकी श्रीमति जी ने कबाड़ी को देने के लिए घर से बाहर निकाल के रखा होगा"...

"अजी!...ऐसे-कैसे बाहर निकाल के रखा होगा?"

"मेरे हुक्म के बिना मेरे घर का एक पत्ता भी इधर से उधर नहीं होता है और फिर सोफा तो बहुत बड़ी चीज़ है"...

"ओ.के"...

"मैँने श्रीमति जी से पूछ तो उन्होंने तपाक से जवाब दिया कि तुम्हीं ने तो मँगवाया है...एक सरदार जी आए थे और वही छोड़ कर गए हैँ"...

"मैँ हैरान..परेशान कि मैँने तो किसी से कोई सोफा नहीं मँगवाया है और अगर मँगवाता भी तो ऐसा सड़ा सा...अजीबो-गरीब थोड़े ही मँगवाता?"...

"ओ.के"...

"मैँ हैरान हो बीवी का चेहरा ताक ही रहा था कि उसने कहा कि सरदार जी आपके बारे में पूछ रहे थे कि...

"कब आएँगे?"....

"मैँने कह दिया कि शाम को आएँगे"....

"फिर क्या हुआ?"...

"होना क्या था?...बीवी मुझ पर ही गर्म होती चली गई कि...

पहले तो ऐसा अड़ंगा खरीदना नहीं था और अब अगर खरीद ही लिया तो बेचारे को पेमेंट के लिए चक्कर क्यों कटवाते हो?...सुबह से अगला तीन दफा आ चुका है"...

"ओ.के"...

"मैँ उसे समझा-समझा के थक गया कि मैँने कोई सोफा नहीं खरीदा है लेकिन बीवी मानने को तैयार नहीं....

बोली..."तो क्या ऐसे ही उस बेचारे का दिमाग फिर गया को जो इतने बड़े बवाल को टैम्पो में लाद के तुम्हारे दरवाज़े पे छोड़ गया?"....

"अभी मैँ उससे कुछ कहता कि कि इस से पहले ही ट्रिंग-ट्रिंग कर कॉलबैल अपनी कर्कश ध्वनि के साथ बज उठी"...

"वही होंगे"मेरे कुछ कहने से पहले ही बीवी बोल उठी

"अभी देखता हूँ कि कौन है वो महानुभाव?"कह मैँने जैसे ही दरवाज़ा खोला तो देखता हूँ कि वही पार्क वाले सरदार जी अपनी उसी सौम्य मुस्कान के साथ सामने खड़े थे

"ओह!...

"जी गुप्ता जी!...आप ही की तरह मैँ भी आश्चर्यचकित था"...

"ओ.के"...

"उन्हें ऐसे अचानक अपने दरवाज़े पे खड़ा देख मैँ हड़बड़ा गया और मुँह से बस यही निकला कि..."ओह!...आप"...

"जी"कह उन्होंने मुझे अपने नर्म और कोमल हाथों से मेरे चेहरे को थाम.....मेरे माथे को चूम मुझे गले से लगा लिया"...

"गुड!...वैरी गुड"...

"अजी!...काहे का गुड...वैरी गुड?"...

"क्यों?...क्या हुआ?"...

"दो चुम्मी क्या ले ली?...मुझ से उसके दाम माँगने लगे"...

"क्या?"...

"जी"...

"कितने पैसे माँगे उन्होंने?"...

"पूरे पाँच हज़ार"...

"हे ऊपरवाले!...तेरी इस दुनिया में शरीफ आदमी को कोई आराम से जीने भी देगा या नहीं?"गुप्ता जी ऊपर आसमान में देखते हुए हिस्टीरियाई अन्दाज़ में चिल्लाए...

"जी!...गुप्ता जी...बिलकुल यही ख्यालात मेरे दिमाग में भी आए थे लेकिन भैंस के आगे बीन बजाने से क्या फायदा?"...

"तो फिर क्या तुमने?.....

"इतना पागल समझ रखा है क्या मुझे?"....मैँने भी ईंट का जवाब पत्थर से देने की सोची और उनके चेहरे पे  धड़ाधड़ आठ-दस चुंबन बरसा डाले और चिल्ला कर कहा कि निकाल बाकि के पैसे"...

"गुड!...अच्छा किया"...

"फिर क्या हुआ?"..

"स्साले!...की हालत पतली हो गई...मिमिया कर बोला...

"तू....तू सुबह मुझे पार्क में मिला था"...

"मैँ कोई डरने वाला था?"...झट से सीना तान बोल दिया...

"हाँ!...मिला था"...

"आगे बोल"...

"तो निकाल इसी बात पे पूरे पाँच हज़ार रुपए"अपनी आस्तीन चढा लालपीले होते हुए सरदार जी बोले

do_sardar

"बाप का माल समझ रखा है क्या?"...

"मैँ कहता हूँ सीधे-सीधे दे दे मेरे पैसे"कहते हुए वो मेरी जेब की तरफ झपटे...

"अरे वाह!...बड़ा ही बेशर्म किस्म का इनसान था...तुम्हारे ही पैसों पर अपना हक जताने लगा"....

"जी!....गुप्ता जी"...

"हद हो गई सीनाज़ोरी की"...

"जी"...

"फिर क्या हुआ?"...

"मैँने उसे लाख चलता करने की कोशिश की लेकिन ऐसा ढीठ की जाने का नाम ही नहीं ले रहा था...उलटे मुझे पुलिस बुलाने की धमकी देने लगा"...

"अजीब अहमक आदमी था"...

"कहने लगा कि..."तू....तू सुबह मुझे पार्क में मिला था ना?"...

"मैँ भला क्यों झूठ बोलने लगा?...साफ-साफ कह दिया कि हाँ!...मिला था?"...

"तू!...तू गाना गा रहा था"...

"हाँ!...गा रहा था...कोई शक?"....

"तो निकाल पाँच हज़ार रुपए"...

"अरे वाह!...उसने तो पूरी अन्धेरगर्दी मचा रखी थी....ये कहाँ का इनसाफ है गाना भी तुम गाओ और पैसे भी तुम दो?"...

"गुप्ता जी!...बिलकुल यही बात मैँने उससे भी कही"...

"ओ.के"...

"मेरा इतना कहना था कि वो पागल का बच्चा तो लातों और घूंसों की मुझ पर बरसात करता हुआ मुझ से पिल्ल पड़ गया कि ...स्साले तू गाना गा रहा था कि...

"सोफा कबूल है हमें....सरदार आपका"....

***राजीव तनेजा***

Rajiv Taneja

Delhi(India)

http://hansteraho.blogspot.com

rajivtaneja2004@gmail.com

+919810821361

+919213766753

13 comments:

AlbelaKhatri.com said...

gazab karte ho sarkaaar !
ha ha ha ha ha ha ha ha

अर्शिया अली said...

Ha Ha Haa, Maza aa gayaa.
{ Treasurer-S, T }

सुशील कुमार छौक्कर said...

मजेदार है जी। पर सर जी कोई धमाके दार लिखिए ना।

राजीव तनेजा said...

ई.मेल द्वारा प्राप्त टिप्पणी


from: Yogendra Mani

drymkaushik@gmail.com


वाह राजीव जी मजा आ गया आपका तोहफा पा कर.....!

राजीव तनेजा said...

ई.मेल द्वारा प्राप्त टिप्पणी


from रज़िया मिर्ज़ा raziakbar2429@gmail.com

वाह मज़ा आगया। कह देते घूंसा क़ुबुल है हमें।

राजीव तनेजा said...

ई.मेल द्वारा प्राप्त टिप्पणी

from Anita Kumar
anitakumar3@gmail.com

हा हा हम तो समझे आप की कहानी का सरदार मॉर्डन होगा, ये तो कुछ और ही निकला
अनीता

राजीव तनेजा said...

चैटिंग के दौरान प्राप्त टिप्पणी


मासूम: hahahahaha sofa kabool hai hame sardaar aap ka hahahahahahaha


मासूम शायर: http://masoomshayari.blogspot.com/
Sent at 7:45 PM on Wednesday

राजीव तनेजा said...

ई.मेल द्वारा प्राप्त टिप्पणी


from:RAJEEV THEPRA

bhootnath.r@gmail.com

ha..ha..ha..ha..ha..ha..ha..ha..ha..ha..ha..ha..ha..ha..ha..ha..ha..ha...ha..ha..ha..ha..a..aa.!!!

Shefali Pande said...

प्यार की सोफा तेरा
बना है जीवन मेरा .....

सोफा सोफा सोफा
लाया लाया लाया .....
मज़ा आ गया दास्ताँ ए सोफा पढ़कर

Vijay Kumar Sappatti said...

jai ho gurudev , jai ho gurudev .. maan gaye aapko hum gurudev , is mandi ke daur me bhi aap humko hansaate hai .. aur itni acchio acchi kahaniya padhwaate hai .. bhai mera pranaam sweekar karo .. aur mujh par apne pyaar ka dulaar karo .... jai ho

namaskar.

vijay
http://poemsofvijay.blogspot.com/

अविनाश वाचस्पति said...

सरदार और सोफा

ताली और तोहफा

ऐसे ही बजाते

भिजवाते रहे तो

गाली और साली

गाना और कव्‍वाली
में पहला पुरस्‍कार पाते रहोगे

ऐसे सरदारों को घर के दरवाजे पर पाते रहोगे।

गिरीश"मुकुल" said...

छा गये गुरु

काजल कुमार Kajal Kumar said...

आपका ये तोहफ़ा भी क़बूल है आपका.
हा हा हा

 
Copyright © 2009. हँसते रहो All Rights Reserved. | Post RSS | Comments RSS | Design maintain by: Shah Nawaz