मैँ तो आरती उतारूँ रे

***राजीव तनेजा***

 aarti 

"उफ!...क्या किस्मत है मेरी?"...

"स्साला!...जो कोई भी आता है...बिना जाँचे-परखे ही सीधा ...ठोकता है...बजाता है और अपने रस्ते  चल देता है"...

"क्या हुआ तनेजा जी?"...

"अब क्या बताऊँ जायसवाल जी....जब दिन बुरे चल रहे हों तो ऊँट पे बैठने के बावजूद भी कुत्ता काट लेता है"...

"आखिर हुआ क्या?"...

"होना क्या है?....

"सिर मुडाते ही ओले पड़ गए"...

"फिर भी...पता तो चले"...

"जायसवाल जी!...अपने दिल पे हाथ रख कर आप 'सच का सामना' करते हुए सच-सच बताएँ कि अमूमन एक दिन में हम जानबूझ कर...या फिर अनजाने में कितने पाप कर लेते होंगे?"..

"अब इसका कोई एकुरेट या परफैक्ट आँकड़ा तो उपलब्ध नहीं है  बाज़ार में लेकिन...फिर भी मेरे ख्याल से औसतन दस-बारह....या फिर पन्द्रह-बीस तक तो हो ही जाते होंगे"...

"तो क्या आपका जवाब लॉक किया जाए?"...

"जी...ज़रूर"...

"मेरा मानना है कि हमें अपने द्वारा किए गए पुण्यों और पापों का फल इसी जन्म में मिलता है"...

"जी!...बिलकुल सही कहा आपने".....

"मेरे हिसाब से तो ये अगला जन्म...पुनर्जन्म वगैरा सब बेफिजूल और बेमतलब की बातें हैँ"...

"और मुझे पूरा यकीन है कि इन पापों या बुरे कर्मों के असर को किसी भी कीमत पर खत्म नहीं किया जा सकता"...

"जी!...मेरे ख्यालात भी कुछ-कुछ आपसे मिलते जुलते हैँ"...

"कुछ-कुछ?...पूरे क्यों नहीं?"....

"मेरा मानना भी यही है कि हमें अपने कर्मों का फल इसी जन्म में भुगतना होता है लेकिन अपने प्रयासों द्वारा हम इनके असर को कम या ज़्यादा अवश्य कर सकते हैँ"...

"जी"...

"तो इन पापों या बुरे कर्मों के असर को कम करने के लिए आप क्या करते हैँ?"...

"अब ऐसे तो कुछ खास नहीं करता लेकिन कभी-कभार...हाथ जोड़ ऊपरवाले का नाम अवश्य जप लिया करता हूँ"...

"गुड"...

"लेकिन ये तो बताओ कि आखिर हुआ क्या?"...

"अगर मैँने भी यही सोच के ऐसा ही कुछ करने की सोची तो क्या कोई गुनाह किया?"...

"नहीं!...बिलकुल नहीं"..

"लेकिन तुम्हें ऐसा क्यूँ लग रहा है कि तुमने कुछ गलत या अवांछनीय कार्य किया?"...

"दरअसल हुआ क्या कि आज सुबह मैँ बड़े चाव से ये सोच के 'पार्वती' की खोली से निकला कि अपना आराम से नज़दीक के अमरूद वाले बाग में जाऊँगा और ऊपरवाले का नाम ले...भजन-कीर्तन कर अपने दूषित मन को पवित्र कर...अपने जीवन को सार्थक करूँगा"...

"खोली?...तो क्या आप खोली में रहते हैँ?"...

"अजी!..खोली में रहें मेरे दुश्मन...मैँ भला खोली में क्यों रहने लगा?"...

"तो फिर ये पार्वती?"...

"व्वो!...वो तो दरअसल हमारी नौकरानी है"...

"ओ.के...ओ.के"...

"तो क्या तुम नौकरानी के साथ भी....

"जायसवाल जी!...किस्मत की मारी...बड़ी गरीब है बेचारी"....

"ओह!...

"मैँ म्यूचुअल अण्डरस्टैंडिंग के चलते हफ्ते में एक-आध बार उसकी मदद कर दिया करता हूँ"...

"एक-आध बार क्यों?...रोज़-रोज़ क्यों नहीं?"..

"आप भी कमाल करते हैँ जायसवाल साहब!...रोज़-रोज़ बाहर का खाऊँगा तो हाज़मा खराब नहीं हो जाएगा?....और वैसे भी मेरा छोटा-मोटा...रडीमेड दरवाज़े-खिड़कियों का व्यापार है....कोई मिलें थोड़े ही चल रही हैँ कि मैँ दिन-रात उसी को सपोर्ट करता फिरूँ"...

"हाँ!..पिताजी की तरह अगर मैँ भी किसी सरकारी नौकरी में ऊँचे ओहदे पर विराजमान होता तो ऐसा सोच भी सकता था"...

"लेकिन तुम्हारी बीवी क्या इस सब के लिए ऐतराज़ नहीं करती?"...

"हे...हे...हे...हे....उसे पता चलने दूंगा...तब ना"... 

"तो क्या आजकल वो अपने मायके में?".....

"ज्जी!...बिलकुल सही पहचाना आपने"...

"जायसवाल जी...एक रिकवैस्ट है आपसे...प्लीज़!..किसी से कहिएगा नहीं"...

"अगर उसे इस सब के बारे में तनिक सी भी भनक लग गई तो...मेरी तो वो जान ही निकाल लेगी"...

"राजीव जी!...आपने मुझे इतना पागल समझ रखा है क्या?...जो मैँ ऐसी राज़दार बातें सार्वजनिक करता फिरूँ?"

"यार-दोस्तों को नीचा दिखाने की घटिया फितरत तो अपनी कभी रही ही नहीं"...

"हाँ!...कोई दुश्मन वगैरा हो तो ऐसा सोचा भी जाए"....

"आप बेफिक्र हो...पूरी तरह अपने में मदमस्त रहें और जो चल रहा है...जैसा चल रहा है...उसे बिना किसी बाधा के निर्विध्न रूप से वैसा ही चलने दें"...

"यूँ समझिए कि आपने कहा और मैँने सुना ही नहीं"...

"थैंक यू...जायसवाल जी.....थैंक यू वैरी-वैरी मच...आपने तो बहुत बड़े बोझ से मुझे मुक्ति दिला दी"...

"दोस्त आखिर होते ही किसलिए हैँ?....एक दूसरे के राज़ छुपाने के लिए ही ना?"...

"जी"....

"खैर!...आगे क्या हुआ?"...

"जैसा कि मैँ आपको बता रहा था कि ये सोच के पार्वती की खोली से निकला कि अपना आराम से नज़दीक के अमरूद वाले बाग में जाऊँगा और ऊपरवाले का नाम ले...भजन-कीर्तन कर अपने दूषित मन को पवित्र करूँगा"...

"गुड!...बहुत ही बढिया सोच है तुम्हारी"...

"अजी!...काहे की बढिया सोच?"....

"?...?...?....?...

?...?...?...?....

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"निहायत ही घटिया...बेकार और एकदम वाहियात किस्म की पुट्ठी सोच निकली ये तो"...

"मतलब?"....

"गया था मैँ बाग में कि वहाँ के शांत...पावन एवं पवित्र माहौल में जा के अपनी सुप्त लालसा.... ऊप्स!...सॉरी...आत्मा को झंकृत कर जागृत करूँगा"...

"गुड!...ये तो बड़ी अच्छी बात है"...

"लेकिन वहाँ तो जिस तरफ देखो...वहीं एक दूसरे चिपका-चिपकी कर रहे मस्त जोड़ों की भरमार"...

"छी!...हद हो गई नंगपने और बेशर्मी की...किसी में कोई शर्म औ हया ही नहीं बची आजकल...छी!...छी-छी"...

"क्या बताऊँ जायसवाल जी?....मेरा तो पूरा का पूरा मन ही खराब हो गया"...

"लेकिन इस सब से आपको भला क्या फर्क पड़ना था?...आप खुद भी तो.....

"मेरी बात और है जायसवाल जी...मेरे पास तजुर्बा है....संयम है...सोच है...समझ है...और वे सारे नासमझ...कल के लौण्डे...

"आखिर शालीनता नाम की भी कोई चीज़ होती है कि नहीं?"...

"अपना जो भी करो...पर्दे में करो...छुप-छुप के करो....और आराम से आराम फरमाते हुए करो"...

"कौन रोकता है?"...

"ये क्या कि खुलेआम जफ्फी पाई और लग गए डंके की चोट पे चुम्मा-चाटी करने?"...

"आखिर मैँ भी इनसान हूँ...मेरे भी जज़बात हैँ".....

"आपको उन्हें इग्नोर याने के नज़र अन्दाज़ कर देना चाहिए था"...

"जायसवाल जी!...आपकी बात सौ पर्तिशत जायज़ और सही है लेकिन मैँ कोई पत्थरदिल नहीं कि आस-पास होती हुई हलचलों का मुझ पर कोई असर ना हो"...

"ओह!...लेकिन आपको अपने जज़बातों को उभरने देने के बजाय उन पर कंट्रोल करना चाहिए था"...

"वोही तो किया"...

"गुड!...वैरी गुड"...

"तो फिर क्या आप बिना भजन-कीर्तन किए...खाली हाथ...वापिस लौट गए"...

"इतना बुज़दिल समझ रखा है क्या?"...

"जायसवाल जी!...आपने शायद राजीव को ठीक से पहचाना नहीं है...मैँने एक बार जो ठान लिया सो ठान लिया"...

"अब भजन कीर्तन करना है...तो हर हाल में करना है..भले ही सारी दुनिया...कल की इधर होती आज उधर हो जाए"...

"गुड!...इनसान को और...हैवान को अपने उसूलों का पक्का होना ही चाहिए"...

"जी"....

"फिर क्या हुआ?"...

"फिर क्या?...मैँ बिना इधर-उधर ताके सीधा नाक की सीध में चलता चला गया"...

"गुड"...

"अजी!...काहे का गुड?"...

"तीन बार तो मैँ पेड़ों से टकराते-टकराते बचा"...

"ओह!...ओह मॉय गॉड

"बस!...बहुत हो गया...अब और नहीं"...

"?...?...?...?...

?...?...?...?..

"जायसवाल जी!...मैँ किसी कमज़ोर दिल बन्दे से दोस्ती करने के बजाय चुल्लू भर पानी में डूब मरना पसन्द करूँगा.....आज से मेरा आपका रिश्ता खत्म"...

"?...?...?...?...

?...?...?...?...

"आज से आप अपने रस्ते और मैँ अपने रस्ते....ना आपको मेरे किसी मामले से कोई मतलब होगा और ना ही मुझे आपकी किसी बात से कोई सरोकार"...

"आखिर हुआ क्या है?...कुछ बताओगे भी?"...

"उफ!...मैँ आपको क्या समझा और आप क्या निकले?"...

"मतलब?"...

"आप तो मेरे इन ज़रा-ज़रा से दुखों पर बार-बार ओह...आह....ओह मायी गॉड कर रहे हैँ"...

"तो?"...

"जब आप पहाड़ जैसे दुखों से भरी मेरी धीर-गम्भीर दास्तान सुनेंगे तो आप तो दुमदबाते हुए...तुरंत ही कन्नी काट लेंगे"...

"नहीं!...बिलकुल नहीं"....

"तनेजा जी!...आपको गलतफहमी हुई है....मैँ मंझधार में साथ छोड़ने वालों में से नहीं हूँ"...

"क्या सच?"...

"ये वादा है मेरा आपसे कि...कितने भी...कैसे भी गिरे से गिरे हालात क्यों ना उत्पन्न हो जाएँ...ये जायसवाल! आपका पीछा...ऊप्स..सॉरी!...साथ कभी नहीं छोड़ेगा"...

"जायसवाल जी!...भेड़ियों से भरे इस संसार में कैसे मैँ आपका विश्वास करूं कि मौका पड़ने पर आप मुझे दगा नहीं देंगे?"...

"तनेजा जी!..जब भी आपके जी  में आए...आज़मा के देख लेना"...

"ये!...ये जायसवाल आपके एक  इशारे पे अपनी जान न्योछावर ना कर दे तो कहना"...

"आप!...आप कहें तो अभी के अभी...यहीं के यहीं अपनी इहलीला समाप्त कर के दिखा दूँ?"अपनी गर्दन पकड़ उसे दबाते हुए जायसवाल जी बोले...

"पागल हो गए हो क्या?"....मेरे होते हुए भला तुम क्यों मरने लगे?"...

"कोई अगर मरेगा...तो वो मैँ मरूँगा...तुम नहीं"...

"हे ऊपरवाले!...

हे परवरदिगार!...अपने जिगरी दोस्त के लिए ऐसा सोचने...ऐसे अपशब्द बोलने से पहले मेरी ये कलमुँही ज़ुबान कट के क्यों ना गिर गई?"मैँ अपनी ज़बान पकड़...उसे बाहर खींचता हुआ बोला...

"क्या तनेजा जी!...आप भी...इतनी ज़रा सी...मामूली सी बात को दिल पे लगा बैठे हैँ"...

"दोस्ती में ये सब तो चलता रहता है"...

"लेकिन...

"मायूस मत होइए...और आगे बताइए कि उसके बाद क्या हुआ?"..

"ओ.के.."मैँ अपनी नम आँखों को रुमाल से पोंछते हुए बोला

"जैसा कि मैँ बता रहा था कि तीन बार मैँ पेड़ों से टकराते-टकराते बचा...

"जी"...

"लेकिन बगल में खड़े झाड़-झंखाड़ से बच ना पाया"...

"ओह!...तो क्या चेहरे पे ये सूजन और ये खरोंचे उसी झाड़-झंखाड़ में गिरने की निशानी हैँ?"..

"जी नहीं जायसवाल जी!...वहाँ तो मेरा बाल भी बांका ना हुआ...वो कहते है ना कि ...जाको राखे साईयाँ...मार सकै ना कोय

"जी!...एक पुरानी फिल्म का गाना भी तो है....

जिसका कोई नहीं...उसका तो खुदा है यारो"...

"ये मेरा सौभाग्य था कि मेरे वहाँ गिरने से पहले ...एक जोड़ा वहाँ ऑलरैडी गिरा हुआ था और हाय!...मर गया....हाय!...मर गया कर दहाड़ें मार रोता हुआ....ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा था"...

"चिल्ला रहा था?".....

"मतलब!...लड़की कुछ भी...किसी भी किस्म की हाय-तौबा नहीं कर रही थी?"...

"कर क्यों नहीं रही थी?...वो बेचारी तो बस धीमे-धीमे...हौले-हौले से ऑह!...ऊह..आऊच्च....

ऑह!...ऊह..आऊच्च  का  नारा बुलन्द कर मदद के लिए पुकार रही थी"...

"गुड!...यही तो खास बात होती है लड़कियों में...ज़्यादा चूँ-चपड़ नहीं करती...शर्म उनका गहना जो होती है"... 

"जी!...लेकिन वो लड़का तो अव्वल नम्बर का बेशर्म और बेहया इनसान  निकला"...

"वो कैसे?"...

"मेरे गिरते ही हाय!...मर गया....हाय!...मर गया  का इस्तकबाल करना छोड़....

वो पागल का बच्चा अपनी तमाम तकलीफें और सदाचारिता भूल ...सीधा प्वाईंट पे याने के...

तेरी माँ की...तेरी भैण की....तेरे प्यो की....पे आ गया"...

"बाप रे!...फिर तो बड़ा हॉरिबल सीन होगा वो तो"...

"अजी!...हॉरिबल्ल तो तब हुआ होता जब वो मेरा चेहरा देख पाता"...

"तो क्या?"...

"जी!...इससे पहले कि वो मेरा चेहरा देख पाता...मैँने दुम दबाई और बिना आव और ताव देखे ...गिरता पड़ता सीधा नौ दो ग्यारह हो लिया"...

"गुड!...तो इसका मतलब ये चोटें उसी भागमभाग का नतीजा हैँ"...

"जी नहीं"...

"तो फिर?"...

"सच बताऊँ तो डर के मारे मेरी जान ही निकली जा रही थी....इसीलिए तो मैँ वहाँ से दुम दबा कर भाग लिया था"...

"ओ.के"...

"लेकिन मेरा ज़मीर मुझे वापिस बाग में खींच लाया"..

"गुड!...अच्छा किया जो तुमने उनसे माफी माँग ली"...

"कमाल करते हैँ आप भी....मैँ भला क्यों माफी माँगने लगा?"...

"माफी माँगे मेरे वो दुश्मन जो मुझ से पहले उस झाड़ी में गिरे पड़े थे"...

"तो फिर?"...

"भजन-कीर्तन के प्रति मेरा ज़ुनून मुझे वापिस बाग में लौटा लाया"...

"ओह!...

"जाते ही सबसे पहले मैँने बाग में एक सुनसान और बियाबान कोना ढूँढा कि यहाँ कोई मुझे डिस्टर्ब नहीं करेगा"...

"लेकिन तुमने सुनसान और बियाबान कोना ही क्यों ढूँढा?"...

"अन्दर ही अन्दर मैँ महसूस कर रहा था कि आज मेरा मन पूरी तरह से भक्तिभाव में रम नहीं रहा है"...

"ओ.के"...

"मुझे डर था कि इधर-उधर की ताका-झाँकी के चक्कर में मैँ कहीं अपने पथ...अपने रस्ते से भटक ना जाऊँ कहीं"...

"तो इसी चक्कर में तुमने सुनसान कोना चुना?"...

"जी"...

"गुड!...अच्छा किया"....

"अजी!...क्या खाक अच्छा किया?"...

"ओफ्फो!...अब क्या हो गया तुम्हारे साथ?"...

"मैँ पेड़ के नीचे खड़े हो...आँखे बन्द कर...अपने में मग्न हो...श्रधा भाव से मस्त होता हुआ 'संतोषी माता' की आरती गाने लगा...

123

"मैँ तो आरती उतारूँ रे...जै-जै...संतोषी...

"खबरदार!...जो तूने 'आरती' उतारी...मुझ से बुरा कोई ना होगा"...की तेज़ आवाज़ सुन के मैँ चौंक उठा

?...?...?..?..

?....?...?..

"देखा तो सामने रिष्ट-पुष्ट डील-डौल लिए एक लम्बा-चौड़ा...तगड़ा सा ...पहलवान टाईप आदमी अपनी मूँछों को ताव देते हुए मेरे सामने डट कर खड़ा है"...

"ओह!...फिर क्या हुआ?"...

"मैँ कौन सा डरने वाला था?"....

"साफ-साफ खुले शब्दों में पूछ लिया कि...."क्यों भाई!...'आरती' पे तेरा कॉपीराईट है क्या?"...

"व्वो मेरी...

"हाँ-हाँ!...अगर है तो...दिखा"...

"न्नहीं!...वो तो नहीं है मेरे पास"वो हड़बड़ाता हुआ सा बोला...

"उसके स्वर में असमंजस देख मैँ भी चौड़ा हो गया कि मैँ तो उतारूँगा...ज़रूर उतारूँगा 'आरती'"...

"कर ले तुझे जो करना हो"...

"देख!...मैँ कहे देता हूँ....तू बिलकुल नहीं उतारेगा"...

"अरे!...जा-जा...तेरे जैसे छत्तीस आए और छत्तीस चले गए"....

"अभी देख!...मैँ तेरे सामने कैसे आरती उतारता हूँ...देख...

santoshi mata

"मैँ तो आरती उतारूँ रे...जै-जै...संतोषी...

 

"देख!...मुझे गुस्सा ना दिला....आराम से...शांति से मान जा...और 'आरती' मत उतार"....

"मैँ तो उतार के रहूँगा"...

"प्लीज़ यार!...समझा कर"....

"हुँह!...

उसके स्वर में मिमियाहट देख मैँने उसके ऊपर हावी होने की सोची और उसका माखौल उड़ा...शायरी झाड़ते हुए बोला...

"मुझे आरती उतारने से रोक सके...ये तुझ में दम नहीं...तू हम से है...हम तुम से नहीं"...

"गुड!...दुश्मन बेशक जितना मर्ज़ी ताकतवर हो...लेकिन ज़रा सा भी...तनिक सा भी कमज़ोर दिखे...तुरंत उस पे हावी हो जाना चाहिए"...

"जी!...लेकिन मेरे इतना कहते ही पता नहीं उस पागल के बच्चे को जैसे मिर्गी का दौरा पड़ गया हो.....हाँफते-हाँफते...ताबड़तोड़ मुझ पर ऐसे घूँसे बरसाने लगा मानों मैँ कोई जीता-जागता इनसान ना हो कर कोई पंचिंग बैग होऊँ"...

"ओह!...मॉय गॉड...ये तो बहुत बुरा हुआ"....

"आखिर कोई तो वजह रही होगी जो वो इस कदर हिंसा पर उतर आया"...

"जी!....उस वक्त तो मैँ बेहोश हो गया था...होश में आने के बाद लोगों से पता चला कि उसकी बेटी का नाम 'आरती' है और वो उस समय उसी पेड़ के ऊपर चढ कर अमरूद चोरी कर रही थी"...

"क्या?"...

***राजीव तनेजा***

Rajiv Taneja

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10 comments:

'अदा' said...

ha ha ha ha ha
baap re...
to aap aarti ko ped se neeche utarne ke liye santoshi mata ka ahwaan kar rahe the....
soch samajh kar kaam kiya kijiye Rajeev ji aisa hi raha to.....
bahut hi badhiya raha...main abhi tak apni hansi nahi rok paayi hun...
ha ha ha ha ha

अजय कुमार झा said...

एक ही पोस्ट में बहुतों को लपेट दिया आपने राजीव जी....और हाँ किसने कहा की सरकारी नौकरी में माल दबा रहता है ..चलिए आप मेरी नौकरी में आ जाइए ..और मैं बिजनेस संभाल लेता हूँ आपका...मगर ये आरती नहीं हो पायेगी मुझसे ...

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बहुत सुंदर. घाराप्रवाह.

AlbelaKhatri.com said...

ha ha ha ha ha ha ha
waah bhai waah taneja ji..........
achhi aarti utaarne chale !
badhaai !

रज़िया "राज़" said...

क्या आरती उतारने चले आप राजीव जी। यहां तो हँस हंस के आसुं बहने लगे है। सब आसपास के कलिग्ज़ पुछ रहे है कि क्या हुआ अचानक! क्या याद आ गया? हमें भी तो बताओ।

अविनाश वाचस्पति said...

अमरूद से आरती को उतारने चले
अपनी आरती उतर गई
वो भी घूंसों से
अब सोच समझ कर
गाया करना आरती
वैसे बत्‍तीसी बची ????

Shefali Pande said...

आरती को इस तरह उतारा नहीं करते ....
अमरुद तोड़ने ही तो चढी थी ,किसी का दिल तोड़ने तो नहीं ना ...जो भी हो हंसते हंसते बेदम हो गए हम

योगेन्द्र मौदगिल said...

बढ़िया लेकिन कुछ ज्यादा लंबा...

श्रद्धा जैन said...

hahahaha baap re aarti uski bitiya ka naam tha
aap bhi kaha se kaha tak soch ke ghode dorate hain
maan gaye

Suman said...

nice

 
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