रिपोर्ट ब्लॉगर महासम्मेलन की-कुछ अनजाने...अनछुए पहलू

***राजीव तनेजा***

2009_09120056

साहित्य शिल्पी के वार्षिकोत्सव और ब्लॉगर स्नेह महासम्मेलन को लेकर मैँ शुरू से ही उत्साहित था ही लेकिन जैसे ही मुझे फोन पर राजीव रंजन जी से निर्देश मिला कि..."आपको मुख्य अतिथि 'श्री प्रेम जनमेजय जी' को अपने साथ लेकर फरीदाबाद आना है और नियत समय याने के साढे दस बजे तक सहीसलामत आ जाना है"...तो साहब!...मेरा दिल तो बल्लियों उछल पड़ा(अब यहाँ ये बात मैँ अपने सभी ब्लॉगर साथियों से बिलकुल साफ कर देना चाहूँगा कि बेशक!...मैँ एक व्यापारी सही लेकिन हर समय पैसे को लेकर...उसी के पीछे भागना मेरी फितरत नहीं...मेरी आदत नहीं।ये सच है कि मेरा काम रैडीमेड दरवाज़े एवं खिड़कियों का है लेकिन यकीन मानिए जनाब कि उस वक्त मैँ अपने काम-धन्धे के बारे में सोचने के बजाए पूरी तरह से साहित्यिक मूड में रमा हुआ ...किसी नई कहानी को लिखने का आईडिया सोच रहा था।अब आप सोचेंगे कि ये राजीव बात को कहाँ कि कहाँ ले जा रहा है?.. लेकिन मेरा विश्वास कीजिए...कि ना चाहते हुए भी ये सब मुझे मजबूरन आपको बताना पड़ रहा है कि कहीं आप मुझे पैसे का पीर समझ कर अपने दिल में ये भ्रम ना पाल बैठे कि ये राजीव का बच्चा तो ज़रूर अपने गोदाम पर पड़े हुए बल्लियों के ढेर के ऊपर खड़ा हो कर कोई उल्टी-सीधी तिकड़म भिड़ा रहा होगा या फिर बेफाल्तू में...बेमतलब का गुणा-भाग लगा रहा होगा।..इसलिए!...रंजन जी का फोन आते ये उन्हीं टेढी-मेढी बल्लियों पर उछल कर गिर पड़ा होगा।खैर!..आप जो चाहे सोचते रहें लेकिन मेरा दिल तो ये सोच के बाग-बाग हुए जा रहा था कि इतने बड़े और जाने-माने व्यंग्यकार के सानिध्य में कुछ समय बिताने का मौका मिलेगा।दिन भर इसी के ख्याल आते रहे कि उनसे ये बात करूँगा और वो बात भी करूँगा....उनसे ये भी सीखूँगा और वो भी सीखूँगा।

प्रसिद्ध हास्य कवि श्री बागी चाचा जी अपने पड़ौस में ही रहते हैँ तो सोचा कि क्यों ना उन्हें भी साथ ले लिया जाए।बस!..दिमाग में ख्याल आते ही झट से उन्हें फोन मिलाया कि..."कल आप क्या कर रहे हैँ?"...जवाब मिला कि..."फ्री हूँ"...

'फ्री' सुनते ही मेरी तो बाँछे खिल पड़ी कि इतना बड़ा कवि 'फ्री' में मिल रहा है...अब तो अपने ब्लॉगर सम्मेलन की हो जाएगी बल्ले-बल्ले।खैर!...बिना अपनी खुशी का इज़हार करते हुए मैँने उन्हें बताया कि ..."ऐसे-ऐसे फरीदाबाद में साहित्य शिल्पी का वार्षिकोत्सव है और साथ ही साथ ब्लॉगरस मीट भी...आपको चलना है"....फिर मुझे थोड़ा सा संशय हुआ कि 'मीट' से वो कहीं मुझ बाल ब्रह्मचारी को...ऊप्स!...सॉरी 'शाकाहारी' को...माँसाहारी समझने की भूल ना कर लें तो मैँने उन्हें फिर से बताया कि ब्लॉगरस की मीटिंग है"...मेरा प्रेम भरा आग्रह वो टाल ना सके और उन्होंने साथ चलने की हामी भर दी।उनके साथ सुबह 9.00 बजय का समय तय हुआ।

फिर क्या जनाब?...अब तो मेरा मन ना लिखने में लग रहा था और ना ही पढने में...आँखें बन्द करूँ तो मुझे प्रेम जन्मेय जी दिखाई दें और आँखें खोलूँ तो राजीव रंजन जी माईक हाथ में लिए साक्षात सामने बतियाते नज़र आएँ...सच कहूँ तो एक आध बार योगेश समदर्शी जी भी अपनी ओजपूर्ण वाणी में कविता पाठ करते दिखाई दिए।अब क्या बताऊँ?..और कैसे बताऊँ जनाब आपको कि रात भर मैँ कैसे करवटें बदलता रहा....रोज़ाना सपनों में बिना नागा आने वाली श्रूपनखाएँ...ऊप्स!..सॉरी अप्सराएँ भी आज ना जाने कहाँ गायब थी?...उनकी जगह पर रह-रह कर मुझे नुक्कड़ पर खड़े अविनाश वाचस्पति जी और चँदन तिलक लगा कर चौखट से कमर टिकाए  पवन जी दिखाई दे रहे थे। अजय झा जी और मोहिन्दर जी भी कई नए-पुराने ब्लॉगर मित्रों के साथ अपनी हाजरी दर्ज करा रहे थे।प्रेम जन्मेजय जी के भी ख्याल भी बीच-बीच में आते रहे...कभी वो मुझ से हाथ मिला रहे थे तो कभी मैँ उनसे...कभी वो मुझे गले लगा रहे थे ...तो कभी मैँ उनको।

खैर!...उनसे बतियाते-बतियाते कब आँख लग गई...पता ही ना चला।सुबह जब आँख खुली तो देखा कि आस-पास कोई नहीं था।श्रीमति जी को आवाज़ लगाई तो वो चाय की प्याली हाथ में लिए अपनी मोहिनी मुस्कान के साथ हाज़िर हुई और कहने लगी कि..."क्या बात?...आज आप नींद में भी बड़े खुश नज़र आ रहे थे?"...मैँ जाने क्या सोचता हुआ बस मुस्कुरा कर रह गया।घड़ी में टाईम देखा तो साढे सात बज चुके थे ...अपनी रोज़ाना की आदत के मुताबिक चाय पीते-पीते मैँ अपनी मेल वगैरा चैक करने लगा और उसके बाद नवभारत टाईम्स की साईट से मुख्य खबरों को पढने के बाद नुक्कड़ से होता हुआ साहित्य शिल्पी की साईट पर जा पहुँचा।इस सब देखा-दाखी में आधा घंटा बीत गया।उसके तैयार होने में जुट गया...इस बीच श्रीमति जी मम्मी-पापा व बच्चों के लिए नाश्ता वगैरा तैयार करने में व्यस्त रही।मेरे तैयार होने के बाद वो भी जल्दी से तैयार हुई और हम चल पड़े बागी चाचा जी को रास्ते से ही पिक करना था...इसलिए उन्हें पहले से ही फोन कर दिया था कि हम निकल रहे हैँ..आप बाहर...मेन सड़क पर आ जाईए। ये बारिश के खुशनुमा मौसम का असर था या फिर प्रेम जन्मेजय जी का प्रताप  कि हमेशा सीधे-साधे कपड़ों में रहने वाले बागी चाचा  जी भी आज चटख रंग की फुल बाज़ू वाली आकर्षक कमीज़ पहने हुए नज़र आ रहे थे।उनको ले के हम अपनी कार में 'सी.एन.जी' भरवाते हुए प्रेम जन्मेजय जी के घर की तरफ चल पड़े।रास्ते से ही उनको फोन कर दिया था कि हम आ रहे हैँ...आप तैयार रहिए"...
पश्चिम विहार स्तिथ 'साक्षर अपार्टमैंट' के मेन गेट पर पहुँच कर उन्हें फोन किया कि हम बाहर खड़े हैँ...आप आ जाईए"...दो-तीन मिनट के इंतज़ार के बाद वो हमें आते दिखाई दिए।

हल्की-फुल्की ... बून्दा-बान्दी के बीच एक-दूसरे का अभिवादन कर हम वहाँ से फरीदाबाद के लिए चल पड़े।मैँ अभी सोच ही रहा था कि बात कहाँ से और कैसे शुरू करूँ? कि प्रेम जन्मेजय जी और बागी चाचा जी अपनी बातों में मश्गूल हो गए।वो एक-दूसरे को पहले से जानते थे।जन्मेजय जी कवि सम्मेलनों के दौरान मँचों पर पढी जाने वाली कविताऑं के गिरते स्तर को लेकर चिंतित थे।हास्य के नाम पर मँचों से की जाने वाली अश्लील चुहलबाज़ियाँ उनकी समझ से परे थी।...उनका कहना था कि अगर आप किसी सामाजिक बुराई के खिलाफ हैँ...तो आपको डंके की चोट पर उसका खुल कर विरोध करना चाहिए।उनका कहना था कि साहित्यिक स्तर के कवियों को चाहिए कि वो पैसे का लालच ना करते हुए ऐसे मसखरे टाईप विदूषकों का पुरजोर विरोध करें और उनके साथ किसी भी कीमत पर मँच को साझा ना करें।इस पर बागी चाचा जी ने अपनी व्यवसायिक मजबूरियाँ बताते हुए कहा कि..."ऐसा करना सँभव नहीं है...उन्हें वही सुनाना पड़ता है जो आयोजक और पब्लिक चाहती है"...

बात तो उनकी भी सही लगी कि हम चाहे जितना मर्ज़ी बढिया लिख लें...अगर कोई उसको सुननेवाला ही नहीं होगा तो हमारा लिखना बेकार है।हर कलाकार अपनी मेहनत का प्रतिफल चाहता है...वाहावाही चाहता है...और फिर खाली वाहावाही से भी तो पेट नहीं भरता।उनके इस वार्तालाप के बीच  अपुन ने तो अपने मुँह पे ताला लगा लेना ही बेहतर समझा क्योंकि अपना तरीका तो जन्मेजय जी के बिलकुल उलट याने के हलके-फुलके अन्दाज़ में लोगों को हँसा-हँसा के पत्थर मारने का है कि चोट...दर्द...तकलीफ सब कुछ महसूस हो लेकिन बाहर से दिखाई ना दे।अब प्रेम जी जैसे कई लोग ऐलोपैथी के जरिए सीधा इंजैक्शन ठोंक के बिमारी ठीक करना चाहते हैँ तो बागी चाचा और मेरे जैसे कई लोग होम्योपैथी की मीठी गोलियाँ के जरिए व्याधियों को दूर करना चाहते हैँ।खैर!...जो भी हो...मकसद और ध्येय तो सबका का एक ही है और एक ही होना भी चाहिए।ऊपरवाले तक पहुँचने का कोई रास्ता 'राम' के जरिए जाता है तो कोई रहीम के जरिए भी जाता है।

इस सारे वार्तालाप के बीच हम नारायणा में लगे जाम को पार कर निर्धारित स्थल याने के ओल्ड फरीदाबाद के सैक्टर सत्रह में स्तिथ मॉड्रन स्कूल पहुँचे तो देखा ही राजीव रंजन जी बाहर खड़े हमारी ही बाट जोह रहे हैँ।हाथ मिलाने की आपसी अभिवादन की रस्म पूरी होने के बाद वो हमें मीटिंग स्थल पर ले गए।इस बीच शोभा महेन्द्रू जी के निर्देश पर छोटे-छोटे...प्यारे-प्यारे बच्चों द्वारा हमारे माथे पे तिलक लगा कर किया गया स्वागत हमें अभिभूत कर गया।

उसके बाद का हाल तो बाकी ब्लॉगरों द्वारा लिखी गई पोस्टों के जरिए आप सभी प्रबुद्ध जनों को पता चल ही चुका है...इसलिए उसे फिर से बताने की मेरे ख्याल से कोई आवश्यकता नहीं है।अत: उस हिस्से को स्किप कर के मैँ आपको अपनी वापसी यात्रा के बारे में संक्षेप में बताने की कोशिश करता हूँ।

इस ब्लॉगर स्नेह महासम्मेलन में पानीपत के जाने-माने कवि श्री योगेन्द्र मौदगिल जी भी आए हुए थे।वापिस चलते समय मैँने उन्हें कहा कि हम आपको दिल्ली बॉय-पास पे छोड़ देंगे....वहाँ से आपको पानीपत के लिए बस आसानी से मिल जाएगी...वो राज़ी हो गए।...सबसे विदा लेने के बाद हम अपनी नगरी याने के दिल्ली की तरफ चल पड़े...शाम का वक्त होने के कारण सड़कों पर सुबह की अपेक्षा भीड़ बढ चुकी थी...कई जगह थोड़ा-थोड़ा जाम लगा हुआ था....उससे किसी तरह निबटते-निबटते हम आखिरकार नारायणा के महा जाम में फँस गए।...इस बीच शायद दिन भर की थकान की वजह से मेरी श्रीमति जी समेत बागी चाचा जी और योगेन्द्र मौद्गिल जी थोड़ी-थोड़ी देर के लिए ऊँघते रहे।जाम से निकलने-निकलने में ही पैंतीस से चालीस मिनट ज़ाया हो गए।...लगभग 6.00 के आस-पास हम जन्मेजय जी के अपार्टमैंट पहुँचे....वहाँ उन्हें छोड़ कर हम शालीमार बाग की तरफ चल पड़े।अरे यार!...वहीं पर तो बागी चाचा जी और मैँ(इकलौती पत्नि और बच्चों समेत) रहता हूँ। बागी चाचा जी  को छोड़ते-छोड़ते 6.30 के करीब बज चुके थे।इस बीच रस्ते में मैँ योगेन्द्र मौदगिल जी को बस के बजाय ट्रेन से जाने की सलाह दे चुका था क्योंकि आज़ादपुर का रेलवे स्टेशन शालीमार बाग के साथ ही लगता है..जिसका मेरी श्रीमति जी ने पुरज़ोर विरोध किया क्योंकि उनका अपना तर्क था कि ट्रेन के टाईम का पक्का पता नहीं है ...इसलिए कोई फायदा नहीं लेकिन पुराना खिलाड़ी(पुराना डेली पैसैंजर) होने के नाते मुझे पक्का पता था कि एक ट्रेन  6.40 मिनट पर आती है ...तो सोचा कि कोशिश कर लेते हैँ...शायद ट्रेन मिल जाए।इसमें हर्ज़ भी क्या था?.....और वैसे भी तो कोशिशें अक्सर कामयाब हो जाया करती हैँ।

श्रीमति जी को घर के सामने वाली गली में छोड़ कर हम रेलवे स्टेशन की तरफ चल पड़े।...वहाँ पहुँचने पर देखा कि ट्रेन अभी आई नहीं है।मैँने मौद्गिल जी से कहा कि...चलो अच्छा है कि ट्रेन अभी आई नहीं है....मैँ फटाफट टिकट ले के आता हूँ..आप मुझे सीढियों के पास मिलिए".. उनको छोड़ कर मैँने जल्दी से पटरियाँ पार की और टिकट स्थल की तरफ बढ चला।अभी आधा रास्ता ही पहुँचा था कि पीछे से सॉयरन की तेज़ आवाज़ सुनाई दी।पलट के देखा तो ट्रेन आ रही थी।अब भाग कर टिकट खरीदना और उसे फिर योगेन्द्र जी तक पहुँचाना मुझे नामुमकिन सा प्रतीत हुआ।मैँने वहीं से मौद्गिल जी को इशारा कर आवाज़ लगाई कि आप  बेफिक्र हो कर ट्रेन पर चढ जाएँ...भारतीय रेल है....बहुतेरे बिना टिकट मिल जाएँगे लेकिन देश का सच्चा नागरिक होने के नाते योगेन्द्र जी नहीं माने....और उन्होंने बिना टिकट जाने के बजाए दूसरी ट्रेन का इंतज़ार करना बेहतर समझा।

खैर!...ट्रेन के जाने के बाद मैँने अगली ग़ाड़ी का समय पता किया तो पता चला कि वो आधे घंटे के बाद आएगी।अब इसे संयोग कहें या फिर मेरी किस्मत कि मुझे देश के इतने बड़े और सुप्रसिद्ध हास्य कवि को देखने का...सुनने का...उनसे रुबरू बात करने का मौका मिल रहा था।मैँ खुशी-खुशी टिकट ले कर उनके पास पहुँचा।फिर बातों ही बातों में पता ही नहीं चला कि कब वो आधा घंटा भी बीत गया और ट्रेन आ गई।उनको ट्रेन में चढा ...उनसे विदा लेता हुआ मैँ आज घटित हुई घटनाओं के बारे में सोचता हुआ अपनी कार की तरफ बढ चला।

स्टेशन पे खड़े-खड़े जब हम बातें कर रहे थे तो बातों ही बातों में उन्होंने बताया कि सुबह वो ट्रेन के द्वारा ही पानीपत से फरीदाबाद गए थे....और अब उन्हें जो ट्रेन मिलनी थी वो भी फरीदाबाद से ही आ रही थी।वो चाहते तो वहीं फरीदाबाद से ही ट्रेन पकड़ सकते थे लेकिन शायद ये संयोग था या फिर हम दोनों की किस्मत कि इस तरह हमारा मिलना लिखा था।

***राजीव तनेजा***

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Rajiv Taneja

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20 comments:

खुशदीप सहगल said...

काश राजीव जी, वापसी में हम भी आप के साथ हो लिए होते, योगेन्द्र भाई के साथ इतनी देर बतियाने का मौका हमें भी मौका मिल जाता...वैसे क्या किस्मत पाई है आपने जो आपको डॉ प्रेम जनमेजय जी, बागी चाचा और योगेंद्र भाई जैसी विभूतियों का सारथी बनने का मौका मिला...बेहतरीन रिपोर्ट देने के लिए आभार...अ्ब किसी दिन आपके साथ बैठकर घंटे-दो घंटे हंसने-हंसाने का मौका मिले, उसी दिन का इंतजार....वैसे एक राज़ की बात बताऊं, मैं भी बिजनेस फैमिली से ताल्लुक रखता हूं,,,वो तो वक्त ने गालिब निकम्मा...सॉरी पत्रकार बना दिया...

योगेन्द्र मौदगिल said...

नहीं किसी का जोर तो, नहीं किसी का योग.
बनते अपने आप ही, गजब सुधि-संयोग..

वाह..! तनेजा-दम्पति, सुखद रहा ये साथ.
पुनः मिलेंगें फिर कभी, ले हाथों में हाथ..

अपनेपन की कल्पना, खूब हुई साकार.
भूल न पाऊंगा कभी, आप सभी का प्यार..

ब्लागर सब मिलते रहें, जुड़ते रहें विचार.
यही कामना 'मौदगिल', अब तो मेरे यार..
--योगेन्द्र मौदगिल

बी एस पाबला said...

बढ़िया!
एक संतुलित, अनौपचारिक रिपोर्ट।
ऐसा लगा, जैसे मैं आपके साथ ही हूँ।

बी एस पाबला

साहित्य-शिल्पी said...

राजीव जी साहित्य शिल्पी को आपका सहयोग हमेशा से ही मिलता रहा है और आप इस मंच के प्रमुख व्यंग्य रचनाकारों में भी हैं। लेकिन दायित्य तो "मुख्य" ही था आपके पास और कार्यक्रम के "मुख्य अतिथि" आपके साथ ही आ रहे थे। आपको धन्यवाद कहना आपके हमत्व के योगदान को कमतर करना होगा।

बहुत रोचक रिपोर्ट है और मंचेतर बातों को बहुत अच्छी तरह प्रस्तुत किया है आपनें। हार्दिक शुभकामनायें।

-राजीव रंजन प्रसाद

Murari Pareek said...

खुश नसीब हो की बुधी जीवों का सानिध्य प्राप्त हुआ | राजीव जी, गोदाम से ब्लोगर सम्मलेन तक आपकी यत्रा मंगल माय और मनोरंजक हो |

विनोद कुमार पांडेय said...

Behatreen..bahut badhiya aur ek ek step varnan kiya aapne..

padh kar achcha laga..aapki kavita bhi bahut ruchikar thi...

sab ke liye ek sath badhayi swikaare..

अविनाश वाचस्पति said...

काश ... ऐसे सपने हमें भी आएं
पर जगते हुए ...

अजित वडनेरकर said...

बहुत बढ़िया रिपोर्ट। कल झा साहब की रिपोर्ट को सराहा था, आज इसे।

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

अच्छी रपट है. लग रहा है कि आप पर ब्लॉगेरिया का पूरा प्रकोप हो चुका है. :-) वैसे रास्ते में आप लोगों ने जो महत्वपूर्ण बातें कीं, उन पर केन्द्रित करके सम्मेलन में भी एक सत्र रख सकते थे.

अजय कुमार झा said...

वाह राजीव भाई...सचमुच ही अनछुए पहलू...थे ...इनसे तो अब आपने ही रुबरू करवाया है...दिल्ली में होने वाले सम्मेलन के लिये भी तैयारी कर लिजीये..भाभी जी से कहिये कि रेलवे की समय सारणी ...मंगवा लें...

Anil Pusadkar said...

बढिया रिपोर्ट्।

राज भाटिय़ा said...

चलिये मेरा काम हो गया, अब दरवाजे बल्लिया खरीदनी होगी तो आप के पास ही आयेगे, पहले भाव तोल आम बन कर करेगे... फ़िर अपना परिचाय दे कर ब्लांग्र की कमीशन अलग से :)आप ने बहुत सुंदर शव्दो मे यह लेख लिखा मजा आ गया, रिपोर्ट पढ कर ऎसा महसुस हुआ जेसे हम भी वही है, कब दिल्ली मै हो रहा है अगला सम्मेलन जरुर लिखे
धन्यवाद

राजीव तनेजा said...

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from shefaliii.pande
pande.shefali@gmail.com

राजीव जी ...आपने तो एकदम लाइव प्रसारण करवा दिया .... इतने सारे अनछुए पहलुओं को सामने लाने का आपको धन्यवाद ...

राजीव तनेजा said...

ई-मेल द्वारा प्राप्त टिप्पणी


from RAJEEV THEPRA
bhootnath.r@gmail.com

Re: रिपोर्ट ब्लॉगर महासम्मेलन की-कुछ अनजाने...अनछुए पहलू


hooo....hoooo......hoooo....hoooo.......haa...haa.....haa.......haa.....haaa.......haa........kisi ne bhoot ko nahin dekha bilagaron ke beechh......vo to vahin roshandaan men baithaa thaa.....are nahin nahin.....naach rahaa thaa......!!!!

राजीव तनेजा said...

ई-मेल द्वारा प्राप्त टिप्पणी

from ramesh chandra soni

rcsoni184@gmail.com
Re: रिपोर्ट ब्लॉगर महासम्मेलन की-कुछ अनजाने...अनछुए पहलू

Anjane...Anchuai pahluo ko padkar achcha laga.Bhasha ka vyangatmak
prayog antarman ko aanandit kar gaya. Badhai & shubhkamnaye

rcsoni

अविनाश वाचस्पति said...

मानस के मोती पर प्राप्‍त ई मेल संदेश :-
Rajiv Ji
aapke blog par apki post padhkar shanivar ki subah phir taza ho gaee, aapne bahut hi khoobsoorat andaz men woh sub kuch byaan kiya hai jo us din car men ghat gaya, naiN to soch raha tha ki aap car chala rahe hain par aap to car aur dimaag donon chala rahe the. aapka ek baar punah aabhar aur yeh aabhaar adhoora rah jayega yadi main aapko subah subah chay pilani apki patni tak mera aabhaar dene ke liye na kahun
janmejai
Dr. Prem Janmejai

योगेश समदर्शी said...

बहुत अच्छी रिपोर्ट है. और अलग हट कर रूप और विस्तार. पत्रकारों को इस्से सीखन चाहिये कि एक ही कर्यक्रम को कितने तरह से लिखा जा सकता है. बलोगरों के इस जमघट के बाद कुछ ब्लोगरों को न केवल वहां जाने का अवसर मिला बल्कि उन्हें इस ब्लोगर मीट पर कई दिन तक लिखने की सामग्री भी नसीब हो गई. क्यों. रही बात आपकी शैली की वह तो काबिले तारीफ है ही. मुझे आपकी रिपोर्ट पढ कर अच्छा लगना ही था क्योंकि मैं आपके ख्वाबों में जो आया था.. खैर आपके ख्वाबों मे हम जैसे मुस्टंडे आते है... यह बात भाभी जी को सुकुन देगी.. खैर्... आपकी उम्दा रिपोर्ट के लिये आपको एक बार फिर बधाई...

अरविन्द चतुर्वेदी Arvind Chaturvedi said...

वाह वाह राजीव जी,क्या विवरण है. आंखों देखा और दिल से महसूसा ,की बोर्ड से सीधे निकल कर मन तक को भिगो गया.

Kirtish Bhatt, Cartoonist said...

Bahut hi rochak Reporting. acchhhi laga aapka andaz rajeevji.

मोहिन्दर कुमार said...

इतनी बढिया रिपोर्ट के लिये आभार. राजीव जी ने सही कहा है कि सिर्फ़ धन्यवाद दे कर आपके रोल को हल्का नहीं किया जा सकता. भविष्य में भी आपसे इसी प्रेम व सहयोग की कामना है.

 
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