मिले लट्ठ मेरा तुम्हारा...तो सर फटे हमारा

***राजीव तनेजा***

lathmar2

“ठक्क- ठक्क”….

“ठक्क……ठक्क- ठक्क”….

“आ जाओ भाई…आ जाओ…यहाँ तो खुला दरबार है…कोई भी आ जाओ"…

“नमस्कार!…गुप्ता जी….कहिये अब तबियत कैसी है आपकी?”…

“मेरी तबियत को क्या हुआ है?”…

“मुसद्दीलाल के मुंह से उड़ती-उड़ती खबर सुनी थी कि जब से आप उस ब्लॉगर मीटिंग से होकर आए हैं….तभी से पेट पकड़ कर संडास में बैठे हुए हैं…किसी को अंदर ही नहीं आने दे रहे"…

“अभी आपको आने दिया ना?”…

“आने तो दिया लेकिन कितनी मुश्किलों…कितनी दुश्वारियों के बाद?…कम से कम बीस दफा कुण्डी खड़काई होगी मैंने …मेरा हाथ तक दुखने लगा है”….

“हाथ तो मेरा भी बहुत….खैर छोडिए इस बात को…कहिये…कैसे याद किया?”…

“कैसे याद किया से मतलब?…आपसे ऐसे ही मिलने नहीं आ सकता?”…

“लेकिन फिर भी…ऐसे अचानक…बेवक्त टपकने का कोई औचित्य…कोई मकसद तो ज़रूर होगा"..

“सब मेरी ही गलती है….सब मेरी ही बेवकूफी है…मैं ही पागल था जो आपका पेट खराब होने की बात का पता चलते ही अपने सभी गैरज़रूरी काम छोड़ ..नंगे पाँव…आपकी खिदमत में दौड़ा चला आया"…

“ऐसी कौन सी आग लग गई थी मेरे पेट में जो तुम फायरब्रिगेड बन उसे बुझाने चले आए?…ज़रा से जुलाब ही तो लगे थे?”…

“ज़रा से?…हद हो गई अब तो लापरवाही की भी ….पिछले तीन दिन से आप टायलेट से बाहर नहीं निकले हैं और आप इसे ज़रा से जुलाब कह रहे हैं?…ज़रा से?”…

“तुम्हें कैसे पता चला?”…

“क्या?”…

“यही कि पिछले तीन दिनों से मैं टायलेट से बाहर नहीं निकला हूँ"…

“इसमें पता लगने की क्या बात है? …ये तो पूरे जग-जहाँ को मालुम है"…

“पंजाब केसरी में खबर छपी थी क्या?”गुप्ता जी का उत्सुक चेहरा ..

“इस बारे में तो मुझे कुछ नहीं पता लेकिन इतना ज़रूर पता है कि पिछले तीन दिनों से आप लगातार अपना चाय-नाश्ता वगैरा…सब अन्दर ही मँगवा रहे हैं"...

"ओह!…लेकिन ये तो अन्दर की बात थी...बाहर कैसे आ गई?"...

“मुझे क्या पता?”…

“हम्म!…इसका मतलब किसी घर के भेदी ने ही लंका ढाह दी है"…

“लेकिन ऐसा मरदूद भला कौन हो सकता है जिसे आपके घर की…आपकी हरकतों की पल-पल की खबर रहती हो?”…

“घर की नहीं…सिर्फ टायलेट की…वहीँ की चिटखनी तो टूटी हुई है ना?"…

“ओह!…तो इसका मतलब…मैं ऐसे ही पागलों की तरह …आप पहले नहीं बता सकते थे क्या?”मैं क्रोधित सा होता हुआ बोला …

“कैसे बताता?…किस मुंह से बताता कि हिंदी के इतने बड़े ब्लॉगर के गुसलखाने की सिटखनी टूटी हुई है?"…

“अब भी तो उसी मुंह से बता रहे हैं ना?…कम से कम बाहर एक तख्ती ही लटकवा देते कि…

“सावधान!…चिटखनी टूटी हुई है…अपने रिस्क व जोखिम पर पूरे होशोहवास में प्रवेश करें"…

“ताकि सबके सामने अपना जलूस निकलवा लूँ?”…

“जलूस तो अब भी आपका निकलना ही है गुप्ता जी…मैं आपको इतनी आसानी से बक्शने वाला नहीं"…

“अगर ऐसी ही बात है तो फिर यहाँ…मेरे साथ…मेरे टायलेट में क्या कर रहे हो?…दफा हो जाओ यहाँ से"…

“मुझे भी आपके साथ यहाँ...इस खुशबूदार माहौल में बैठ के बेकार की गुफ्तगू करने का कोई शौक नहीं है"…

“तो फिर जाओ ना…जाते क्यूँ नहीं?”…

“हाँ-हाँ!…जा रहा हूँ मैं…लेकिन याद रखना तुम्हारी एक-एक पोलपट्टी खोल के ना रख दी पूरे ब्लॉगजगत के सामने तो मेरा भी नाम ‘खुमार बुलबुला’ नहीं"…

“ओह!…माय गाड...ये म्मै…मैं क्या कह गया?”…

“हम्म!…तो इसका मतलब तुम्हीं वो सड़ान्ध मारते पानी का बदनुमा सा बुलबुला हो जो ज़लज़ला बन पूरे ब्लोग्जत में ‘लैला'(नया तूफ़ान) के नाम से सुनामी का कहर बरपा रहा है"...

“न्नहीं!..…नहीं तो"…

“ठीक है!…तो फिर जाओ…खोल दो मेरी पोलपट्टी पूरे ब्लॉगजगत में…तुम्हारा वहाँ बेसब्री से इंतज़ार हो रहा होगा"…

“म्मै …मैं तो बस ऐसे ही मजाक कर रहा था”…

“झूठ!…बिलकुल झूठ"…

“नहीं!…सच्ची…कसम से"…

“ठीक है!…तो फिर खाओ!….काणे कुत्ते की कसम"…

“काले कुत्ते की कसम"...

"काले कुत्ते की नहीं...काणे कुत्ते की कसम"...

"काणे कुत्ते की कसम...मैं तो बस ऐसे ही...ज़रा सा मजाक कर रहा था"..

“हम्म!...

"प्लीज़!...ये बात किसी से कहिएगा नहीं"...

"अरे-अरे!…घबराओ मत…अगर तुम ‘खुमार बुलबुला’ हो तो मैं भी किसी ‘गपोड़शंख’ से कम नहीं"…

“ओह!…माय गाड...तो इसका मतलब आप वही फेमस ‘गपोड़शंख’ है जिनकी टिप्पणियाँ पढ़-पढ़ के अच्छे-भले गुर्दे वाले ब्लोग्गरों का भी जी मिचलाने लगता है?”…

“आफकोर्स!…मेरे अलावा और कौन हो सकता है?”…

“ठीक है!...ओ.के..बाय...मैं चलता हूँ”…

“क्या हुआ?”…

“कुछ नहीं…बस ऐसे ही…जी मिचला रहा है थोड़ा सा"…

“अरे!…अरे भाई…ज़रा आराम से …क्या गज़ब करते हो?…ऐसे…अचानक…तैश में आ के बाहर निकलोगे तो ब्लॉगजगत के लोग-बाग क्या सोचेंगे?”..

“क्या सोचेंगे?”…

“यही कि तनेजा और गुप्ता में छतीस का आंकड़ा है"…

“ओह!…

“लो...ये क्लोरमिंट की गोली लो और आराम से वहाँ कोने में ऊंकड़ूँ  हो के बैठ जाओ...आराम मिलेगा"...

“जी!…शुक्रिया"….

"इसमें शुक्रिया की क्या बात है?..आप मेरे मेहमान हैं…इस नाते मेरा धर्मं बनता है कि मैं हर संभव तरीके से आपकी सेवा-स्रुषा करूँ"…

“अरे वाह!...ये तो कमाल का जुगाड बताया आपने...सारी की सारी मिचलाहट एक मिनट में ही हवा हो गई"...

"और नहीं तो क्या?...पिछले तीन दिन का प्रैक्टिकल तजुर्बा है मुझे"...

"क्लोरमिंट चबाने का?"..

"नहीं!...ऊंकड़ूँ बैठ भैंस के माफिक जुगाली करने का"...

"ओह!…

"वैसे सच में ऊंकड़ूँ बैठ के क्लोरमिंट चबाने में कितना मज़ा आता है ना?”…

“बहुत"…

"आप थोड़ा साईड में हो जाएंगे…प्लीज़"…

“क्यों?…क्या हुआ?”…

“कुछ खास नहीं…बस ऐसे ही…..ऊंकड़ूँ बैठे-बैठे पाँव ज़रा सा सो गया है शायद"...

“ओह!…पहलेपहल मेरे साथ भी यही दिक्कत हो रही थी लेकिन लेकिन अब ठीक है"...

"तुम एक काम करो"...

"क्या?"..

"यहाँ आ के मुझ से सट के बैठ जाओ..आराम मिलेगा"...

“लेकिन वहाँ तो पहले से ही जगह काफी तंग है"…

“जगह पे मत जाईए तनेजा जी…दिल पे जाईए…दिल में जगह होनी चाहिए”….

“जी!…

“जगह का क्या है?..आज तंग है तो कल को खुल भी जाएगी"…

“जी!…बिलकुल...शुक्रिया"मैं उनके साथ सट के बैठ जाता हूँ...

“अब ठीक लग रहा है"…

“जी!..लेकिन क्या आपको यहाँ थोड़ी सफोकेशन सी महसूस नहीं हो रही?”..

“थोड़ी क्या?…काफी महसूस हो रही है ….अब एक की जगह दो-दो एडजस्ट हो जाएंगे तो…..सफोकेशन तो अपने आप होनी ही है"…

“जी"…

“ठीक है!…तो फिर चलिए…बाहर निकल के आराम से बैठते हैं"…

"जी!...

"लेट मी फिनिश दा जॉब”…

“ओ.के"मैं दरवाज़ा खोल बाहर निकल जाता हूँ …

(कुछ देर बाद फ्लश चलने की आवाज़ के साथ दरवाज़ा खुलता है)

“हाँ!…तो मैं क्या कह रहा था?”…

“सफोकेशन"…

“वो तो अब बची कहाँ है?…बाहर निकलते ही छूमंतर हो गई"…

“जी!…यही फर्क होता है अंदर का और बाहर का"…

“जी"…

“अब बताएँ कि तबियत कैसी है आपकी?”…

“पहले तो ऊपरवाले के फज़ल से ज़रा परेशानी में फंस गया था लेकिन अब भगवान की दया से काफी आराम है"…

“शुक्र है उस खुदा…उस नेक परवरदिगार का कि आप ठीक हो रहे हैं”…

“जी"..

“लेकिन ये सब हुआ कैसे?”…

“होनी को शायद यही मंज़ूर था...उसके आगे भला किसकी चली है?"...

"कहीं ये उसी पागल के बच्चे की शरारत तो नहीं थी आपको परेशान करने की?”..

“अरे!...नहीं यार…उसमें भला इतना दम कहाँ कि वो मुझसे पंगे ले सके?...ये तो उलटा मेरी ही शरारत थी उससे पंगा ले उसे  सरे बाजार नंगा करने की"...

"लेकिन यहाँ तो उसी दिन से आप नंगे हुए पड़े हैं"...

"हाँ!...यार...बात तो तुम सही ही कह रहे हो...खेल तो मैंने खूब सोच समझ के एकदम बढ़िया से खेला था लेकिन वो कहते हैं ना कि हर वक्त सितारे आपके फेवर में नहीं होते"..

"जी"...

"बस!...यही हुआ मेरे साथ...एन वक्त पे बाज़ी पलट गई"...

"ओह!...आप मुझे शुरू से बताएँ कि आखिर...हुआ क्या था?"...

"एक मिनट!...पहले मैं ज़रा ये हाथ धो लूँ...काफी देर हो गई है टायलेट से बाहर निकले हुए"...

"जी!...ज़रूर"...

(हाथ धोने के बाद)

"हाँ!...तो मैं बता रहा था कि कैसे रातोंरात बाज़ी पलट गई"...

"रातोंरात?"..

"जी"...

"लेकिन ब्लॉगर मीट तो दिन में हुई थी ना?"....

"जी"....

"तो फिर बाज़ी रात को कैसे पलट सकती है?"...

"ओह!...माय मिस्टेक...मुझे कहना चाहिए था कि…कैसे दिन ही दिन में बाज़ी पलट गई?"...

"जी"...

"थैंक्स...

"किसलिए?"...

"गलती की तरफ ध्यान दिलाने के लिए"...

"प्लीज़!..डोंट मैन्शन इट ...ये तो मेरा फ़र्ज़ था"..

"कभी मुझे भी यही मर्ज़ था"...

"ओह!...आप मुझे शुरू से सारी बात बताइए कि कैसे?..कहाँ से ये सब शुरू हुआ था?"...

"उसने और मैंने अपना ब्लॉग्गिंग कैरियर एक साथ...एक ही महीने में शुरू किया था"..

"ओ.के"...

"संयोग देखिये मेरी और उसकी…दोनों की पहली पोस्ट का विषय भी एक ही था और  टाईटल भी लगभग एक जैसा ही था"…

“लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है?…दो अलग-अलग व्यक्तियों की अलहदा सोच एक जैसी?…नामुमकिन"..

“अरे!…इस दुनिया में नामुमकिन कुछ भी नहीं है"…

“लेकिन दो पोस्ट एक जैसी?…कैसे?”…

“जहाँ से मैंने कॉपी मारी…वहीँ से उसने भी कॉपी मारी…सिम्पल”…

“ओह!…

"अब पता नहीं ये संयोग कैसे बना कि उसकी और मेरी सोच...विचारधारा…आदतें काफी हद तक एक दूसरे से मिलनी शुरू हो गई थी"....

"ओ.के"...

"जल्द ही हम दोनों में इतनी अधिक गाढ़ी छनने लग गई कि जिस दिन हम एक-दूसरे को देख ना लें या बात ना कर लें...चैन ही नहीं पड़ता था"...

"ओ.के"...

"रातों को हम अक्सर हमबिस्तर भी होने लगे थे"...

"क्क्या?”…

"अरे!…नहीं यार.....वो मतलब नहीं है मेरा"...

"तो?"..मेरा शंकित स्वर

"दरअसल!…क्या था कि हम दोनों के घर एक-दूसरे के आमने-सामने थे"...

"तो?...इसका ये मतलब तो नहीं हो जाता ना कि आप सारी हदें...सारी सीमाएं लांघ के अनैतिक कृत्यों पर उतर आएं? "...

"अरे!…नहीं यार...पहले पूरी बात तो सुनो"...

"हाँ!...बोलो...क्या कहना चाहते हो"मेरे स्वर में तल्खी आ चुकी थी ...

"हमारे यहाँ रात को अक्सर लाईट चली जाया करती थी"...

"तो?...उसी का फायदा उठा कर आप दोनों...

"अरे यार!...बार-बार बात को उसी एंगल की तरफ क्यों मोड़ रहे हो?"..

"मैं कहाँ मोड़ रहा हूँ?...आप खुद ही तो अभी कह रहे थे कि....हम दोनों अक्सर हमबिस्तर होने लगे थे"...

"तो क्या हुआ?....दो भाई क्या एक ही बिस्तर में नहीं सो सकते?"...

"आपके घर में बिस्तरों की कमी पड़ गई थी या उसके यहाँ पर उनका अकाल पड़ा हुआ था?”…

"ना ही मेरे घर में बिस्तरों की कोई कमी थी और ना ही उसके घर में बिस्तरों का अकाल पड़ा हुआ था"...

"तो फिर क्या ज़रूरत पड़ गई थी आपको उसके साथ हमबिस्तर होने की?”….

"अरे!…उसके घर में इन्वर्टर लगा हुआ था...इसलिए लाईट के चले जाने पर मैं उसी के साथ सो जाया करता था"...

"उसी के बिस्तर में?"...

"और नहीं तो क्या उसकी फूफ्फी के बिस्तर में?"..

"ओ.के!...तो पहले से ही ऐसे बात क्लीयर कर के चलना चाहिए था ना"...

"अब क्या हो गया है?”…

“फिर क्या हुआ?"मैं गुप्ता जी की बात को नज़रंदाज़ करता हुआ बोला..

"होना क्या था?...वक्त के साथ-साथ हमारी दोस्ती इतनी पक्की...इतनी गहरी होती चली गई कि लोगों को हमारी किस्मत से रश्क होने लगा"...

"ओह!...मेरे स्वर में चिंता का पुट था

"जलन के मारे उन्होंने हमें एक दूसरे के खिलाफ लाख भड़काने की कोशिश की लेकिन किसी की दाल ना गली...गले तो तब ना जब हमारे बीच आपस में किसी किस्म का कोई मतभेद हो"...

"जी!...

"वो मुझसे और मैं उससे दिल खोल के सारी बातें बतला लिया करता था"...

"ओ.के!…फिर क्या हुआ?"...

"वही जो होनी को मंज़ूर था"...

"क्या?"..

"हम दोनों की दोस्ती को ज़माने की नज़र लग गई"…

"लेकिन कैसे?"...

"तुम तो जानते ही हो कि औरत मेरी सबसे बड़ी कमजोरी है"....

"जी!...ये तो मोहल्ले का बच्चा-बच्चा जानता है"…

"लोगों ने उसी का फायदा उठा हम दोनों को अलग करवा दिया"...

"तो क्या किसी गर्लफ्रेंड वगैरा का कोई चक्कर?”…

“नहीं!…इस मामले में वो अपने उसूलों का बड़ा ही पक्का था”….

“गुड"…

“कभी भी उसने अपनी गर्लफ्रेंड को मेरे धोरे(करीब) नहीं लगने दिया…शायद!…डरता था कि कहीं मैं उसका तिया-पांचा ना कर दूँ"…

“ओह!…तो फिर कैसे?”…

"एक दिन अचानक मैंने नोटिस किया कि उसके ब्लॉग पे महिलाओं की आवाजाही बढ़ गई है"..

"ओह!…दैट्स स्ट्रेंज”…

"पक्का &^%$#$%^  था स्साला….उसने अपने ब्लॉग को कम्युनिटी ब्लॉग बना कर तीन-चार को अपने जाल में फांस लिया था"...

"फांस लिया था?...मतलब?"...

"तीर-चार महिला ब्लोगरों को पता नहीं कैसे पटा अपने ब्लॉग पे लिखने के लिए राज़ी कर लिया"...

"तो?”….

"उन्हीं के नेतृत्व में पता नहीं कैसी आंधी चली और उसका रेंगता हुआ ब्लॉग एकदम धमाके से ऐसे चल निकला...ऐसे चल निकला मानों टी.आर.पी की बाढ़ ही  आ गई हो जैसे"...

"ओह!...

"एक तरफ उसके ब्लॉग पे दर्ज़नों के हिसाब से महिलाएं रोजाना बिना किसी नागे के टिपियाने लगी दूसरी तरफ मेरी ओछी हरकतों को देख मेरे ब्लॉग की तरफ रुख करना किसी एक को भी गवारा नहीं था"...

"ओह!...आपको उसे मिल-बाँट कर खाने के लिए राज़ी कर लेना चाहिए था"…

"मैंने उसे भैंस समझ कर उसके आगे खूब बीन बजाई…खूब बीन बजाई कि मेरे लाख ना चाहने के बावजूद मेरा तानपुरा टूट ही गया"…

“आपको पूरा यकीन है कि आपने बीन ही बजाई थी…कुछ और नहीं?”..मेरा शंकित स्वर

“बिलकुल!…पूरा यकीन है"…

तो फिर आपका तानपुरा कैसे टूट गया"मेरे स्वर में असमंजस था

मैं तानपुरे पे बैठ के बीन बजा रहा था ना"…

ओह!…फिर क्या हुआ?”…

“किसी तरह अपने तानपुरे के बेवक्त टूट जाने के गम से बाहर निकल मैंने उसे बड़े प्यार से…खुद के बड़े होने का हवाला देते हुए चिरौरी कर समझाया भी कि इस तरह अकेले-अकेले सारी मलाई चट कर जाना ठीक नहीं लेकिन उसे अक्ल आए तब ना"...

"कहने लगा कि….

“सब किस्मत की बात है...फिलहाल तो मेरी बारी है"...

"ओह!..फिर क्या हुआ?”..

“ना चाहते हुए भी पता नहीं कैसे अचानक मेरे मुंह से निकल गया कि…

“हाँ!...सब किस्मत की बात है...कुत्ता चाट रहा तरकारी है"..

"ओह!...

"मेरी ये कड़वी बात वो एक पल के लिए भी सहन ना कर सका और और तुरंत ही आगबबूला हो उठकर पता नहीं कहाँ चला गया"...

"ओह!...

"बस....तब से वो दिन है और आज का दिन है...वो मेरी और मैं उसकी काट किए बिना रह नहीं पाता हूँ"...

"लेकिन अभी उसी ब्लॉगर मीट की किसी रिपोर्ट में मैंने एक फोटो देखी थी जिसमें आप दोनों एक-दूसरे से हंस-हंस के बतिया रहे थे"...

"अरे!...तुम नहीं समझोगे...दिखावे के लिए ये सब ड्रामा करना पड़ता है"...

"लेकिन किसलिए?...जब पता है कि वो आपकी काट करता है तो ऐसे घटिया आदमी को किसलिए मुंह लगाना?"...

“बात तुम्हारी बिलकुल सही है बंधू मेरे लेकिन करना पड़ता है…ना चाहते हुए तिल-तिल कर मरना पड़ता है"…

“हम्म!..

“अब तो यूँ समझ लो कि मेरा और उसका पिछले जन्म से चल रहा कोई छत्तीस का आंकड़ा है लेकिन बाहर जब हम एक-दूसरे से किसी पब्लिक प्लेस में मिलते हैं तो दिखावे के लिए ऐसे गलबहियां डाल के मिलते हैं मानो हम से तगड़ा कोई दूसरा लंगोटिया यार हो ही नहीं सकता इस पूरी दुनिया में"…

“ओह!…

“अभी हफ्ता भर पहले जब ब्लोगजगत में ये खबर फैली कि वो फलाने-फलाने दिन…फलाने-फलाने रेस्टोरेंट में ब्लॉगर मीट रखवा रहा है तो मेरे तो पूरे तन-बदन में आग लग गई"..

“गुड!…इसे कहते हैं अंदरूनी भभक"…

फिर क्या हुआ?”…

“पहले तो सोचा कि जा के पूरे रेस्टोरेंट को ही उस दिन के लिए..उससे पहले ही अपने नाम से बुक करवा उसे नाकों चने चबवा दूँ”…

“नॉट ऐ बैड आईडिया"…

“लेकिन फिर बाद में सोचा कि पैसे के दम पे अगर किसी का खेल बिगाड़ा तो क्या बिगाड़ा?”…

“गुड!…वैरी गुड…ये आपने अच्छा सोचा"…

फिर क्या हुआ?”…

“मैंने खूब दिमाग लगा के सोचना शुरू किया और अंत में थक-हार के इस नतीजे पे पहुंचा कि क्यों ना कुछ ऐसा किया जाए कि साँप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे"…

“गुड!…वैरी गुड"…

“ब्लॉगर मीट से एक दिन पहले ही मैं बाजार से जुलाब की गोलियों का पूरा पैकेट खरीद के ले आया कि …ले बेट्टे!…अब तुझे बताऊंगा कि कैसे दी जाती है दावत?…कैसे खिलाए जाते हैं मेहमानों को पकवान?”…

“ओह!…लेकिन आपके अलावा किसी और का पेट खराब हुआ हो…ऐसी तो मैंने कोई खबर नहीं सुनी"..…

“हाँ!…इसी बात का तो अफ़सोस है मुझे कि मेरे अलावा सभी मौज ले रहे हैं"…

“लेकिन कैसे?..आपने तो पूरे खाने में ही मिलाया था ना जुलाब?”…

“नहीं!…इसका तो मुझे मौका ही कहाँ मिल पाया?”..

“क्या मतलब?”…

“भीड़ ही इतनी थी कि….

“जब कोई काम आपके बस का ही नहीं होता है तो उसे पूरा करने का बीड़ा ही क्यों उठाते हैं आप?”…

“किसने कहा तुमें कि मेरे बस का नहीं था?…अरे!…अगर बस का नहीं होता तो मैं वहाँ जाता ही नहीं…गोलियों का पैकेट खरीदता ही नहीं”…

“तो फिर आप बिना कुछ किए…..हाथ मलते…खाली हाथ वापिस कैसे लौट आए?”…

“तो क्या अपने क्रोध की आंच में निर्दोष लोगों को जल जाने देता?…मेरी दुश्मनी उससे और उसके तमाम ब्लॉगर साथियों से है ना कि आम मासूम जनता से?”….

“तो क्या किसी भंडारे या लंगर में वो सबको जीमवा रहा था?”…

“यही समझ लो"…

“क्या मतलब?”…

“पट्ठे ने बफेट सिस्टम वाले रेस्टोरेंट को चुना था”…

“तो?…इससे आपको क्या फर्क पड़ता है?…वो किसी भी सिस्टम वाले रेस्टोरेंट में खाना खिलए…यही बहुत बड़ी बात है कि उसने खिलाया तो सही वर्ना आजकल के ज़माने में तो पैसे खर्च करने के नाम पर सब एक-दूसरे की बगलें झाँकने लगते है कि कौन बिल्ली के गले में घंटी बांधे?”…

“बात तो तुम्हारी सही है…इस बात की तो मैं भी तारीफ़ करूँगा कि उसने एक नहीं…दो-दो बार अपने पल्ले से पैसे खर्च कर सबको मौज करवाई है लेकिन प्लीज़…मेरी इस बात को ऑफ दा रिकार्ड ही रखना"…

“वो किसलिए?”…

“दुश्मन है वो मेरा…मैं कैसे और किस मुंह से उसकी तारीफ़ कर सकता हू?”…

“हम्म!…फिर क्या हुआ?”..

“होना क्या था?…बफेट सिस्टम में हम ब्लागरों के अलावा और भी जो रेस्टोरेंट के नियमित ग्राहक थे…वो भी खाना का रहे थे"…

“तो?”…

“उन्हें कैसे अपने क्रोध की आंच में मुर्ग-मुसल्लम बन जाने देता?”..

“ओह!…तो इसका मतलब किसी और को बलि का बकरा ना बनने देने के चक्कर में जनाब का दिल पसीज गया और गुस्से के मारे सारी की सारी गोलियाँ खुद ही निगल ली?”…

“पागल हो गए हो क्या?…उसमें से एक-एक गोली खुद अपने दम पे अच्छे से अच्छे का पेट फाड़ उसे दोखज दिखाने का सामर्थ्य  रखती है और तुम बात कर रहे हो पूरी शीशी निगलने की?”…

“तो फिर आपकी ये मरियल कुत्ते जैसी हालत कैसे हो गई?”…

“सब मेरी ही बेवाकूफी है"…

“लेकिन अभी तो आप कह रहे थे कि आपने एक भी गोली….

“तो?…क्या सिर्फ गोली खाने से ही दस्त लग सकते हैं?…ज्यादा खाने से नहीं?”…

“मैं कुछ समझा नहीं"…

“पट्ठे ने इतने स्वादिष्ट खाने का इंतजाम करवाया था कि मुझसे रहा ना गया और पेट में जगह ना होने के बावजूद उसे ज़बरदस्ती ठूसता गया… ठूसता गया”…

“ओह!…अब क्या सोचा है आपने?”…

“बदला तो मुझे लेना है और हर हाल में लेना है"…

“लेकिन कैसे?”…

“तुम एक काम करो"…

“क्या?”…

“मैं ज़रा फिर से टायलेट जा रहा हूँ”…

“क्यों?…क्या हुआ?”..

“कुछ खास नहीं…बस ये सुसरा…मरोड़ का बच्चा फिर से सर उठाने लगा है"…

“तो?”..

“तुम ज़रा ये सामने वाले कमरे से मेरा लैपटाप उठा के मुझे टायलेट में दे दो"…

“किसलिए?”…

“वहीँ से किसी की पोस्ट पे कमेन्ट दाग देता हूँ कि ….उसने अपनी उस तथाकथित ब्लॉगर मीट में सबसे पैसे लिए थे"…

“तो?…साँप के निगल जाने के बाद लाठी भांजने से क्या फायदा?”…

“लोग थू-थू तो करेंगे"..

“लेकिन अगर उन्होंने उसके बजाय आपके मुंह पर ही थूकना शुरू कर दिया तो?”..

“अरे!…ऐसे-कैसे थूकना शुरू कर देंगे?…मैं कौन सा अपने नाम से टिप्पणी करने वाला हूँ?…बेनामी से करूँगा"…

“ओह!…लेकिन वो खुद तो समझ ही जाएगा कि ये सब आपका किया-धरा है"…

“तो समझने दो…ज्यादा से ज्यादा क्या होगा?…छिप-छिपाते चल रही लड़ाई खुल के सामने आ जाएगी"…

“इसी का तो डर है"…

“लेकिन मुझे किसी का डर नहीं…मैं तो इस सब के लिए पूरी तरह से तैयार बैठा हूँ…मानसिक रूप से भी और शारीरिक रूप से भी"…

“ओह!…

“मैंने तो अपनी अगली पोस्ट का टाईटल भी सोच लिया है"…

“क्या?”…

“मिले लट्ठा मेरा तुम्हारा…तो सर फटे हमारा"…

“आमीन…

***राजीव तनेजा***

Rajiv Taneja

Delhi(India)

rajivtaneja2004@gmail.com

http://hansteraho.blogspot.com

+919810821361

+919213766753

+919136159706

27 comments:

सुलभ § सतरंगी said...

ये गुप्ता जी और आप!

क्या खूब टाइटल है... :) :)

kunwarji's said...

"काणे कुत्ते की कसम......."

मस्त वाली बात है जी......

कुंवर जी,

M VERMA said...

घबराओ मत…अगर तुम ‘खुमार बुलबुला’ हो तो मैं भी किसी ‘गपोड़शंख’ से कम नहीं"…
किसका नाम ले लिया राजीव जी
जी मिचलाने लगा

राज भाटिय़ा said...

‘गपोड़शंख’ की कमल खाते, क्यो बेचारे काण्णॆ कुत्ते का नाश कर दिया, उस बेचारे ने क्या बिगाडा था...
‘गपोड़शंख’??? वेसे यह है कोन??
आप का महान लेख पढ कर ग्याण के चक्षु खुल गये. प्रणाम आप को

AlbelaKhatri.com said...

वाकई !

आज तो खूब हँसाया आपने...........

कमाल कर दिया भाई...आज इस पोस्ट को दो बार पढना पड़ा...........

हा हा हा

अब मैं भी वहीँ जा रहा हूँ..........

योगेन्द्र मौदगिल said...

albela g ko 2 baar me samajh aai mujhe to 4 baar me aaegi or kaiyon ko 61-62 baar me....
jai ho..

डॉ टी एस दराल said...

हा हा हा ! तनेजा जी , इतनी लम्बी पोस्ट क्यों लिख डाली । ये तो टाइटल ही एक मजेदार पोस्ट है।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

पढी, अच्छी भी लगी। पर लगा जैसे में कोई तीस साल पहले की रचना पढ़ रहा हूँ। सही तो ये है कि अब लम्बी रचनाओं का जमाना गया। लोग थोड़े में अधिक जानना और मनोरंजन चाहते हैं। आप थोड़े में लोगों को विनोद परोस सकते हैं तो इतना लंबा क्यों?

परमजीत सिँह बाली said...

रोचक पोस्ट है....बातों बातों मे लगता है किसी पर व्यंग्य कसा जा रहा है.....बहुत अच्छा लिखा है....बधाई।

masoomshayer said...

aap kee lekhanee sashakt hotee aa haree hai bahut khoob

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...

वाह तनेजा जी क़माल कर दिया बहुत बेहतरीन पोस्ट अभी भी हस रहा हूँ ,, लाजबाब ,,,
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

हरि शर्मा said...

खूब लपेटा है अनामी जलजले ढपोरशन्ख को
उसे २ दिन बाद समझ मे आयेगी
पोस्ट बाकई बहुत लम्बी हो गई, पर का करे. ई तो भैया तुम्हारी वो का कहे स्टाइल का मामला है.

विनोद कुमार पांडेय said...

Gupta ji ki halat patali ho gai...rajiv ji jitani tareef kare aapki kam hai har lyne me hansi aa jati hai..hansate raho ko dher si badhai aapko bhi..

महफूज़ अली said...

गजब.... बाँध कर रखना तो कोई आपसे सीखे.... बहुत शानदार व्यंग्य....

दीपक 'मशाल' said...

हा.. हा.. हा.. पहले तो मैं पहली पंक्ति ही 'मिले सुर...' की स्टाइल में गुनगुनाता रहा. पूरा पढ़ कर हंस-हंस कर हाल बुरा था.. बहुत जबरदस्त..

Udan Tashtari said...

हा हा! वैसे हँसने वाली बात नहीं है. :)


मिले लट्ठा मेरा तुम्हारा…तो सर फटे हमारा

honesty project democracy said...

अच्छी और उम्दा रोचक प्रस्तुती / राजीव जी आज हमें आपसे सहयोग की अपेक्षा है और हम चाहते हैं की इंसानियत की मुहीम में आप भी अपना योगदान दें / पढ़ें इस पोस्ट को और हर संभव अपनी तरफ से प्रयास करें ------ http://honestyprojectrealdemocracy.blogspot.com/2010/05/blog-post_20.html

Kumar Jaljala said...

असली मीनाकुमारी की रचनाएं अवश्य बांचे
फिल्म अभिनेत्री मीनाकुमारी बहुत अच्छा लिखती थी. कभी आपको वक्त लगे तो असली मीनाकुमारी की शायरी अवश्य बांचे. इधर इन दिनों जो कचरा परोसा जा रहा है उससे थोड़ी राहत मिलगी. मीनाकुमारी की शायरी नामक किताब को गुलजार ने संपादित किया है और इसके कई संस्करण निकल चुके हैं.

SKT said...

sheershak ne mazedar hone ki asha jagai, post ne bkhoobi nibhaai. Aapko badhai!

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

सही किया बन्दे ने....:)

girish pankaj said...

aap ek achchhe haasykaar ke roop mey samane aa rahe hain. badhai. aise hi hansaate rahen, aur vyangya bhi karate rahen/ shabdon ke rachanatmak latth chalaate rahe...

शेफाली पाण्डे said...

bhai sheershak par to poore sau batta sau.....sunaamiyon kee khabar lene ke liye dhanyvaad...

बी एस पाबला said...

हँसते रहे...मुस्कुराते रहे...खिलखिलाते रहे

बढ़िया कटाक्ष है, आनंद आ गया
ब्लॉगर मीट ऐसे ही हो जाती है क्या?

बी एस पाबला

pratibha said...

बढ़िया व्यंग्य है....पढ़कर मज़ा आ गया।

महेन्द्र मिश्र said...

कहीं ब्लागर मीट के बाद संडास में बैठे बैठे मिन्टास सरकाते रहे हों ...हा... हा.. आनंद गया भाई .

arganikbhagyoday said...

achchha hai ji dil bahl gaya
arganikbhagyoday.blogspot.com

gaurav pant said...

kya huwaaaaaa

 
Copyright © 2009. हँसते रहो All Rights Reserved. | Post RSS | Comments RSS | Design maintain by: Shah Nawaz