ना कम ना ज्यादा…पूरे चौदह साल- राजीव तनेजा

ram-sita

आज वक़्त नहीं था मेरे पास…सुबह से ही इधर-उधर भागता फिर रहा था मैं…सारे काम मुझे ही तो संभालने थे| मेहमानों का जमघट लग चुका था|उन्हीं की खातिरदारी में ही फंसा हुआ था|खूब रौनक-मेला लगा था...बच्चे उछल कूद रहे थे|मैँ कभी टैंट वाले को तो कभी हलवाई को फोन घुमाए चला जा रहा था|
"स्साले!…पता नहीं कहाँ मर गये सब के सब?"…
कम्भखत जब से फ्री इनकमिंग का झुनझुना थमाया है इन मुय्ये मोबाईल वालों ने जिसे देखो कान पे टुनटुना लगाए लगाए तमाशबीनी करता फिरता है गली गली…मानो फोन ना हुआ माशूका का लव-लैटर हो गया…जी ही नहीं भरता स्सालों का|और ऊपर से कुछ कंपनियों ने आपस में अनलिमिटिड टाक टाईम दे के तो अपनी और साथ-साथ दूसरों की भी वाट लगा डाली"

"अरे!..बेवाकूफो अपना...लिमिट में बातें करो…ये क्या कि...माशूका से मतलब की बातें करने के बजाय...

”क्या बनाया है? या फिर... क्या पकाया है?”....

“अरे!…तुमने लड्डू लेने हैं?”…

“कौन से कपड़े पहने हैँ?…पहने हैं कि नहीं पहने हैं?”...

"कितने बजे सोई थी?".. 

“और जब कुछ ना मिले कहने को तो….

“और सुनाओ”.... “और सुनाओ” कर के गेंद सामने वाले के पाले में डाल दो कि....

“ले बेटा!..अब तू ही नई-नई बातें ढूंढ करने के लिये…अपना कोटा तो हो गया पूरा" 

“उफ!…कितना बिज़ी रखते हैँ ये लोग फोन?"…

ढोलवाला पूरी लगन से मगन हो ढोल बजाए चला जा रहा था और बजाता भी क्यों ना? ...मनमानी दिहाड़ी जो मिल रही थी|सब मेहमान ढोल की ताल पे मस्त हो नाच रहे थे|इंगलिश की दस-बीस पेटियाँ तो एडवांस में ही मंगवा ही चुका था मैँ....इसलिए दारू-शारू की कोई चिंता नहीं थी कि बीच में ही खत्म हो गयी तो मज़ा किरकिरा ना हो जाए कहीं|दुलहन की तरह सजा हुआ था मेरा बंगला|मज़े ले-ले कर तबियत से तर माल पे हाथ साफ किया जा रहा था|किसी की बाप का कुछ जा जो नहीं रहा था…जा तो अपुन का रहा था ना? लेकिन बरसों बाद मिली खुशी के आगे सब कुर्बान|

बस एक ही बात थोड़ा खटक रही थी कि सबके चेहरे पे एक ही सवाल बार-बार उमड़ता-घुमड़ता दिखाई दे रहा था कि...

“आखिर!..माजरा क्या है?"…

"ये कंजूस-मक्खी चूस राजीव आखिर इतना दिलदार कैसे हो गया?…कहीं कोई लाटरी तो नहीं लग गयी?”…

"कहीं ना कहीं दाल में कुछ काला है ज़रूर"..

"अरे!…तुम क्या जानो कि …यहाँ तो पूरी की पूरी दाल ही काली है" मैँ मन ही मन खुश हुए जा रहा था

"मुफ्त में माल जो मिल रहा था तो सभी खामोश थे कि... "अपुन को क्या…कोई मरे या जिए?" वाला भाव उनके चेहरे पर था

"क्या कोई लाटरी लगी है?"…

"किस खुशी के मौके पे दावत दी जा रही है जनाब?"…

कोई ना कोई इस तरह के बेतुके सवाल भी दागे ही दे रहा था बीच-बीच में|

"अरे!…तुम्हें टटटू लेना है?…अपना आराम से खा-पी और मौज कर"…

"क्यूं फटे छेद में से बोरी के भीतर घुसने में वक्त ज़ाया कर रहा है?”…

कुछ समझदार इन्सान भी थे जो खाओ-पिओ और अपना रास्ता नापो की पालिसी पे चल रहे थे|बीच-बीच में कोई ना कोई ढीठ बन के पूछ ही बैठता तो उसे मेरा जवाब तैयार मिलता कि... 

"ये सब ना पूछो और बस मौज लो"…

मेहमान-नवाज़ी के चक्कर में थकान के मारे हालत पतली हुए जा रही थी लेकिन खुशी का मौका ही ऐसा था कि उछलता फिर रहा था मैँ| आखिर!…खुश क्यों नहीं होता मैँ?…ना कम ना ज्यादा….पूरे चौदह साल बाद खुशी के ये पल जो नसीब हुए थे| लगता था जैसे चौदह साल का वनवास काट मैँ आज राजगद्दी संभाल रहा हूँ| खुशी से मन ही मन इस गीत के बोल फूट रहे थे....

"दुख भरे दिन बीते रे भईया,अब सुख आयो रे"...

नौकर-चाकर भी तो कम ही पड गये थे आज…सब के सब मेरी खातिर पूरे जी-जान से हर काम में हाथ बटा रहे थे....अच्छे-खासे तगड़े ईनाम का लालच जो था| इस सब आपा-धापी के चक्कर में शायद कही मैँ कुछ भूले जा रहा था|

“कहीं कोई यार-दोस्त…रिश्तेदार बुलाए जाने से तो नहीं रह गया है?”….मेरा अंतर्मन पूछ बैठा

“नहीं!…मैंने पूरी बारीकी से खुद ही तो लिस्ट तैयार की थी"…

“सोच लो!…कहीं बाद मे किसी से ताने ना सुनने पड़ जाएँ?”…

“हम्म!….

बडी ही सूक्ष्मता से लिस्ट को कई बार चैक करने के बाद भी कहीं कोई गल्ती या कमी नज़र नहीं आ रही थी|

"लेकिन कहीं ना कहीं….कुछ ना कुछ तो छूटा ज़रूर है"मैँ अपने माथे पे ऊँगलियाँ फिरता हुआ खुद अपने आप से बात करता हुआ बोला 

माथे पे ज़ोर डाल मैँ सोचे चला जा रहा था कि अचानक सब याद आ गया...

"ओह!..ओह माय गाड…ये सब कैसे हो गया?”..

“या अल्लाह!…मुझे उसके कहर से बचा"..

"हे भगवान!…अब क्या होगा?....

"उफ़!…ये मैंने क्या कर डाला?”..

"कहाँ मति मारी गयी थी मेरी जो इतनी ज़रूरी बात दिमाग से उतर गयी?…बेवाकूफी की भी हद होती है"..

"इतना नासमझ मैँ कैसे हो गया?"…

डर के मारे रौंगटे खडे होने को आए थे मेरे लेकिन ऐसे डर कर हाथ खड़े करने से क्या होगा?…हिम्मत तो मुझ ही को करनी होगी…कोई और तो आ के मुझे उनके कहर से बचाने से रहा|…

“हां!…यही ठीक है.और यही सही भी रहेगा….जितनी जल्दी हो सके…इस काम को निबटा ही देता हूँ"…

"साँप के बिल से निकल…फेन फैलाने से पहले ही लाठी भांज देता हूँ"…

बस…फिर क्या था जनाब…अपना दिल कड़ा कर के मैंने फोन घुमा दिया| वही हुआ जिसका मुझे डर था|सामने से फड़कदार…कड़कती हुई अवाज़ आई… 

"कब?"...

"कहाँ?"...

"कितने बजे?"..

"पहले फोन नहीं कर सकता था बेवाकूफ?”…

पता नही इस स्साले दिमाग को क्या हुए बैठा था जो वहाँ भी यही निकल पड़ा कि…

"तुम्हें टट्टू लेना है?…अपना खाओ-पिओ और मौज करो"मैं अपने दिमाग पे हाथ मारता हुआ बोला 

"स्साले!…सीधी तरह बताता है कि नहीं?" उधर से गुर्राती हुई आवाज़ मुझे अंदर तक थर्रा गई 

“और ये बैण्ड-बाजे का क्या शोर हो रहा है?"उधर से तल्ख़ आवाज़ में फिर पूछा गया 

मैँ सकपका गया और धीरे से शर्माते हुए मासूम स्वर में बोला…

"जी!…वो दरअसल क्या है कि …मेरी बीवी घर छोड़ के भाग गयी है ना?..इसीलिए थोड़ा-बहुत बहुत एंजाय कर रहे थे"

“हम्म!…जल्दी पूरा नाम-पता बता…अभी तेरी खबर लेते हैँ”…

“ख्खबर?”मैं बौखला गया

“हाँ!..खबर”…

“मैंने क्या किया है?…मैं तो बस ऐसे ही….

“वो तो हम तुझे आ के बताएंगे कि तूने किया क्या है?…पहले तू ज़रा फटाफट से अपना नाम-पता और ठिकाना नोट करवा”….

“ज्जी!…

राजीव तनेजा

F-108,राजेंद्रा पार्क एक्सटेंशन,

मेन रोहतक रोड,नांगलोई

मेट्रो पिलर नंबर 420 के सामने

“हम्म!…तो बड़ा 420 है रे तू?”…

“थैंक्स!…थैंक्स फॉर दा काम्प्लीमैंट"…

“इट्स ओ.के”….

“बाय"कह कर मैं फोन रखने को हुआ …

“आय-हाय!…अभी से कैसे बाय?…..अभी तो तेरा बैण्ड तेरा बजेगा बच्चू..उसके बाद बाय”…

“वव…वो…लेकिन….

“हमें?…हमें बरगलाता है?"कहते हुए दूसरी तरफ से फोन पटक दिया गया

“हुंह!…कुछ और नहीं बक सकता था मैँ?"मैं अपने सर पे धौल जमाता हुआ बोला…

"कैसे बकता?…शेर की दहाड सुन मतवाला हिरण बावला जो हो उठा था"

कंठ सूखे जा रहा था मेरा...मन ही मन काँप रहा था कि पता नहीं स्साले क्या-क्या पूछेगे? और मै क्या-क्या जवाब दूंगा?"

"टटटू जवाब दूगा?…फ़टी तो अपनी पहले से पड़ी है"

अभी इसी उधेड़बुन में था ही कि पुलिस का सायरन नज़दीक आता सुनाई दिया|

“क्या सिर्फ हिन्दी फिल्मों में ही पुलिस देर से आती है?"…

"असल ज़िन्दगी में क्या पुलिस इतनी तेज़ और मुस्तैद होती है?"मेरा मायूस चेहरा …

"अगर ऐसा सच है तो इससे तो हमारी फिल्में ही अच्छी हैँ…कुछ पल के लिये ही सही लेकिन दर्द-ओ-गम भुला राहत तो देती हैँ कम से कम"…

S.HO साहब खुद ही अपने पूरे दल-बल के साथ पधारे थे|उनकी कड़क अवाज़ सुनाई दी…

"ओए!…ये राजीव का बच्चा कौन है?"

कोई नहीं बोला..S.H.O फिर चिल्लाया….

"ओए!…राजीव के बच्चे...बाहर निकल"..

“अजी!…बच्चे कहाँ?…अभी तो मैं…(मेरा मिमियाता स्वर) 

सर्दी के मौसम मे भी पसीने छूटे चले जा रहे थे 

“तू…कौन?”…

"ज्जी…जी....मै ही हूँ राजीव”…

"हम्म!…बड़ा खुशकिस्मत है रे तू" S.H.O ने मुझे ऊपर से नीचे तक गौर से निहारा और फिर कान में आहिस्ता से फुसफुसाते हुए बोला…

“चल!…वहाँ कोने में….तेरे से प्राईवेट मेँ कुछ बात करनी है"….

“प्प…प्राईवेट…वहाँ कोने में?”मैं अंदर तक कांप गया…

“हाँ!…चल मेरे साथ"…वो मेरा हाथ थामे मुझे ज़बरदस्ती से कोने के झंखाड में खींच ले गया

कुछ देर तक आस-पास का निरीक्षण करने के बाद वो फुसफुसाते हुए बोला…

"यार!...ये कमाल तूने कैसे कर दिखाया?"S.H.O साहब के चेहरे पे आश्चर्यमिश्रित प्रशंसा का भाव था…

"ज्जी…वो…दरअसल…..

"अबे!…ये जी वो...जी वो से आगे भी बढेगा या यहीं चिपक के खड़ा हो जाएगा?”…पुलसिया रौब झाड़ते हवलदार का तगड़ा हाथ मेरे कान से चिपक चुका था 

"चुप्प!….बिलकुल चुप" S.H.O साहब आँखे तरेर हवलदार को इशारा करते हुए बोले 

“जी!..जनाब"…

"तुम बताओ कि कैसे…" S.H.O  साहब की सौम्य आवाज़ मेरे कानों में शहद का सा मीठा रस घोल रही थी 

"बात दरअसल ये है कि....(ना जाने मेरी आवाज़ क्यों लड़खड़ा उठी) 

मेरी आवाज़ में विद्यमान असमंजस को भांपते हुए S.H.O साहब ने पहले अपनी पैनी नज़रों से अपने आस-पास का निरीक्षण किया और फिर मेरी हथेली पे चुपचाप हज़ार-हज़ार के दो कडकडाते हुए नोट फट से धर दिए| मैंने लाख मना किया कि….

“ये सब ठीक नहीं है…जायज़ नहीं है…इतने कम में कैसे?”…

मै मना करता रहा…इनकार करता रहा लेकिन वो थे कि पीछे हटने को तैयार ही नहीं…मानने को तैयार ही नहीं| मेरी ना-नुकर देखते हुए उन्होंने आँखो ही आँखो में आपस में बात की और फिर खुद S.H.O   साहब ने हज़ार-हज़ार के आठ और कडकडाते हुए नोट और मेरी जेब के हवाले कर दिए और बोले...

"बस!…अब इससे ज्यादा और नहीं…..आज इतनी ही दिहाड़ी बनी है कसम से"…

“लेकिन….

"समझा करो...ये भी मैँ और चारों हवलदार मिलकर दे रहे हैँ"…

“ओह!…

कौन कहता है कि अपने देश में एकता नहीं है?…भाई-चारा नहीं है? यहाँ तो सब मिल-बांट के खा रहे हैँ…

"हाथ-कंगन को आरसी क्या? और ...पढे लिखे को फारसी क्या?"..

इसका जीता-जागता नमूना तो मैँ खुद अपनी खुली आँखो देख रहा था 

"आजकल मंदा बहुत चल रहा है यार…कोई दे के राज़ी ही नहीं है"…

“ओह!…

"ये भी किसी गरीब मानस के डंडा चढाया तो जा के बडी मुशकिल से इक्ट्ठा हुए हैँ…कसम से"…

“हम्म!.. 

"इसी भर से काम चला लो गुरू…बाकी की कसर फिर कभी पूरी कर देंगे"…

"फिर किसने देखा है? लेकिन तुम कहते हो तो…

“हम सब की यही प्राबल्म है उस्ताद ...कोई जुगाड़ बताओ"

"अरे!…आप तो मेरे ही भाई-बन्धु निकले..आपको तो बताना ही पड़ेगा"मैं खिसियानी हँसी हँस नोटों को अपनी जेब के हवाले करता हुआ बोला

"कुछ ना कुछ आप हर रोज़ ऐसा करें कि मुसीबत खुद ही एक ना एक दिन परेशान हो के अपने आप घर छोड़ के भाग जाये".. 

"किसको पढा रहे हो गुरू?…ये सब तो हमें भी पता है...आज़मा चुके हैँ कई बार"… 

“तो?”…

"लेकिन क्या करें?....स्साली…अपनी है कि भागने का नाम ही नहीं लेती"वो सभी एक साथ बोल पड़े 

"अरे!…यार पहले पूरी बात तो सुन लो....बाद में टोका-टाकी करना"…

“जी!…लेकिन…

"लेकिन-वेकिन कुछ नहीं….जहाँ टोका-टाकी करनी चाहिए…वहाँ तो बोल नहीं फूटते होंगे ज़बान से"

सब चुप....लगे टकटकी बाँध मेरी तरफ देखने 

"उसके हर काम में टोका-टाकी करो..भले ही वो सही हो या फिर गलत"…

“जी!…

"घड़ी भर भी चैन से बैठने ना दो…कभी ये ला... तो कभी वो...ला करते रहो हमेशा"….

“हम्म!….

"खाना जितना भी स्वादिष्ट बना हो बेशक लेकिन एक बात गांठ बांध लो कि....

“उसकी तारीफ़ हमेशा करनी है?”हवलदार बीच में अपनी चोंच अडाता हुआ बोला…

“पागल हो गया है?…तारीफ तो कभी भूल के भी नहीं करनी है”मैं लगभग झाड़ने के मूड में हवलदार पर चिल्लाता हुआ बोला 

“ओह!…

"खाने को देख के ऐसे नाक-भोहं सिकोडो अजिसे किसी गटर का खुला हुआ मुंह देख लिया हो"....

“ओह!…

"पड़ोसन जैसी भी हो….उसकी जी भर के और बार-बार भर तारीफ करो".....

“जी भर के?”…

“हाँ!…जी भर के"…

“हम्म!….

"राह में आती-जाती हर किसी की....माँ-बहन एक करना कभी ना भूलो"…

"अरे!…इस सब में तो हम सब आलरेडी एक्सपर्ट हैँ"एक हवलदार बोल पड़ा 

उसकी बात को अनसुना करता हुआ मैँ आगे बोला…"हर लड़की/औरत को छेड़ो…चाहे वो उमर में तुमसे दुगनी ही क्यों ना हो"…

"दुगनी?”…

“हाँ!..दुगनी…बेशक माँ बराबर हो, फिर भी उसे ज़रूर घूरो"…

“ओ.के".. 

"बीवी की कोई बहन या सहेली हो तो उसे बिना नागा लाईन मारो..उस पे उलटी-सीधी फब्तियाँ कसो"…

“जी!…

"अपने लिये नित नए-नए वन्न-सवन्ने कपड़े खरीदो और उसके लिये फूटी-कौडी भी खर्चा नहीं करो"..

“हम्म!…

“दहेज के नाम पे बार-बार तंग करो"…

“ओ.के"…

"उसके हर काम में कोई ना कोई नुक्स ज़रूर निकालो"…

“हम्म!… 

"इससे बात नहीं करनी है….उसको नहीं देखना है…बालकनी में क्यों खड़ी हो? वगैरा…वगैरा अपने पैट डायलाग बना लो"…

“जी!… 

"अपने रिश्तेदारों का उससे सम्मान करवाओ और उसके रिश्तेदारों को हर् वक्त खुद बे-इज्जत करो"…

“जी!…

"और सबसे ज़रुरी और अहम बात कि चाहे उसका मन *&ं%$#@ के लिये करे ना करे लेकिन तुम *&ं%$#@ ....ज़रूर करो"… 

"अरे!…यार ये सब तरीके तो मेरे आज़माए हुये है लेकिन....कोई फायदा नहीं" काफी देर से मौन S.H.O साहब बोल पड़े  

"कोई ऐसा नया जुगाड़ बताओ गुरु कि जिसके काटे का इलाज ना उस भैण की टकी के पास ना हो"

“ओह!…तो फिर अगर ऐसी ही बात है तो फिर पुल्सिया हाथ है आपका...एक-दो में ही शैंटी-फ्लैट हो जाएगी"...

“मैं कुछ समझा नहीं"…

"कमाल है आप भी इतने……(मैंने कहते-कहते अपने शब्दों को बीच में ही रोक लिया)

?…?…?…?…

“अपना दो सीधा खींच के कान के नीचे एक फटाक से" कहते हुए ना जाने कैसे मैंने गलती से S.H.O साहब के ही कान पे कस के एक झनाटेदार झापड़ रसीद कर दिया 

“स्साले!…पुलिस पे हाथ उठाता है?" ....

"ले!…थाड …थाड….धूम-धडाम"…

गाल पे पाँचो उंगलियाँ छप चुकी थी…पता नहीं ये मार का असर था या फिर कुछ और.... S.H.O साहब की अवाज़ कुछ-कुछ ..बदली-बदली सी लग रही थी…शायद!…कुछ-कुछ ज़नाना सी| ध्यान से मिचमिचाती हुए आँखों को खोल कर देखा तो पाया कि…

मैँ गाल पे हाथ धरे धरे पलंग से नीचे गिरा पड़ा हूँ और सर पे बीवी खडी-खडी चिल्ला रही है .... angry-wife

"उठ!..उठ...'कुंभकरण' की औलाद...उठ”....

"नींद में बडबडाते हुए ये किसको शैंटी-फ्लैट कर रहे थे? और ये उल्टी पट्टी किसे पढाई जा रही थी?…मैँ घड़ी दो घड़ी के लिये बाहर क्या गयी....सब काम-धन्धा छोड़ के आराम फरमाया जा रहा है?”…

"बरतन कौन मांजेगा?…तुम्हारा बाप?"…

“व्वो…दरअसल….

"और ये कपड़े कैसे धोए हैँ?...किसी पे नील नहीँ लगा है ढंग से और किसी का कालर गंदा है"…

“व्वो…दरअसल….

"पूरे चौदह साल हो चुके हैँ तुम्हें समझाते-समझाते लेकिन दिमाग जैसे घास चरने गया रहता है हरदम"…

"लगता है जब ऊपरवाला अक्ल बांट रहा था तब भी तुम सो ही रहे होगे"

"हुँह!....बड़े आए 'शैंटी-फ्लैट' करने" 

***राजीव तनेजा***

Rajiv Taneja

Delhi(India)

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+919810821361

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+919136159706

 

13 comments:

शिवम् मिश्रा said...

बहुत खूब तनेजा जी ...................बस युही लिखते रहिए !

राज भाटिय़ा said...

बहुत खुब राजीव जी मजा आ गया. धन्यवाद

M VERMA said...

420 नम्बर पिलर तो मैं भी नहीं भूला हूँ
पर ये पार्टी थी कब ... मुझे भी तो याद कर लेते
मजेदार लेखन

काजल कुमार Kajal Kumar said...

अच्छा सुंदर धाराप्रवाह हमेशा की ही तरह

Tara Chandra Gupta "MEDIA GURU" said...

badhiya lekin lamba likh diya

खुशदीप सहगल said...

सच कहा है, सपना टूटते ही आदमी औकात में आ जाता है...

इसलिए कहते हैं लड़कों को शादी से पहले ही चौका-चूल्हा सीख लेना चाहिए...

जय हिंद...

ललित शर्मा said...

हा हा हा
वर्मा जी से सहमत हूं
नांगलोई स्टेशन पिलर नम्बर 420

मेरी नई फ़िल्म का नाम है।

स्क्रीन टेस्ट चालु आहे

हा हा हा

Shah Nawaz said...

बहुत ही मस्त, ज़बरदस्त लिखा है तनेजा जी......... बहुत खूब!

शिवम् मिश्रा said...

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं!
आपकी चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं!

श्याम कोरी 'उदय' said...

...jabardast !!!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...


राजीव जी, इतने लाजवाब किस्से आप कहाँ से खोज कर लाते हो, हंसते हंसते पेट में दर्द हो गया।

…………..
पाँच मुँह वाले नाग देखा है?
साइंस ब्लॉगिंग पर 5 दिवसीय कार्यशाला।

बी एस पाबला said...

हुँह!....बड़े आए 'शैंटी-फ्लैट' करने

हा हा हा

चौदह सालिया कारनामा जो न करा दे!

बी एस पाबला

सुशील कुमार छौक्कर said...

हा हा हा :)

 
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