तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो-राजीव तनेजा

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अलार्म कई बार बजने के बाद अब और बजने से इनकार कर चुका था|रात की खुमारी ऐसी छाई थी कि निद्र देवता भी लाख भगाए नहीं भाग रहे थे और भागते भी क्योंकर? रात पौने तीन बजे तक लिखने-लिखाने के बाद जो मैंने सोने को बिस्तर का मुँह ताका था|नतीजन!...सुबह पहली ट्रेन तो मिस हो ही चुकी थी पानीपत के लिए और दूसरी वाली पैसैंजर का भी कुछ भरोसा नहीं था कि पकड़ पाऊँगा या नहीं|आँख जो खुली थी साढे सात बजे|अब कुल जमा एक घंटे में क्या-क्या करूँ मैँ? सुबह सवेरे नहा-धो के तैयार हो नाश्ता पाडूँ मैँ या...कितना हुआ डाउनलोड…ये  चैक करूँ मैँ? या फिर यार-दोस्तों के लिए पुट्ठी सीडी ही तैयार करूँ मैँ? 

मेरी इस उधेड़बुन से बेखबर अपनी मैडम जी भी पता नहीं किस ख्याल में डूब बिना रुके लगातार बडबडाती चली जा रही थी….

“कोई चिंता है ही नहीं...कब सोना है?..कब जागना है?...कुछ पता ही नहीं है जनाब को...बच्चों को तो शिक्षा देते रहते हैँ कि ये ना करो और वो ना करो...टाईम पे सोया करो...टाईम पे जागा करो और खुद जो उल्लू के माफिक डेल्ले चौड़े कर के जाग रहे होतें हैँ सारी सारी रात…उसका क्या?”…

“व्वो!…दरअसल मैं…..

"लैक्चर देने को हमेशा तैयार कि...रोज़ दो-दो दफा ब्रश किया करो वगैरा..वगैरा और खुद जो बिना ब्रश किए ही कहने लगते हैँ कि...
"भूख के मारे बुरा हाल है..आने दे फटाफट नाश्ता…उसका क्या?”बीवी कमर पे हाथ रख मानों मेरी ही नकल उतारते हुए बोली …

“हुण भुक्ख लग्ग जाए ते मैं की ढट्ठे खू विच्च छाल मारां?”….

"मैँ भी कच्चा-पक्का जैसा तैयार होता है लगा देती हूँ सामने...अब थोड़ा सब्र नहीं होता है तो मैँ क्या करूँ?…दो ही हाथ दिए हैँ भगवान ने…इन्हें भी सम्भालूँ और इनके सैम्पलों को भी...हुँह”मेरी बात से बेखबर वो बोलती चली गई...

“अ..ऐसे क्यों बोल रही हो यार?”मैं लगभग मिमियाता हुआ सा बोला…

"एक तो पहले ही टाईम नहीं होता मेरे पास सुबह-सुबह…ऊपर से ये मम्मी-पापा भी ना….बिना सोचे समझे…मैले कपड़ों की पूरी गठरी बाँध के धर देते हैं मेरे सर पे….मैं कौन सा मना करती हूँ धोने के लिए लेकिन थोड़ा सब्र तो करें कम से कम?…पता नहीं…कब समझेंगे मेरी तकलीफ को?"…

“अरे!…सवेरे-सवेरे ही सारे काम निबट जाएँ तो दोपहर को अपना आराम से….. 

श्रीमती जी का तो मानो मेरी तरफ ध्यान ही नहीं था…अपनी ही धुन में बोलती चली गई…."कितनी बार समझाया है इन्हें कि ज़्यादा ना टोका-टाकी ना किया करें..मेरे साथ भी और बच्चों के साथ भी...बड़े हो गए हैं अब…अपना भला-बुरा आप समझेंगे …करेंगे तो अपनी ही…चाहे लाख समझा लो लेकिन नहीं!…टोके बिना रोटी जो हज़म नहीं होती है मेरी सरकार को”…
"अरे!...हज़म नहीं होती है तो जा के बोलो ना उनको कि हाजमोला-शाजमोला खाएं…थोड़ा चूरण-शूरण पाड़े...अब तो…अपने बच्चन जी भी चूर्ण बेचने लगे हैँ"मैं चहकता हुआ  बोला 

मेरे व्यंग्य से बेखबर श्रीमती जी अपनी ही रौ में बहती चली जा रही थी कि….

"ये ना पहनो...वो ना पहनो...अरे!..तुम्हें टट्टू लेना है?..मेरी मर्जी मैं जो मर्जी पहनूँ …पहनूँ ….ना पहनूँ”….

“कुछ सुन भी रहे हो या मैं ऐसे ही पागलों के माफिक बके चली जा रही हूँ?”…..

“ह्ह..हाँ-हाँ!…सुन रहा हूँ"अपने ऊपर हुए इस अकस्मात हमले से बौखला मैं हड़बड़ाता हुआ बोला …

"कुछ समझ भी है जनाबे आली को कि क्या लेटेस्ट ट्रैंड चल रहा है आजकल फैशन की दुनिया में?”…

“क्या?”…

“अरे!..मैं तुमसे पूछ रही हूँ और तुम हो कि मुझसे ही पूछ रहे हो"…

“ओह!…

“कभी थोड़ी-बहुत ताका-झांकी भी कर लिया करो ट्रेन में इधर-उधर…कि ऐन मौके पे बता सको की ये सोनीपत वाली लड़कियां क्या-क्या फैशन कर रही हैँ आजकल"...

“हम्म!…

"खाली -हाँ-हूँ करने भर से काम नहीं चलेगा…शाम को मुझे पक्की खबर चाहिए"…

“हम्म!…(मैं अपनी ही धुन में मग्न कागज़ पे कुछ लिखते हुए बोला)

“और ये क्या कि हर वक्त कीबोर्ड….स्क्रीन और कम्प्यूटर के ही ख्वाबों से ही दो चार होते रहते हो?…अब सामने कम्प्यूटर ना हुआ तो लग गए पैंसिल कागज़ ले आड़ी-तिरछी लकीरें खींचने...आखिर!…क्या फायदा ऐसे शौक का जो भुखमरी की कगार पे ले जाए?"…

“व्वो!…म्मैं…दरअसल……

"ना तो फीस भरी जाती है तुमसे बच्चों की और ना ही मोबाईल और नैट के बिल जमा करवाते हो टाईम पे"… 

“अरे!…बोला तो है कि कल पक्का जमा करवा दूंगा”मैं लगभग झल्लाता हुआ सा बोला……

“हुँह!…करवा दिए”…

मैँ उसकी बात पे ध्यान ना दे चुपचाप तैयार होता रहा| अब…जब से अपनी मैडम जी को पता चला है कि ये राजीव रात को दो-अढाई बजे तक जागने पर भी सुबह...बिना किसी नागे के 4.40 पे उठ क्यूँ जाता है? तो बस…तभी से इसे रोज़ाना की रट समझ लो या फिर स्त्री हठ समझ लो..अपनी मैडम जी हर समय यही लाड भरा राग अलापती हैँ कि..."छोड़ो इसे....8.40 A.M वाली पैसैंजर में ही चले जाना…टाईम का टाईम बचेगा और 'सी.एन.जी.' की 'सी.एन.जी'"…

अब उन्हें!..क्या और कैसे समझाऊँ कि...बनिया पुत्तर ना हुआ तो क्या?...एक पंथ तीन-तीन काज करता हूँ मैँ| पहला काज तो ये कि सुबह सवेरे 'हिमालयन क्वीन' में थोड़ा भजन-कीर्तन भी हो जाता है मुझ नास्तिक से और दूजे काज के रूप में बिना दुअन्नी भी खर्च किए अपने ‘वर्मा जी’ से प्रसाद भी मिल जाता है मुँह मीठा करने को| अब ये और बात है कि अपने को तो बस…चुटकी भर ही नसीब हो पाता है लेकिन यही सोच संतोष कर लेता हूँ कि….प्रसाद तो प्रसाद है...कोई पेट थोड़े ही भरना है इस सब से? लेकिन उस्ताद! ...बात तब अखरती है जब लड़की देख अपने ‘वर्मा जी’ दानवीर कर्ण बन प्रसाद की पूरी मुट्ठी ही उडेल डालते हैँ उसकी हथेली पे|

ये तो हुए दो फायदे और अब तीजे के बारे में अपने मुँह से कैसे कहे ये राजीव कि लगे हाथ…बोनस स्वरूप ‘गन्नौर’ वाली मैडम जी के दर्शन भी हो जाते हैँ|अब…कुछ ना कुछ तो ज़रूर है उनमें जो मैँ क्या?..सभी दैनिक यात्री तक सम्मोहित हो खिंचे चले जाते हैँ| 

“हो…जाना होता है कहीं और...तेरी ओर खिंचे चले आते हैँ" 

कैसे बताएँ अब ये हाल ए दिल अपना कि क्यूँ सुबह-शाम उन्हीं का ख्याल दिल ओ दिमाग पे छाया रहता है?...क्यूँ हर समय...हर वक्त...हर घड़ी दिल उन्हीं के ख्यालों में गुम रहता है?

"अरे-अरे!…ये क्या अंट-संट सोचने लगे आप?…ऐसा-वैसा कुछ नहीं है जो आप यूँ मंद मंद मुस्काते चले जा रहे हैं"…

"अरे!…बाबा...कमैंट चाहिए होता है उनका अपनी रचनाओं के लिए…हौसला जो बढता है इस सब से|पता नहीं क्यूं लगता है अपुन को कि वो अच्छा रिव्यू दे सकती हैँ लेकिन क्या करूँ?...कभी हिम्मत ही नहीं हुई उनसे बात करने की|बस!…चुपचाप टुकुर-टुकुर ताकता रहता हूँ उनको कि शायद…किसी दिन उनका खुद का…. अपना दिल ही पसीज जाए इस सब के लिए और वो ही पहल कर डालें मुझ नाचीज़ से बात करने की"…

"उफ!...ये क्या होता जा रहा है मुझे?…हर वक्त बस…मैडम ही मैडम…कभी ये मैडम तो कभी वो मैडम...करते रहो चापलूसी हर एक की.. .कभी इसकी तो कभी उसकी"….

“उफ़!…उफ़-उफ़….ये जीना भी कोई जीना है?..

अब तो ये हालत हो चुकी है मेरी कि जहाँ देखूँ...दिखती है बस...कोई ना कोई मैडम| सुबह आँख खुलते ही एक मैडम जी के शलोक सुनो...दूजी के सुबह ट्रेन में प्रवचन सुन उसे टुकुर-टुकुर निहारो...शाम को उसी के इंतज़ार में कई बार जानबूझ 'मालवा' मिस करो…और अगर मालवा में जाओ तो तीजी को रेलगाडी में 'नमस्ते मैडम जी...नमस्ते मैडम जी' कह जी हजूरी वाले अन्दाज़ में दुआ-सलाम करो...
टी.टी जो ठहरी. …ऊपर से एक्स बॉक्सिंग चैपियन| 

“वल्लाह!...क्या रुआब है उनका?…गरज़दार आवाज़ ऐसी कि एक बार को असली शेर भी थर्रा उठे"…

एक बार तो बिना ठुक्के पर्ची भी कटवा चुका हूँ चुपचाप|मरना थोड़े ही था मैँने जो नानुकुर करता?…ये तो शुक्र है अपने रिज़वी साहेब का जो बक्श देते हैँ ज़्यादातर वर्ना…उनसे कड़क....उनसे गुस्सैल तो मैँने किसी 'टी.टी' को देखा नहीं है आज तक| ये तो अल्लाह का करम है कि अभी हाल ही में हज हो के आए हैँ| सो!...गुस्सा तो उन्हें जैसे बिना छुए ही निकल जाता है दूर से| अभी हाल ही का एक किस्सा याद आ गया उनका| रोज़मर्रा की तरह चैकिंग जारी थी जनाब की कि एक लड़की ने उन्हीं के सामने ...उन्हीं के मुँह पे कह डाला कि.. 

"कर ले जो करना है...मैँ रिज़वी को जानती हूँ...उन्हें पहचानती हूँ...अच्छे जानकार हैँ मेरे …वगैरा…वगैरा"….

अब उस बेवाकूफ को कौन समझाता कि... "बावली!...जिस बन्दे के सामने तू ये सब बखान गा रही है...
वही...खुद सोलह आने...सौ फीसदी शुद्ध रिज़वी ही है"… 

अब उसका तो पता नहीं लेकिन सिहर तो हम उठे थे कि बिना नहाए-धोए ही गयी इसकी भैंस पानी में|कर लिया खुद ही सत्यानाश| तीन सौ बीस की पर्ची तो अब पक्की ही पक्की समझो लेकिन मजाल है जो अपने साहेब के माथे पे शिकन तक आई हो|बस!..अपने एस्कार्ट लोगों से यही कहा कि…

"समझाओ यार इसको"….और मंद-मंद मुस्काते हुए आगे चल दिए थे 

खैर!…हमें इससे क्या?…हम तो बात कर रहे थे मैडमों की तो बाकी की मैडमों से पिंड छूटे तो रात घर पहुँच अपनी पर्सनल मैडम जी की सुनो और अपनी दिन भर की आपबीती बतिआओ| 

क्या कहा?…बस तीन ही?”…

“अरे!…नहीं-नहीं…तीन नहीं…..तीन कहाँ?….अपनी ज़िंदगी तो चार मैडमों ने हराम की हुई है….पूरी चार अब इस चौथी मैडम का नाम ना ही लो तो बेहतर| पिछली वालियों ने तो कुछ का जीना ही दूभर किया है या किया होगा लेकिन यहाँ दिल्ली में बैठी इस चौथी वाली मैडम ने तो ऐसा कहर बरपाया है कि बस पूछो मत...मुख्यमंत्री जो ठहरी प्रदेश की|

“अब आप ना भी पूछें तो बताने से कैसे गुरेज़ करे ये राजीव?”…

"पहले नाश्ता तो ठूस लो ठीक से... फिर करते रहना पूरे रस्ते बखान अपनी इन मैडमों का....पानी कब से गर्म हो-हो के ठंडा हो गया है लेकिन जनाब को लिखने-लिखाने...और इधर-उधर की बतिआने से फुर्सत मिले तब ना"बीवी मेरे हाथ में पकड़े हुए कागज़ को गौर से देखते हुए बोली
"जल्दी से फटाफट नहाओ और खिसक लो पानीपत...याद है ना कि मुन्ने की फीस भरनी है जुर्माने सहित?"…

“हम्म!… 

"कल-कल करके पूरा महीना बीत गया लेकिन तुमसे फीस भरते ही नहीं बनता…जब नाम कट जाएगा ना स्कूल से...तभी अक्ल आईगी तुम्हें”...

“पता नहीं आएगी भी या नहीं"बीवी खुद से ही बातें करते हुए बोले चली जा रही थी

बीवी की डांट-डपट सुन लिखने से उचाट हो गया था मन मेरा….भला कहीं ऐसे अशांति भरे माहोल में भी कुछ लिखा जा सकता है?….

"नहीं ना?"...
तो बस…फटाफट ब्रैड के दो स्लाईस ठूसे मुँह में और सीधा घुस गया नहाने| अब…नहाया ना नहाया...सब बराबर था क्योंकि पाने तो कब का ठंडा हो चुका था और बीवी फिर से गीज़र ऑन कर देती?...सवाल ही नहीं पैदा होता| बस…जैसे-तैसे करके फ्रैश हुआ और कपड़े पहन भाग लिया स्टेशन की ओर| बस!...यही कोई दो मिनट की कसर और ट्रेन मुझे मुँह चिढाते हुए सरपट दौड़ी चली जा रही थी कि…

"ले बेटा!...कर ले पीछा"… 

भाग के भी कोई फायदा ना देख लटका सा मुँह ले कार में बैठी बीवी की तरफ ताका तो वो मुँह बनाते हुए बोली... 

"घर में कौन सा अण्डे पडे हैँ सेने को?...चलो!…बाईपास छोड़ देती हूँ…बस मिल जाएगी"…

“हम्म!…

"याद है ना कि मुन्ने की फीस?”…

बीवी की बात अनसुनी कर मैँने बीच में ही मुण्डी हिला हामी भर दी| पांच-सात मिनट के बाद बाईपास आ चुका था| बीवी से हैंड शेक कर मैँने जो पहली बस नज़र आई…वही पकड़ ली| आखरी सीट खाली मिली तो वहीं बैठ गया| टिकट कटवा कुछ देर इधर-उधर ताकता रहा फिर बोर हो अपनी कॉपी-पैंसिल निकाल शुरू हो गया| लेखकीय कीड़ा जो ठहरा...कब क्रीड़ा करने को मचल उठे?…कुछ पता नहीं|

चेहरे पे दर्द और होंठो पे मुस्कान लिए मैं बिना रुके लगातार लिखता जा रहा था|

"तुम इतना जो मुस्करा रहो..क्या गम है जिसको छुपा रहे हो?"  

"क्या हुआ राजीव बाबू?…किस सोच में डूबे हो?"अचानक आई इस आवाज़ से मेरे विचारों की बनती बिगडती श्रंखला टूट गयी | देखा तो बगल में अपने दहिया साहब खड़े थे|उनकी भी छूट गयी थी...
"अ..अ..कुछ खास नहीं ...बस ऐसे ही"मैँने खिड़की की तरफ खिसक उन्हें जगह देते हुए कहा 

अब क्या मुँह लेकर अपना हाल ब्याँ करे ये राजीव? मैँ खुद ही तो तारीफों के पुल बाँधा करता था उनके| हाँ!..उन्हीं के जिनकी वजह से आज मेरा ये हाल है|आज अगर मेरा काम-धन्धा...मेरा घरबार...सब टूट की कगार पर है तो सिर्फ उन्हीं के कारण|दोराहे पे खड़ा आज मैँ सोच रहा हूँ कि किस ओर जाऊँ?...इस ओर...या फिर उस ओर?

"जाऊँ तो जाऊँ कहाँ...बता है दिल...कहाँ है मेरी मंज़िल?"

कौन ऐसा नहीं होगा जो...मेरा मज़ाक... मेरी खिल्ली नहीं उड़ाएगा? सब के सब यही कहेंगे कि बड़ा अपना टीन-टब्बर सब उखाड़ के ले गया था पानीपत कि अब तो वहीं सैट होना है| वही मेरी कॉशी...वही मेरा मक्का|

"आ गए मज़े?”..

"ले लिए वडेवें?”…

"हर जगह अपनी ही चलाता था..अब पता चला बच्चू को कि मंडी में आलू क्या भाव बिकता है? जैसे ताने मेरे कानों के पर्दों को बारम्बार बेंध ना डालेंगे?"…

उनका भी क्या कसूर?…मैँ खुद ही जो छाती ठोंक बड़े-बड़े दावे किया करता था कि ….मेरी दिल्ली मेरी शान... दिल्ली पैरिस बन के रहेगी|

"माँ दा सिरर बन के रहेगी"... 

“पिछले चार सालों में तो कुछ हुआ नहीं और अब बाकी के बचे दो महीनों में कौन सा कददू पाड़ लेंगी? खेल सर पे तैयार खड़े हैं होने को और मैडम जी अभी 'फ्लाईओवर'  और स्टेडियम भी ठीक से तैयार नहीं करवा पाई हैं|जगह-जगह पानी रिस रहा है …जगह-जगह सडकें धंस रही हैं| पिछले चार साल में और अब में कितना फर्क पड़ गया है?...

"टट्टू जितना भी नहीं"

दावे तो लम्बे चौडे कर रही है मैडम जी खुद और उनका लाव लश्कर भी लेकिन हालात तो अभी भी जस के तस ही हैँ| वही आँखे मूंद..बेतरतीब दौड़ती भीड़…वही हमेशा दुर्घटनाएँ करती बेलगाम ब्लू लाईन बसें…वही उनकी..रोज़ाना की अन्धी भागमभाग...वही उनकी..लफूंडरछाप दादागिरी|

कुछ भी तो नहीं बदला है…वही सरेआम..आम अवाम को ठगते-एंठते ऑटो-टैक्सी वाले...वही केंचुए की चाल..रेंगता ट्रैफिक…वही बिजली के..लम्बे-लम्बे कट और वही जम्बो जैट के माफिक..बिजली के तेज़ दौड़ते मीटर| कुछ बदला भी है कहीं?..हाँ!..बदला है अगर कुछ...तो वो है आम आदमी का दिन पर दिन  मायूस होता चेहरा| हाँ!..इसे मायूस कहना ही सही रहेगा|

"इनके मायूसियत लिए मासूम चेहरों के पीछे ज़रा ठीक से झांक कर तो देखो मैडम जी…कैसे मर-मर के जीने की चाह में जिए चले जा रहे हैँ ये लेकिन पराई पीड़ आप क्या जानो?”...

“आपका क्या है?…कौन सा आपको भाग कर बस या गाड़ी पकड़नी पकडनी है?..कौन सा आपको बिजली,पानी और मोबाईल के बिल भरने हैँ?...कौन सा आपके मकान,दुकान या फैक्ट्री पे हथोड़ा बजाया जा रहा है? कौन सा आपकी दुकान या बिल्डिंग को 'सील' लग रही है?... दिल्ली 'पैरिस' बने ना बने लेकिन इतना तो सच है कि आपके घर....ऊप्स!...घर कहाँ हुए करते हैँ आपके?...सॉरी!..घर तो हम जैसे मामूली लोगों के होते हैँ|आप लोग तो बँगलो में रहा करते हैँ"...

"हैँ ना?”…

आपके बँगले बनेंगे...ज़रूर बनेंगे लेकिन हम लोगों की जेबों के दम पर"..

"यही सच है ना?"...

"पैरिस क्या...फ्राँस क्या...और लंदन क्या...दुनिया के हर देश...हर शहर..हर मोहल्ले की पॉश कालोनियों में बनेंगे और वो भी एक से एक टॉप लोकेशन पर"
"हाँ!...हमीं लोगों की जेबों की कीमत पर"मेरा ऊँचा स्वर मायूस हो चला था 

पता नहीं कैसे पाई-पाई जोड़ कर हमने अपना ये छोटा सा आशियाना बनाया|सालों साल एडियाँ रगड़-रगड़ कर अपना रोज़गार जमाया|जब कुछ खाने कमाने लायक हुए तो मैडम जी कहती हैँ कि...  

“चलो!..भागो यहाँ से….टॉट का पैबन्द हो तुम दिल्ली के नाम पर…धब्बा हो दिल्ली की शान में|सील कर देंगे हम तुम्हारी ये दुकाने. ..ये फैक्ट्रियाँ….तोड़ देंगे तुम्हारे ये फ्लैट..ये मकान….नाजायज़ कब्ज़ा जमा रखा है तुमने यहाँ"... 

"अरे!...काहे का नाजायज़ कब्ज़ा?…पूरे गिन के करारे-करारे नोट खर्चा किए थे हमने|पता भी है कि कितने सालों से?...क्या-क्या जतन करके?...कहाँ-कहाँ अँगूठा टेक के पैसा इकट्ठा कर हमने ये छोटा सा दो कमरों का मकान खरीदा है? और...अब आप ये कहने चली हैँ कि ये ग्राम सभा की सरकारी ज़मीन है...या फिर एक्वायर की हुई ज़मीन है?"...

"हमें कुछ नहीं पता कि ग्राम सभा क्या होती है और एक्वायर किस बिमारी का नाम है?…हमें तो बस इतना पता है कि ये दुकान..ये मकान हमारा है"…

*&^%$#$%^ 

"चलो माना कि आप सच ही कह रही होंगी सोलह आने कि ये ग्राम सभा की ज़मीन है... माने सरकारी ज़मीन…

“यही ना?”…

“लेकिन तब आपके मातहत कहाँ गए हुए थे जब पैसे ले-ले के यहाँ…खेतों में धडाधड कालोनियां बसाई जा रही थी?…तब क्यों नहीं रोका था हमें?…तब क्यों नहीं अन्दर किए थे कॉलोनाईज़र और प्रापर्टी डीलर?"… 

“वो भी तो पैसे ले कर इधर-उधर हो गए थे" मैँ खुद से बातेँ करता हुआ बोला 

उस वक्त तो पाँच हज़ार रुपए पर 'शटर' के हिसाब से नकद गिन के धरवा लिए थे सरकारी बाबुओं ने चिनाई चालू होने से पहले ही कि...

"हाँ!...दल दो हमारे सीने पे दाल…हम पत्थर दिल हैँ…हमें कोई फर्क नहीं पड़ता"… 

ठीक उन्हीं के दफतर के सामने ही तो निकाली थी तीन दुकाने मैंने...कोई रोकने वाला...कोई टोकने वाला नहीं था...नोटों भरा जूता जो मार चुका था मैं पहले से ही| ये तो बाद में पता चला कि स्सालों ने  पैसे भी डकार लिए और पीठ पीछे कंप्लेंट कर छुरा भी भौँक डाला मेरे सीने में|स्सालों!…को अपनी कुर्सी जो प्यारी थी| इसलिए उसे बेदाग बचाने को सारी कसरतें…सारी कवायदें की जा रही थी|पट्ठों ने ऊपर दफतर में खिला-पिला के मेरे केस की फाईल दबवा दी कि…

“कुछ भी हो साल दो साल ऊपर उभरने तक ना देना….बाद में अपने आप निबटता रहेगा खुद ही"..  

वाह!..क्या सही तरीका छांटा है पट्ठों ने...जेब की जेब भरी रही और कुर्सी की कुर्सी बची रही| कहने को तो जनता के सेवक हैँ….सेवा करना इनका धर्म है...तनख्वाह मिलती है इन्हें इसकी"..

"अजी!…छोड़ो ये सब...काहे के जनता-जनार्दन के सेवक?..सेवा-पानी तो उल्टे अपनी ये करवाते हैँ हमसे"… 

"लानत है ऐसे जीवन पर….इनकी सेवा भी करो और…इनका पानी भी भरो"…

*&^%$#$%

“क्या कहा?…रिश्वत देना और लेना..दोनों ही अपराध हैं?”…

"तो फिर ये सब आप जा के उन पुलिस वाले बीट आफिसरों को क्यों नहीं समझाती जो बारम्बार मोटर साईकिलों पे चक्कर काट-काट अपना हिस्सा ले जा रहे थे और बाद में खुद चौकी इंचार्ज को भी भेज दिया था कि…. “जाओ तुम भी कर आओ मुँह मीठा….हो जाएगी तुम्हारी भी दाढ गीली".. 

आप कहती हैँ कि हमने अवैध कंस्ट्रक्शन की हुई है तो आप ये बताएं कि किसने नहीं किया है ये तथाकथित अवैध निर्माण?…क्या आप नेताओं के निर्माण दूध के धुले हैँ?…कुछ अनैतिक नहीं है उनमें?"…

"क्या आपको ज़रूरत हो सकती है अतिरिक्त स्पेस की...हमें नहीं?"…

"क्या आपकी ज़रूरतें जायज़ हो सकती हैँ...हमारी नहीं?"…

“अच्छा किया जो आपने बुल्डोज़र चला हमारा आशियाँ मटियामेट कर दिया...ध्वस्त कर दिया लेकिन...
क्या आपके अपने अवैध निर्माणों की तरफ भी आप ही के बुल्डोज़र ने निगाह करना भी गवारा समझा?…उचित समझा?"… 

"नहीं ना?”…

"किस मुँह से पत्थर फेंकते हो ए राजीव...जब आशियाँ तुम्हारा भी शीशे का है"
"रेत के ढेर पे तुम भी खड़े हो और हम भी खड़े हैँ...ना तुम सही हो...ना हम ही सही हैँ" …

"अरे!..हमारा दिल देखो…हमारा जिगरा देखो…आपने हथोड़ा बजाया?…कोई बात नहीं"...

“आपने सील लगाई?….कोई बात नहीं"…

"लेकिन इतना तो ज़रूर पूछना चाहूँगा आपसे कि अगर हमारे यहाँ से हथोडों की धमाधम आवाज़ें हमारे दिल ओ दिमाग को बेंधे जा रही थी तो कम से कम आपके वहाँ से हथोड़ी की महीन सी...बारीक सी आवाज़ भी हमें तसल्ली दे जाती कि… कानून सबके वास्ते एक है| हम चुपचाप संतोष कर…अपने रोते हुए दिल को शांत कर लेते कि...कोई छोटा...कोई बड़ा नहीं है कानून की नज़र में…वो सबको एक आँख से देखता है लेकिन अफ़सोस…जो हुआ...जैसा हुआ...उसे देखकर तो यही लगता है कि…इससे तो अच्छा यही था कि कानून की एक आँख भी ना ही होती…पैदायशी अंधा पैदा हुआ होता वो"…

“यूँ भेदभाव तो नहीं कर पाता किसी के साथ वो| कहने को हम लोकतंत्र में जी रहे हैँ लेकिन क्या ये सच में सही है या फिर भ्रम मात्र है? अगर ये सिर्फ हमारा भ्रम है हमारा तो प्लीज़...इसे भ्रम ही रहने दें…यही विनती है आपसे”… 

"करो ना यूँ ज़मीनोदाज़ हमारे आशियाँ ऐ ‘राजीव’...जवाब तुम्हें ऊपर भी देना है"

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मैडम जी!...आप खुद और आपका डिपार्टमैंट…दोनों यही कहते हैं कि…. “सिर्फ दिल्ली जल बोर्ड का पानी ही पिएँ”….

“लेकिन इसे पहले ठीक से आप घर-घर पहुंचाएं तो सही….फिर हम ना पिएँ तो कहना”…

“वैसे…एक बात बताएँगी आप सच्ची-सच्ची कि आपने कभी खुद भी पी के देखा है इसे?"....

"कैसे सडाँध मारता है ना कई बार?"… 

"है ना?...  इसका मटमैला रंग देख तो कई बार उबकाई भी आने से मना कर देती है".. 

"ठीक है!...माना कि आप सिर्फ और सिर्फ फिल्टरड पानी ही इस्तेमाल करती हैँ नहाने के लिए भी और *&ं%$# के लिए भी"... 

"किसी से सुना तो ये भी है कि आपके कुत्ते तक भी बिज़लरी के अलावा दूजा सूँघते तक नहीं हैँ...अल्सेशियन जो ठहरे"… 

"अरे!...हमें उनसे भी गया गुज़रा तो ना बनाएँ आप…प्लीज़!..विनती है हमारी आपसे कि ढंग से बाल्टी दो बाल्टी पीने का पानी ही म्यस्सर करवा दिया करें"… 

“आप कहती हैं कि दिल्ली के लोगों में ट्रैफिक सैंस नहीं है…उन्हें सड़क पे चलने की तमीज नहीं है"…

“तो उसे सैंस लैस बनाया ही किसने?…मैं कहता हूँ कि आपने”… 

“जब खुद ही आपके ट्रैफिक हवलदार चौक पे खड़े हो ड्यूटी बजाने के बजाए झाड़ियों के पीछे छुप के आम आदमी को कानून तोड़ने के लिए प्रेरित करते हैँ और फिर चालान से सरकारी खजाना भरने के बजाय पहले अपनी जेब भरने को बाध्य करते हैँ...तो फिर बेचारा आम आदमी जाए तो कहाँ जाए?”…

"ठीक है!...मानी आपकी बात कि खर्चे बहुत हैँ सरकार के और कोई सीधे-सीधे टैक्स दे के राज़ी नहीं है लेकिन ये कहाँ का इंसाफ है कि जब सीधे तरीके से घी ना निकले तो सरकार भी अपनी उँगलियाँ टेढी कर ले?"…
"अरे!...अगर खर्चे ही पूरे करने हैँ तो अपने मातहतों की जेबें...उनके बैंक एकाउंट...उनके बँगले...उनकी जायदादें आदि...सब की सब खंगाल मारो| गारैंटी है कि उम्मीद से दुगना क्या...चौगुना क्या…सौ गुना भी मिल जाए तो कम होगा"… 

"क्यों?…ठिठक के रुक क्यों गयी आप?”…

“अपनों के लपेटे में आने का डर सता रहा है ना?”…

"ये कहाँ की भलमनसत है कि उन्हें बक्श..आम आदमी को चौतरफी मार मारें आप?…एक तरफ सीलिंग का डंडा...मँहगाई की मार…..हर समय अपने घरोंदो के टूटने-बिखरने का सताता डर"…

"आप ही के मुँह से सुना है कि आप दिल्ली को इंटरनैशनल लैवल का बनाने जा रही हैँ|आप कहती हैँ कि मैट्रो दिन दूनी रात चौगुनी तेज़ी से बन रही है लेकिन फिर भी आम जनता क्यों ब्लू लाइन बसों में धक्के खा रही है?…क्यों आपकी लाल-हरी बसें सड़कों पर खाली दौड़ रही हैं?…क्यों ब्लू लाइन बसें अभी भी ठसाठस भरी नज़र आ रही हैं?…इसका मतलब आपके संचालन में कहीं ना कहीं…कोई ना कोई कमी तो ज़रुर है"…

"आप कहती हैँ कि मॉल रातोंरात ऊँचे पे ऊँचे हुए जा रहे रहे हैँ लेकिन फिर भी छोटी अन-आथोराईज़्ड कॉलोनियों में बाज़ार अभी भी भीड़ से क्योँ अटे पड़े हैँ?...क्योँ भरे पड़े हैँ?"…

"आप कहती हैँ कि आपके राज में सडकों की लम्बाई-चौडाई दिन दूनी और रात चौगुनी तेज़ी से बढ़ी है…बढ़ रही है”…

“ये बात तो खैर मैंने क्या?…सभी ने नोटिस की है लेकिन फिर भी रेहड़ी-पटरी वाले अभी भी जस के तस सडकों पे कब्ज़ा जमाए क्योँ जमे खड़े हैँ?"… 

"आप कहती हैँ कि फ्लाईओवर बन रहे हैँ ..बनते चले जा रहे है लेकिन फिर भी सड़कों से जाम क्योँ खुलने का नाम नहीं ले रहे हैँ?"… 

कहने को...लिखने...बहुत कुछ है बाकी था लेकिन बोल बोल के...सोच सोच के थक चुके मेरे विचारों ने बीच में ही अचानक मेरा साथ छोड़  नींद का दामन थामने का एलान कर दिया| आँखे अब बोझिल सी होने लगी थी...पता नहीं कब आँख लगी...ना लगी 

"उठो!…उठो …तनेजा साहेब...देखिये तो सही कि क्या नया जुगाड़ लाया हूँ मैं अपने मोबाईल में" दहिया साहब की आँखो में चमक थी

"आप भी क्या याद करेंगे कि किसी टीचर से यारी की है आपने?…एकदम से लेटेस्ट हरियाणवी M.M.S"वो फुसफुसाते हुए बोले…

"नीला दाँत(ब्लू टुथ)ओपन करो अपने मोबाईल का….बस…एक मिनट में पहुँच जाएगा"… 

"वैसे भी पानीपत आने ही वाला है…कब तक सोए रहेंगे आप?”दहिया साहब मुझे झकझकोर कर जगाते हुए बोले…

"मैँ तो पूरे रस्ते इंतज़ार करता आया कि...अब जागेंगे कि अब जागेंगे….लगता है…रात भर भाभी ने सोने नहीं दिया" दहिया साहब शरारत से मुस्कुराते हुए बोले

“व्वो…दरअसल….

"इतनी ज्यादा कसरत ना किया करें आप कि अगला दिन जम्हाई और अँगडाई लेते लेते ही गुज़रे"…

उनकी बात की तरफ ध्यान न दे मैँने खिड़की से बाहर झाँका तो देखा पानीपत आ चुका था|कॉपी की तरफ नज़र दौडाई तो पहले सफे के बाद खाली की खाली थी|लगता है कि मैँ सपने में ही अपनी सारी भड़ास लिखता रहा...निकालता रहा...

खैर!...कोई बात नहीं...एक नया टॉपिक जो मिल गया था लिखने को| यहाँ बस में ना सही तो ना सही...कौन सा दुकान पे जा मैंने कल के दिए अण्डे सेने हैँ?"…

***राजीव तनेजा***

http://hansteraho.blogspot.com

rajivtaneja2004@gmail.com

Rajiv Taneja

Delhi(India)

+919810821361

+919213766753

+919136159706

 

15 comments:

शिवम् मिश्रा said...

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

नेताजी की मृत्यु १८ अगस्त १९४५ के दिन किसी विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी।

डॉ टी एस दराल said...

तुझको रक्खे राम , तुझको अल्लाह रक्खे
सुबह से हो गई शाम , हमको पढ़ते पढ़ते ।

हा हा हा ! बढ़िया नोंक झोंक रही ।
साथ ही दिल्ली की सभी समस्याओं पर गंभीर चिंतन भी हो गया ।
बहुत बढ़िया ।

ललित शर्मा-للت شرما said...

"किस मुँह से पत्थर फेंकते हो ए राजीव...जब आशियाँ तुम्हारा भी शीशे का है"

वाह वाह वाह
बहुत गजब की बात कह गए
पानीपत से इम्पोर्ट किया है क्या? नीलें दांत से।:)

राज भाटिय़ा said...

अरे सोने के अंडे बजार से खरीद लो ना? क्यो अपना फ़िगर खराब करते हो भाई:) बहुत सुंदर ओर रोचक लगीआप की यह कहानी, धन्यवाद

Shobhna Choudhary said...

वाह बहुत ही बढ़िया (मस्त) लिखा है

'उदय' said...

... बहुत सुन्दर ... बेहतरीन !!!

H P SHARMA said...

vyang lekh lamba hai par dilli sarkaar ke khoob khichai ke hai

ललित शर्मा-للت شرما said...

उम्दा व्यंग्य लेख
राजीव जी
आभार
मैं परेशान हूँ--बोलो, बोलो, कौन है वो--
टर्निंग पॉइंट--ब्लाग4वार्ता पर आपकी पोस्ट


उपन्यास लेखन और केश कर्तन साथ-साथ-
मिलिए एक उपन्यासकार से

बी एस पाबला said...

लिखा तो बढ़िया है लेकिन वाह कहने का मन नहीं :-(

एक व्यथा जो आम नागरिक के मन में मची रहती है, उसका एक उम्दा खाका खींचा है आपने

बधाई

गिरीश बिल्लोरे said...

mera thahaka sunai diya
nahee to dekh leejiye
haa haa haa haa haaaaaaaaaaaaaaaaaa

Mithilesh dubey said...

तनेजा जी हमेशा की तरह बहुत उम्दा पोस्ट लिखा है आपने बढिया लगा पढकर , लेकिन आपसे एक निवेदन पोस्ट और छोटा लिखें ।

खुशदीप सहगल said...

इस लेख को पढ़ने के बाद चार्ली चैपलिन और राज कपूर याद आ गए...माई ट्रैजिडी, अदर्स कॉमेडी...राज कपूर का सिद्धांत था...शो मस्ट गो ऑन...अंदर से जितना भी दर्द क्यों न हो दुनिया को हंसाना ही चाहिए...इस व्यंग्य के पीछे छुपे दर्द को मैं समझ सकता हूं...हैट्स ऑफ टू यू...

जय हिंद...

काजल कुमार Kajal Kumar said...

सपने का ये वर्णन ! ज़रूर दिमाग़ में CCTV रखते होंगे.

विनोद कुमार पांडेय said...

राजीव जी..अगर कोई आदमी बहुत ज़्यादा दुखी हो और उसे खुश रखने का कोई रास्ता ना दिखे तो आपकी रचना काम आ जाएगी..हँसाती-गुदगुदाती हुई एक बेहतरीन पोस्ट...हक़ीकत के साथ साथ अगर आप सपनों का बयान करें तो वो भी खास बन जाता है...वैसे भला हो दहिया साहब का जो जगा दिए नही तो कहानी पता नही कहा तक जाती..

बढ़िया पोस्ट के लिए आभार...

विनोद कुमार पांडेय said...

राजीव जी..अगर कोई आदमी बहुत ज़्यादा दुखी हो और उसे खुश रखने का कोई रास्ता ना दिखे तो आपकी रचना काम आ जाएगी..हँसाती-गुदगुदाती हुई एक बेहतरीन पोस्ट...हक़ीकत के साथ साथ अगर आप सपनों का बयान करें तो वो भी खास बन जाता है...वैसे भला हो दहिया साहब का जो जगा दिए नही तो कहानी पता नही कहा तक जाती..

बढ़िया पोस्ट के लिए आभार...

 
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