रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं और नाम है…?..?…?..?- राजीव तनेजा

क्या?…क्या है महान आखिर आपके इस देश में?…किस गुरुर में?…किस घमण्ड में इतराए चले जा रहे हैं आप लोग?…ले-दे के एक ताजमहल या फिर कुछ पुराने टूटे-टाटे…बाबा आदम के ज़माने के खंडहरों समेत ‘हँसते रहो' का rajeev Taneja  राजीव तनेजा

ही तो बचा है आपके इस अजब-गज़ब देश में देखने लायक चीज़.. किस?…किसकी बात कर रहे हैं आप?… उस ईंटनुमा बन्द गोल मीनार की?… नहीं!…मैं राजीव की नहीं बल्कि क़ुतुब…क़ुतुब मीनार की बात कर रहा हूँ…. है ही क्या बचा आखिर उसमें खास बस इसके अलावा कि उसे कुतुबद्दीन एबक द्वारा फलाने-फलाने सन में फलाने-फलाने राज मिस्त्री की निगरानी में चंद सौ या हज़ार मजदूरों से जबरन पल्लेदारी करवाते हुए बेइंतिहा मोहब्बत और लगन के साथ झकाझक….चकाचक  बनवाया गया था?… 

और आपका ये ताजमहल?…जानते भी हैं कि इसको बनाने वाले सभी मजदूरों के हाथ…सरों समेत कलम कर दिए गए थे…और आप लोग बात करते हैं ह्यूमन राईट्स की….दिन पर दिन लुप्त होते…मानव के अधिकारों की…अरे!…पहले अपने गिरेबाँ में तो झाँक के देख लें आप लोग…फिर बात करें दूसरों की …माना कि दूसरे भी सही नहीं है …गलत हैं लेकिन इसमें आखिर किया ही क्या जा सकता है?…दस्तूर ही कुछ ऐसा है इस दुनिया कि कभी-कभी ना चाहते हुए भी अपने फायदों के लिए आक्रामक होना पड़ता है…अग्रेसिव होना पड़ता है लेकिन अफ़सोस…कुछ आँख के अन्धों और कान के बहरों  को बड़े आराम से उनका आक्रामक होना…उद्दंड होना… अग्रेसिव होना दिख जाता है लेकिन उसके पीछे की असल वजह…असली कारण कोई नहीं देखता है और ना ही देखना-सुनना चाहता है…कोई ये क्यों नहीं देखता कि कई बार मौके की नजाकत को देखते…समझते और बूझते हुए वही लोग भीगी बन सिहरते हुए इधर-उधर कोनों में चुपके से सुबकते हुए दुबक भी तो जाते हैं?….

क्या?…क्या है महान आखिर आपके इस देश में?…बस इसके अलावा कि आप दुश्मन हो या दोस्त…सभी के साथ आदर से बात करते हैं…उनके नाम की माला जपते हैं….जी-जी करके हर किसी ऐरे-गैरे…नत्थू-खैरे से अपनी ऐसी-तैसी करवाते हैं…माना कि अच्छी बात है दूसरों के साथ इज्ज़त से पेश आना …उन्हें सम्मान देना लेकिन इसमें भला कहाँ की भलमनसत या समझदारी है कि सारी पोल खुलने के बाद भी आप 2 और 3 के साथ भी ‘जी' का संबोधन जोड़ …उन्हें 2 जी और 3 जी के नाम के साथ आदर सहित संबोधित करें?…

अब समझ में आ रहा है मेरी कि अभी तक आपके यहाँ कसाब या फिर अफजल गुरु क्यों ज़िंदा है?…दरअसल आप लोग खुद ही नहीं चाहते कि वो फांसी पे लटके…दरअसल…डरते हैं आप लोग हर आने-जाने वाले तूफ़ान के पल-पल…प्रतिपल नज़दीक आते पदचाप से…सरकार भी नपुंसक ही है आपकी जो उसे आम आदमी की इच्छाओं से…उसकी अपेक्षाओं से…उसकी उम्मीदों से कोई मतलब नहीं है…कोई सरोकार नहीं है…नपुंसक… हाँ…नपुंसक है आपकी सरकार और इसके द्वारा रचे…बुने और गढे गए अभी तक के सभी लोग…सभी क़ानून……तभी तो ये कलमाड़ी…राजा…मारन और कनिमोझी जैसे दो कौड़ी के लोग सरेआम देश की…उसके आवाम की खिल्ली उड़ा तिहाड़ जेल के  एयर कंडीशंड दफ्तरों में तमाम पाबंदियों और बंदिशों के बावजूद मज़े से चाय की चुस्कियों का आनंद लेते और रिसार्ट टाईप पार्कों में गुटरगूं कर इधर-उधर फुदकते दिखाई दे जाते हैं…

हर-किसी ऐरे-गैरे …नत्थू-खैरे को सर पे चढाना तो कोई आपसे सीखे…अब इन्हें ही लो…जुम्मा-जुम्मा चार दिन हुए नहीं है पालने में झूला झूलते हुए…मुँह में लगी चुसनी तक तो छोड़ी नहीं गयी अब तक इनसे और मुझे?…अपने वन पीस…सिंगल हैंडिड बाप को आँखें दिखाना शुरू?…भय्यी वाह…बहुत ही बढ़िया…. बात-बात पे….बिना बात…आगे-पीछे…ऊपर-नीचे ….उचक-उचक के बेफाल्तू में फुदक रहे हैं स्साले…सब के सब…बताइए…तो ज़रा कि किसकी शह पर?…आप ही की शह पर जनाब…आप ही की शह पर..…हाँ-हाँ!…सब आप ही का किया-धरा है… न…ना…इतने भोले भी ना बनिए आप कि आप लोगों को इस सब का कुछ पता ही नहीं….कुछ इल्म ही नहीं…किसी बात का कुछ गुमाँ ही नहीं… याद रखिये…आप लोगों के ही ढेर सारे प्यार और दुलार ने इन्हें बिगाडा है….इज्ज़त से संवारा है…

“अब संवारा है तो संवारा है….इसमें इसमें अपने बाप का क्या गया?…कुछ भी नहीं”…

चलो!…कुछ चला भी गया तो वांदा नय्यी…..बहुत दिया है ऊपरवाले  ने…और भी देगा… वो अपने घर में मस्त है तो मैं भी कैसे ना कैसे करके अपने घर में मस्त रह लूँगा.लेकिन इतना तो समझाओ इन बद्दिमागों को कम से कम कि मेरे सर पर तो ना आ के मूतने की कोशिश करें…ये?…ये स्साला…पिद्दा सा….माईक्रो सा…मुझे?…अपने बाप को..आँखें दिखाने चला है…ससुरे की नज़र कमजोर हो गई है शायद….और ये?…ये क्या कर रहा है?…अपने क्रोध का सारा लावा शुद्ध एवं खालिस रूप में मुझ पर ही उढेल…व्यावसायिक रूप से मुझे खुडढल लाइन लगाते हुए….बाज़ार रुपी अमरबेल को प्राप्त कर खुद अजर…अमर…एवं अमिट होना चाहता है…..और ये?…ये पाँच पाण्डव क्या कर रहे हैं?…खुद अपने नाम के साथ ‘जी’ लगा कर आखिर साबित क्या करना चाहते हैं?…ऐसे तिगनी के माफिक इधर-उधर उछल कर कूद लेने से क्या उखाड़ लेंगे मेरा?….माना कि इन सबके मिलेजुले आक्रामक हमलों ने बहुत कुछ बिगाडा है मेरा…मुझे आक्रामक से डिफैन्सिव मोड में ला कोने में दुबक के खड़े होने पे मजबूर कर दिया है…..विवश कर दिया है…

देखो!…कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं ये पागल के बच्चे…कि हम क्रांति ला देंगे…तूफ़ान मचा देंगे?…दिमाग खराब हो गया है स्सालों का….तभी तो एक म्यान में दो-दो तलवारें रखने की बात करने लगे हैं आजकल….बताओ…तो ज़रा…ये भी भला क्या बात हुई कि…म्यान एक…और तलवारें दो?…इनसे तो चलो…जैसे-तैसे कर के मैं निबट भी लूँ लेकिन उन कम्बख्तमारों का क्या करूँ जो एक ही म्यान में एक साथ तीन और चार तलवारों को रखने की ज्ञान भरी बातें कर रहे हैं?….और ऊपर से दंभ भरा खुद का स्तुतिपूर्ण दावा भी कर रहे हैं कि एक ही बार में चारों तलवारों को एक साथ भांज कर मांजते हुए चलाया और आजमाया और दर्शाया जा सकता है…संतुलित नहीं है इनके दिमाग…सठिया गए हैं ये लोग…क्रैश कर बैठेंगे एक ना एक दिन अपनी हार्ड होती हुई डिस्क को…

भय्यी वाह…बहुत बढ़िया… चार चवन्नी क्या देख ली चाँदी की?…लेने का मन बना लिया इन्दिरा गांधी की? ….

कुछ तो शर्म करो…कुछ तो लिहाज करो…पैसा ही सब कुछ नहीं होता…इतना मत उछलो…इज्ज़त…आबरू…रेपुटेशन….सबकी अपनी-अपनी कीमत है…अपना-अपना महत्त्व है…

अरे!…कुछ लेना ही है तो गांधीजी से उनकी सहिष्णुता लो…सुभाष चन्द्र बोस से उनकी दिलेरी…जाबांजी लो… भगत सिंह से उनकी हिम्मत लो…ये क्या कि इन्दिरा गाँधी से उनका आपातकाल जैसा निरंकुशता भरा अवगुण लिया और मन ही मन इतराते हुए फूले नहीं सामने लगे?…

कुछ भी कर लो…कुछ भी बन जाओ लेकिन याद रखना हमेशा कि… गंढेरियां जितनी बड़ी मर्जी हो जाएँ बेशक… रहती हमेशा गन्ने से छोटी ही हैं.. और फिर रिश्ते में भी तो हम…हाँ!…हम इन सभी मोबाईलों का बाप लगता हूँ क्योंकि नाम है मेरा….नोकिया…नोकिया…नोकिया…

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14 comments:

वन्दना said...

शानदार व्यंग्य के माध्यम से करारी चोट की है।

बी एस पाबला said...

काश कभी ऐसा हो
किसी को पूछा जाए कि यह सब तुमने किया?
तो बंदा कहे
यह-किया यस-किया यस-किया

anu said...

व्यंग के माध्यम से क्या करारी चोट करते है आप राजीव...बहुत खूब
काश मै भी ऐसा लिख पाती............
--

शिवम् मिश्रा said...

यह भी अपने इस लोकतंत्र का ही खेल है कि आपको अपनी बात कहने के लिए व्यंग्य का सहारा लेना पड़ता है !

डॉ टी एस दराल said...

अरे बाप रे !
खूब गुस्सा निकाला है .
चलो अच्छा है , अब हल्का महसूस कर रहे होंगे तनेजा जी .
लेकिन ये बताओ नोकिया वालों से कुछ मिला है क्या ? :)

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

वाह क्या बात है!
इस मीठी मार का जवाब नही!

H P SHARMA said...

जी-जी करके हर किसी ऐरे-गैरे…नत्थू-खैरे से अपनी ऐसी-तैसी करवाते हैं…माना कि अच्छी बात है दूसरों के साथ इज्ज़त से पेश आना …उन्हें सम्मान देना लेकिन इसमें भला कहाँ की भलमनसत या समझदारी है कि सारी पोल खुलने के बाद भी आप 2 और 3 के साथ भी ‘जी' का संबोधन जोड़ …उन्हें 2 जी और 3 जी के नाम के साथ आदर सहित संबोधित करें?…
bahut badhiya. bhai poora maamla khoob jama hai.chabanni gai chabanne rah gaye ab desh mai kya kare kaha indira gandhi ke bat hoti thee ab mayawati tak current maarti hai.

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

आपातकाल की ले लो।

अविनाश वाचस्पति said...

सरकार के अच्‍छे नहीं ढंग
किया उसको भी बदरंग।

Khushdeep Sehgal said...

कुतुबमीनार की कहानी तो पुरानी हो गई...टूरिज्म के लिए ये नई मीनार वाला आइडिया अच्छा है...

जय हिंद...

Kajal Kumar said...

गंढेरी G जी का वेजीटेरियन प्रयोग अच्छा लगा :)

सुनीता शानू said...

sahi hai rajiv bhai vyangya ke madhyam se bhadas nikali ja rahi hai...achha vyangya... shubhakamnayen

दर्शन कौर धनोए said...

व्यंग तो जोरदार रहा ..जनाब ..क्या कहने ???

सतीश सक्सेना said...

चश्में में लग भी भाई रहे हो .....:-)
शुभकामनायें राजीव भाई !

 
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